मनुष्य का यंत्रीकरण

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने आदमी को एक तरह से मशीन बना दिया है. उदाहरण के लिए घर में काम आने वाली सुइयां या कीलें आज से 200 वर्ष पहले ग्राम का कोई लोहार बनाता था. उसके बनाने में जो साजो-सामान लगता था, उसको प्राप्त करने से लेकर तैयार सुई या कील घर- घर जाकर बेचकर पैसा इकट्ठा करने तक का सारा काम वह स्वयं या उसका परिवार कर लेता था. अगर सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया जाए, तो पता लगेगा कि कच्चा सामान प्राप्त करने से लेकर सुई या कील बेचने तक के काम में लगभग 18 विधियां काम में लाई जाती हैं. सुई या कील बनाने, उस पर पालिश आदि करने में ही एक दर्जन से ज़्यादा विधियां करनी पड़ती हैं. उस व़क्त ये तमाम विधियां वह एक व्यक्ति ही करता था. बाद में उत्पादन बढ़ाने के हेतु को लक्ष्य में रखकर काम का बंटवारा इस ढंग से हो गया कि वे 18 विधियां 1 आदमी न करके प्रत्येक विधि को 1-1 आदमी करे. इस तरह से कुल 18 आदमी सारे काम को करें. निश्चित ही है, जब एक आदमी एक ही काम करता रहेगा तो उसका हाथ उस काम पर रवां हो जाएगा और उस काम का उत्पादन बहुत जल्दी और ज़्यादा से ज़्यादा हो सकेगा. परिणामस्वरूप सुइयों और कीलों का उत्पादन तो दस गुने से भी ज़्यादा बढ़ गया, पर हर एक व्यक्ति को प्रत्येक काम की जानकारी न रही, वे स़िर्फ एकांगी ज्ञाता ही रहे.

धनिकों या समृद्धों की असहाय अवस्था और भी अधिक दयनीय है. अगर आज उन्हें नौकर नहीं मिले तो वे नहीं जानते कि कैसे क्या होगा? वे अपने कपड़े तक नहीं पहन सकते, जब तक सारा साजो-सामान सामने न रख दिया जाए, अपने हाथ-मुंह स्वयं धोने में भी वे हिचकते हैं. आदतें ही उनकी ऐसी पड़ी हुई हैं कि प्रत्येक काम के लिए वे सेवकों पर ही निर्भर रहते हैं. इस अर्थव्यवस्था ने उन्हें इतना अधिक पराधीन बना दिया है कि वे एकदम असहाय-पंगु हो गए हैं.

इन्हीं सब अलग स्तरों पर काम करने वालों को व्यवस्थित करने वाला पूंजीवादी अपने मुना़फे का ध्यान रखकर यह खयाल रखता है कि सब अपना-अपना एकांगी काम ज़्यादा से ज़्यादा दक्षता से करें. कालांतर में हाड़-मांस की मशीन यानी मानव के बदले स्वचालित बिजली की मशीनें काम करने लग गईं. अत: स़िर्फ एक-दो आदमियों से ही सुइयों और कीलों का उत्पादन होने लगा. यही बात सूती या ऊनी कपड़ा बुनने में भी लागू समझिए. एक जमाना था, जब जुलाहों के परिवार भेड़ से ऊन कतरने से लगाकर कपड़ा, कंबल इत्यादि बनाकर बेचने तक का काम करते थे. आज के युग में यह सब काम एक व्यक्ति या एक परिवार कर ही नहीं सकता. परिणाम यह हुआ कि मानव की ज्ञान राशियों में धीरे-धीरे कमी हुई और संपत्ति धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ने से, बढ़ी. यही खास अवगुण पूंजीवादी व्यवस्था में है. मानव को मशीन बना दिया गया है. उसकी ज्ञान राशियों को संकुचित बना दिया गया है.

पराश्रय (पराधीनता)

पूंजीवादी दलील यह है कि अगर मानव एक काम ही करता है तो उसे दिन में थोड़े घंटे काम करने के बाद बाक़ी का समय फुर्सत का मिल जाता है. उस व़क्त वह अपना मनोरंजन कर सकता है. अगर सारे काम का अथ से इति तक उत्तरदायित्व उसी का रहेगा तो उसे कभी भी अवकाश नहीं मिल पाएगा. इसलिए वह मनोरंजन नहीं कर पाएगा. लोगों को मनोरंजन आदि के लिए अवकाश या फुर्सत मिले, इसमें किसी को जरा भी ऐतराज नहीं. शायद हर व्यक्ति के लिए अवकाश या मनोरंजन उतना ही आवश्यक है, जितना काम. शिकायत स़िर्फ इतनी ही है कि काम का ढर्रा जिस ढंग का पूंजीवादी व्यवस्था में बन गया है, उससे व्यक्ति एक-दूसरे पर इतना ज़्यादा आश्रित हो गया है कि कोई भी व्यक्ति अपने आप में कोई काम करने योग्य ही नहीं रह पाता. एक कसब का पूरा जानकार कोई व्यक्ति शायद ही मिले.

सौभाग्यवश भारत के गांवों में अभी तक पूंजीवादी प्रथा का ज़हर इतना नहीं फैला है. अभी भी गांव का बढ़ई, लोहार या मोची अपने-अपने पेशे के संपूर्ण काम ख़ुद कर लेते हैं या अपने परिवार द्वारा ही करवाते हैं. शहरों में यह स्थिति बिल्कुल ही नहीं रही. शहर का बढ़ई या मोची बिल्कुल पराधीन है. जब तक आरे से चीरी हुई लकड़ी नहीं मिलेगी या टेनरी से कमाया हुआ चमड़ा नहीं आएगा, तब तक उनके पास कोई काम नहीं होगा और बाद में भी जिस काम को करने के लिए वे नियत हैं, उससे आगे या पीछे क्या करना होगा, इसकी जरा भी जानकारी उन्हें नहीं है. यह पराधीनता ग़रीबों या श्रमिकों तक ही सीमित हो, ऐसी बात नहीं. घरेलू कामकाज में भी यही हाल है. अगर रसोइया न आया तो या तो होटल का द्वार देखा जाता है या फाके-मस्ती की नौबत आ जाती है.

धनिकों या समृद्धों की असहाय अवस्था और भी अधिक दयनीय है. अगर आज उन्हें नौकर नहीं मिले तो वे नहीं जानते कि कैसे क्या होगा? वे अपने कपड़े तक नहीं पहन सकते, जब तक सारा साजो-सामान सामने न रख दिया जाए, अपने हाथ-मुंह स्वयं धोने में भी वे हिचकते हैं. आदतें ही उनकी ऐसी पड़ी हुई हैं कि प्रत्येक काम के लिए वे सेवकों पर ही निर्भर रहते हैं. इस अर्थव्यवस्था ने उन्हें इतना अधिक पराधीन बना दिया है कि वे एकदम असहाय-पंगु हो गए हैं. घरेलू कामकाज करने वाले एक नौकर या रसोइए को कोई काम न मिले तो भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. उसे दूसरे किसी धंधे या रोज़गार का तो ज्ञान है नहीं. जिस काम का वह जानकार है, वह उसे मिलता नहीं है तो स्थिति दूभर ही होगी. पर उससे भी बुरी दशा उन मालिकों की होगी, जिन्हें कोई सेवक नहीं मिलता. वे अपना व्यक्तिगत कार्य भी कर नहीं सकते. हमेशा दूसरों से ही काम करवाने के वे आदी हैं.

कहने का तात्पर्य यही है कि इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का एक फल यह भी होता है कि आदमी अपने आप एक-दूसरे का दास हो जाता है, असहाय और पराधीन हो जाता है. इस पराधीनता की बेड़ी को तोड़ने में उसका जी घबराता है. चाहे वह मालिक वर्ग का व्यक्ति हो, चाहे नौकर वर्ग का, समान वित्त वितरण चाहते हुए भी, जो चली आ रही अर्थव्यवस्था है, उसे बदलने में सभी घबड़ाहट अनुभव करते हैं. कारण है परवशता. नतीजा यह है कि एक तऱफ तो पूंजीपति, जिनके पास ज़मीन जायदाद और पूंजी है, अपने आप कुछ नहीं कर सकते, पराधीन हैं. दूसरी ओर सेवक, नौकर, मज़दूर या किसान अपने आप कुछ नहीं कर सकते, वे भी पराधीन हैं, मजबूर हैं.

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

महावीर प्रसाद आर मोरारका

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

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महावीर प्रसाद आर मोरारका

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.