ख़त्म होता नक्सलियों का ख़ौ़फ

जन लोकपाल बिल पर सरकार और टीम अन्ना के बीच जारी बवाल, रिटेल में विदेशी निवेश पर सरकार, उसके सहयोगी दलों एवं विपक्ष के बीच मचे घमासान और गृहमंत्री चिदंबरम पर एक के बाद एक लग रहे आरोपों के बीच देश में कई अहम खबरें गुम सी हो गईं. हर दिन या तो अन्ना हजारे कोई ऐलान करते हैं या कांग्रेस का कोई नेता अन्ना पर हमला करता है या किसी न किसी वजह से संसद में हंगामा हो जाता है या अदालत कोई ऐसा फैसला सुना देती है या फिर कोई और टिप्पणी कर देता है, जो सुर्खियां बनकर मीडिया में छा जाता है. देश भर में हुए हालिया उपचुनावों के नतीजों के कई गंभीर निहितार्थ निकले, जिन पर मीडिया में न तो मंथन हो पाया और न ढंग से उस पर चर्चा हो सकी. अखबारों में कहीं किसी कोने-अंतरे में वैसी खबरें दब गईं और न्यूज चैनलों में तो तवज्जो ही नहीं मिल पाई. अगर हम उड़ीसा विधानसभा के लिए हुए उपचुनावों के नतीजों का विश्लेषण करें तो साफ तौर पर यह देखा जा सकता है कि वहां माओवादियों का असर कम होना शुरू हो गया है. जिन इलाकों में माओवादियों को लंबे समय से आदिवासियों से हर तरह का समर्थन मिल रहा था, वहां भी अब वे लगभग बेअसर होने लगे हैं.

पहले पार्टी ने अपने उन दर्जन भर नेताओं की एक सूची जारी की थी, जो मीडिया में पार्टी का पक्ष रखेंगे, लेकिन उन नेताओं का कहीं अता-पता नहीं है. नतीजा यह हुआ कि सरकार के प्रयत्नों से समाज में जो सकारात्मक बदलाव आए, उनका प्रचार नहीं हो सका. वहीं विपक्ष और टीम अन्ना ने बढ़-चढ़कर सरकार की नाकामियों को मीडिया के जरिए जनता तक पहुंचाया. अभी हाल में दस युवा मंत्रियों को सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने का जिम्मा दिया गया, लेकिन ये युवा मंत्री भी गाहे-बगाहे ही नज़र आते हैं. नतीजा यह हो रहा है कि सरकार की उपलब्धियां जनता तक नहीं पहुंच पा रही हैं.

उड़ीसा के आदिवासी बहुल जिले नवरंगपुर के उमरकोट विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नज़र डालें तो नक्सलियों के समर्थन में आ रही इस कमी को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है. चुनाव के ऐन पहले माओवादियों ने नक्सल प्रभावित उमरकोट विधानसभा में आदिवासियों को चुनाव का बहिष्कार करने का फरमान जारी कर दिया, लेकिन नक्सलियों के उस फरमान को धता बताते हुए आदिवासियों ने बड़ी संख्या में मतदान किया. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, पचहत्तर फीसदी से ज़्यादा आदिवासियों ने वोट डाले. इसी विधानसभा के छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे रायगढ़ इलाके में, जो दशकों से माओवादियों का गढ़ माना जाता है, सबसे ज़्यादा मतदान हुआ. गौरतलब है कि यह वही रायगढ़ है, जहां माओवादियों ने एक जनसभा के  दौरान बीजू जनता दल के विधायक जगबंधु मांझी की नृशंस तरीके से हत्या कर दी थी. मांझी की मौत के बाद हुए इस उपचुनाव में नक्सलियों द्वारा बहिष्कार के फरमान के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में मतदान होना नक्सलियों के कमजोर पड़ने की निशानी है. इस पूरे इलाके में जबरदस्त मतदान का फायदा सत्तारूढ़ बीजू जनता दल के उम्मीदवार को हुआ, जिसने तकरीबन बीस हजार वोटों से जीत हासिल की. माओवादियों ने चुनाव के बहिष्कार के साथ-साथ बीजू जनता दल के खिलाफ भी अपनी राय जाहिर की थी, जो लगभग बेअसर रही.

उपचुनावों के नतीजों और नक्सलियों द्वारा चुनाव के बहिष्कार के अलावा भी उड़ीसा में काफी कुछ घटित हो रहा है, जिसे अगर रेखांकित किया जाए तो माओवादियों के लगातार कमजोर होते जाने की तस्वीर सामने आती है. माओवादियों के वरिष्ठ नेता किशन जी को जब पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था तो माओवादियों ने दो दिनों के बंद का ऐलान किया था. उस बंद का भी कोई असर उड़ीसा और झारखंड के कई इलाकों में देखने को नहीं मिला. मलकानगिरी, जो उड़ीसा का सबसे ज़्यादा नक्सल प्रभावित क्षेत्र माना जाता है, में यह बंद लगभग बेअसर रहा. आदिवासी इलाकों के लड़के-लड़कियां अपने स्कूल-कॉलेज पहुंचे. बंद के दौरान छात्रों का ऐसा व्यवहार अब तक इस इलाके में कभी नहीं देखा गया था. मलकानगिरी जैसे नक्सलियों के गढ़ में तो बंद के ऐलान के बाद कर्फ्यू जैसे हालात हो जाते थे. सड़कों पर सन्नाटा और पूरे इलाके में कामकाज ठप. नक्सलियों का खौफ इतना ज़्यादा था कि बंद के दौरान मां-बाप अपने बच्चों को घर से बाहर तक नहीं निकलने देते थे. यही हाल झारखंड के डाल्टनगंज और पलामू जिलों में देखने को मिला. दो दिन के बंद के दौरान स्कूल-कॉलेजों में छात्र पहुंचे, लोग सड़कों पर निकले, अपने कार्यालय पहुंचे, सड़कों पर गाड़ियां चलीं. सबसे आश्चर्यजनक बात तो उड़ीसा के नुआपाड़ा में देखने को मिली. वहां नक्सलियों ने यातायात बंद करने के लिए पेड़ काटकर सड़क पर डाल दिया था. स्थानीय नागरिकों ने नक्सलियों से डरे बगैर पेड़ हटाकर सड़क को यातायात के लिए खोल दिया. पहले यह काम सुरक्षाबल करते थे. स्थानीय जनता के इस कदम को भी नक्सलियों के घटते प्रभाव के तौर पर देखा गया.

दरअसल यह सब दो वजहों से हो रहा है. एक तो राज्य और केंद्र सरकार खामोशी के साथ मिलकर इन इलाकों में नक्सलियों का प्रभाव कम करने की दिशा में काम कर रही हैं, जिसके थोड़े-बहुत नतीजे अब दिखाई देने लगे हैं. नक्सल प्रभावित इलाकों में केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर समग्र विकास के प्रयास किए. आदिवासियों को सत्ता के भय से मुक्त किया और उनके शोषण पर लगाम लगाकर उनका विश्वास हासिल करने में आंशिक सफलता भी हासिल की. अर्द्धसैनिक बलों ने नक्सल प्रभावित इलाकों में आदिवासियों का विश्वास जीतने के फॉर्मूले पर काम किया और बहुत हद तक सफलता भी पाई. सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि आदिवासियों का जितना भरोसा सरकार या सत्ता पर बढ़ेगा, उतना ही नक्सलियों को समर्थन मिलना कम होगा. नक्सलियों को समर्थन मिलना कम होने की एक और वजह है, जो सामाजिक है, वह यह कि अब इस आंदोलन में आपराधिक तत्वों का प्रवेश हो गया है, जो आंदोलन के नाम पर इलाके में वसूली करते हैं, पैसे वालों का अपहरण करके फिरौती वसूलते हैं. इस तरह की भी कई खबरें सामने आईं, जिनमें पता चला कि माओवादियों ने लड़कियों को जबरन अपने साथ रखकर उनसे बलात्कार किया. सिद्धांतों एवं विचारों का स्थान लूटपाट और चोरी-डकैती ने ले लिया. जबरन हफ्ता वसूली, फिरौती, लड़कियों एवं महिलाओं के साथ बढ़ती बदसलूकी, आंदोलन के नाम पर हत्या जैसी वारदातों ने आम जनता के मन में नक्सलियों के प्रति नफरत का भाव पैदा कर दिया. जो आदिवासी नक्सलियों को तन-मन-धन से समर्थन दे रहे थे, वे अब डर से समर्थन देने लगे, लेकिन डर, खौफ या भय से मिला समर्थन ज़्यादा दिनों तक चलता नहीं है और जैसे ही मौका मिलता है, वही समर्थन विरोध का स्वर बनकर खड़ा हो जाता है. माओवादियों के साथ भी वही हुआ. जैसे ही आदिवासी इलाकों की जनता का माओवादियों से मन टूटा और राज्य सत्ता में भरोसा कायम हुआ, वैसे ही विरोध के स्वर उठने लगे और फिर जब भी मौका मिला, विरोध या तो मुखर या मौन के रूप में सामने आया. अब जरूरत इस बात की है कि इस बदलाव की अहमियत को समझते हुए राज्य सत्ता आदिवासियों का भरोसा तो जीते ही, उनके दिलों को भी जीतने की कोशिश करे, ताकि नक्सल समस्या का जड़ से अंत किया जा सके, लेकिन ऐसा लगता है कि लोकपाल के शोरगुल में इस देश के शासक वर्ग और जनता, दोनों का इस समस्या से ध्यान लगभग हट सा गया है. नक्सलवाद हमारे देश के लिए एक ऐसी समस्या है, जो लगभग नासूर की शक्ल अख्तियार कर चुकी है.

ऐसे में इस समस्या में अगर थोड़ा भी सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है तो उसका प्रचार-प्रसार होना चाहिए. इसका फायदा यह होगा कि नक्सल प्रभावित दूसरे इलाकों में सरकार के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ेगा और नक्सलियों के प्रति भरोसा घटेगा. भरोसे की इसी बढ़त-घटत में इस समस्या का समाधान निकलेगा, लेकिन केंद्र में सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी अपनी कामयाबियों को जनता तक पहुंचाने के लिए प्रयत्नशील ही नहीं है. कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता जनता से संवाद नहीं कर पा रहे हैं, अपनी कामयाबियों को जनता तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं. पहले पार्टी ने अपने उन दर्जन भर नेताओं की एक सूची जारी की थी, जो मीडिया में पार्टी का पक्ष रखेंगे, लेकिन उन नेताओं का कहीं अता-पता नहीं है. नतीजा यह हुआ कि सरकार के प्रयत्नों से समाज में जो सकारात्मक बदलाव आए, उनका प्रचार नहीं हो सका. वहीं विपक्ष और टीम अन्ना ने बढ़-चढ़कर सरकार की नाकामियों को मीडिया के जरिए जनता तक पहुंचाया. अभी हाल में दस युवा मंत्रियों को सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने का जिम्मा दिया गया, लेकिन ये युवा मंत्री भी गाहे-बगाहे ही नज़र आते हैं. नतीजा यह हो रहा है कि सरकार की उपलब्धियां जनता तक नहीं पहुंच पा रही हैं. लंबे समय से नक्सलियों का बड़ा हमला नहीं हुआ है, किशन जी को मारकर नक्सलियों की कमर तोड़ दी गई, लेकिन इन कामयाबियों को नक्सल इलाकों में पहुंचा कर वहां की जनता का विश्वास जीतने का प्रयास नहीं किया जा रहा है. गरीबों के लिए भोजन की गारंटी देने वाला ऐतिहासिक कानून आने वाला है, जिसका बड़ा फायदा जंगलों में रहने वालों को होगा, यह बात भी उन इलाकों में नहीं पहुंच पा रही है. यूपीए सरकार अपने पहले कार्यकाल में अपनी हर छोटी-बड़ी उपलब्धि का ढिंढोरा पीटती नज़र आती थी, लेकिन अब वह आलस्य में डूबी नज़र आ रही है. वक्त आ गया है कि सरकार के कर्ताधर्ता सत्ता के मद से बाहर निकलें और जनता से संवाद स्थापित करें, ताकि नक्सलवाद की समस्या को जड़ से खत्म किया जा सके.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)

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