उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र जहां मुलायम सिंह ने मुसलमानों की रहनुमाई का किरदार निभाने के लिए आज़म खां को आगे कर रखा है. खरी बात कहने वाले आज़म खां फायर ब्रांड मुस्लिम नेता हैं. मुलायम के साथ अधिकतर जनसभाओं में मंच पर एक साथ संगत करते हुए देखे जाते हैं. बसपा नेत्री मायावती ने मुस्लिम वर्ग के बुंदेलखंड के क़द्दावर नेता नसीमुद्दीन को मुस्लिम वोटों के लिए बागडोर सौंप रखी है. उनके पास क़रीब डेढ़ दर्जन से अधिक विभाग हैं. जब-जब उत्तर प्रदेश में माया सरकार आई, तब-तब उन्हें भारी भरकम विभागों का दायित्व मिला. पार्टी के हर छोटे-बड़े निर्णयों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. मुसलमानों को पार्टी से जोड़ने का ज़िम्मा नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी ही संभालते रहे हैं. कांग्रेस ने मुस्लिमों की दमदार वकालत के लिए केंद्रीय क़ानून मंत्री सलमान खुर्शीद के हाथ कमान सौंप रखी है. सलमान खुर्शीद के बारे में यह कहा जाता है कि सोनिया के दरबार में सलमान की खासी चलती है. अगर कांग्रेस यूपी में सत्ता में आती है, तो निश्चित ही मुसलमानों के लिए वह का़फी कारगर साबित हो सकते हैं. रालोद ने हाजी याक़ूब क़ुरैशी को मुस्लिम वोटों को अपने पाले में करने के लिए अगुवाकार बनाया है. वहीं भारतीय जनता पार्टी ने मुख्तार अब्बास नक़वी को आगे किया है. वह रामपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं. वर्तमान में भाजपा के महासचिव और मीडिया प्रभारी हैं. सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अख्तियार करने वाली बहुजन समाज पार्टी ने 2007 के चुनाव में 61 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, वहीं 2012 में उसने उनकी संख्या बढ़ाकर 85 कर दी है. समाजवादी पार्टी ने 2007 में 57 मुस्लिम उम्मीदवारों को प्रत्याशी बनाया था, जबकि इस बार 2012 में यह संख्या बढ़ाकर 84 कर दी है. इससे ज़ाहिर होता है कि सपा और बसपा में मुस्लिम वोटों को लेकर बड़ी प्रतिद्वंद्विता है. दोनों को ही मुस्लिमों पर ज़्यादा भरोसा दिख रहा है. दोनों दल मुस्लिमों के हमदर्द बनने में पीछे नहीं रहना चाहते. कांग्रेस भी अपने प्रति मुस्लिम रुझान को कम नहीं आंक रही है. उसे लगने लगा है कि अब उसकी बारी मुस्लिम वोट लेने की आ चुकी है. इसलिए कांग्रेस ने मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या वर्ष 2007 के म़ुकाबले 2012 में 56 की जगह 61 कर दी है. इससे जान पड़ता है कि कांग्रेस की मुसलमानों के बीच स्वीकार्यता बढ़ी है. भाजपा मुस्लिम प्रत्याशियों के बारे में सबसे पीछे है. जहां उसने 2007 में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं उतारा था.
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