बसपा से ग़ायब होते मुस्लिम चेहरे

इन तस्वीरों को ग़ौर से देखिए, यह तस्वीर पांच कालिदास मार्ग लखनऊ स्थित मुख्यमंत्री आवास की है, जहां कई मौलवी और मौलाना नंगे पैर खड़े हैं, जबकि मायावती ख़ुद चमचमाती क़ीमती सैंडिल पहने हुए हैं. दरअसल कुछ साल पहले बसपा सरकार के कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बुलावे पर ये लोग लखनऊ आए थे, लेकिन मुख्यमंत्री से मिलने के व़क्त इन सभी मौलानाओं को सिक्योरिटी ने अपने जूते-चप्पल उतार कर अंदर जाने को कहा. मायावती का यह बर्ताव इन मौलवियों और मौलानाओं को चुभ गया. मायावती के इस रवैये की मज़म्मत बसपा नेता रहे सिराज मेंहदी ने भी की थी. पिछले विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट हासिल कर मुख्यमंत्री बनीं मायावती ने कई ऐसे काम किए, जो मुसलमानों को बेहद नागवार गुजरे. मसलन, उत्तर प्रदेश में जब सपा या भाजपा की सरकार थी, तब रमजान के दौरान मुख्यमंत्री की ओर से इफ्तार पार्टी दी जाती थी, लेकिन मायावती ने उसे बंद कर दिया. इसके अलावा भाजपा और सपा की सरकारों में जब जनता दरबार लगता था तो उसमें कई मुस्लिम चेहरे नज़र आते थे, लेकिन बसपा सरकार में लगने वाले जनता दरबार में दाढ़ी और टोपी वाले मौलाना-मौलवी नज़र नहीं आते. कुछ लोग अगर आते भी हैं तो उन्हें नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पास भेज दिया जाता है. इससे ज़ाहिर होता है कि मुस्लिम वोट हासिल कर उत्तर प्रदेश में हुकूमत करने वाली मायावती ने किस तरह मुसलमानों को नज़रअंदाज़ किया. मायावती ने मुसलमानों से जुड़े सभी मसलों की ज़िम्मेदारी अपने मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी को सौंप दी.

पिछले चुनाव में बसपा के लिए जीने-मरने की कसमें खाने वाले मुस्लिम नेताओं को भी मायावती ने चुन-चुनकर बाहर का रास्ता दिखाया. जहां पहले क़रीब दर्जन भर मुस्लिम नेता थे, वहीं पांच साल में उनकी तादाद महज़ तीन या चार रह गई है. मेरठ से हाज़ी याकूब कुरैशी, बिजनौर से शाहनवाज़ राणा, बाराबंकी से फ़रीद महफूज किदवई, बरेली से सहजिल इस्लाम, मुरादाबाद से अकबर हुसैन, बदायूं से मोहम्मद मुस्लिम ख़ान, रामपुर से नवाब काज़िम अली ख़ान और पीलीभीत से अनीस ख़ान आदि वे विधायक हैं, जो कल तक मायावती और उनकी पार्टी बसपा के ख़ास चेहरे हुआ करते थे. इन मुस्लिम नेताओं ने 2007 के चुनाव में मायावती की सरकार बनाने में अहम किरदार निभाया था. लिहाज़ा बसपा को मुस्लिम मतदाताओं का पूरा साथ मिला. यही वजह थी कि बसपा ने राज्य के कई मुस्लिम बहुल इलाक़ों में कामयाबी हासिल की. उसके 61 मुस्लिम उम्मीदवारों में से 30 ने जीत का परचम लहराया था, लेकिन अगले महीने होने जा रहे विधानसभा चुनाव में राज्य के मुस्लिम मतदाता अगर बसपा को ख़ारिज कर दें तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी, क्योंकि उसके दिग्गज मुस्लिम नेताओं ने उसका साथ छोड़ दिया है.

ज़्यादातर नेताओं को मायावती ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया तो कईयों ने अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ दी. जिन लोगों को बसपा से निकाला गया, उन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं. फिलहाल मायावती के दरबार में तीन मुस्लिम चेहरे बचे हैं, जिनमें बांदा से विधायक एवं बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, राज्यसभा सदस्य मुनकाद अली और हरदोई से विधायक अब्दुल मन्नान शामिल हैं. बसपा से निकाले गए नेताओं का आरोप है कि नसीमुद्दीन पर भ्रष्टाचार के कई मामले चल रहे हैं, लेकिन मायावती सरकार में उन्हें कोई ख़तरा नहीं है. इससे साबित होता है कि मायावती ने किस कदर मुसलमानों के जज़्बातों को चोट पहुंचाई है. अब जबकि अगले महीने विधानसभा चुनाव हैं, सभी पार्टियों की कोशिश है कि वे अधिक से अधिक मुस्लिम वोट अपने पक्ष में कर सकें. सत्तारूढ़ बसपा पांच साल पहले इस मामले में कहीं अच्छी हालत में थी. उसके पास कई मुस्लिम चेहरे थे, लेकिन अब उनकी संख्या महज़ गिनती में रह गई है. ऐसे में इस बार मुसलमानों का वोट बसपा के पक्ष में जाए, इसकी संभावना कम है.

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।
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अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

  • adil siddiqui

    चौथी दुनिया के संपादक जी
    बसपा से इस एक ऐसा मुस्लिम नेता था जो बसपा के सर्कार में होते हुए भी बसपा से risine दी इलियास आज़मी वो सक्स्यत है जो पर्लिअमेंट में उन के नाम के कई रिकॉर्ड है उन में एक एक ये भी है आज़ादी के बाद से पर्लिअमेंट में सबसे जादा बोलने वाले एकलौते संसद है आज़मी साहेब मुसलमानों के सबसे बड़े रहनुमा कैडे मिल्लत डॉ फरदी के साथ और उनके विचरो और सिधांत पर चलते है काशीराम साहेब के साथ भी काम किया है कशी राम इलियास आज़मी की मुलाकात तब हुए जब कशी राम अपनी पार्टी का रगेस्त्रतिओन करने गए थे