भिक्षावृत्ति की आवश्यकता

संभव है, कुछ लोगों के मन में संदेह उत्पन्न हो कि जब बाबा इतने श्रेष्ठ पुरुष थे तो फिर उन्होंने आजीवन भिक्षावृत्ति पर ही क्यों निर्वाह किया. यह प्रश्न दो दृष्टिकोण सामने रखकर हल किया जा सकता है. पहला दृष्टिकोण यह कि भिक्षावृत्ति पर निर्वाह करने का कौन अधिकारी है. शास्त्रानुसार वे व्यक्ति, जिन्होंने तीन मुख्य आसक्तियों, कामिनी, कांचन और कीर्ति का त्याग करके आसक्ति मुक्त होकर संन्यास ग्रहण कर लिया हो, भिक्षावृत्ति के उपयुक्त अधिकारी हैं, क्योंकि वे अपने गृह में भोजन तैयार कराने का प्रबंध नहीं कर सकते. अत: उन्हें भोजन कराने का भार गृहस्थों पर ही है. श्री साई बाबा न तो गृहस्थ थे और न वानप्रस्थी. वह तो बाल ब्रह्मचारी थे. उनकी यह दृढ़ भावना थी कि विश्व ही मेरा गृह है. वह तो स्वयं ही भगवान वासुदेव, विश्वपालनकर्ता एवं पारब्रह्म थे. अत: वह भिक्षा उपार्जन के पूर्ण अधिकारी थे. दूसरा दृष्टिकोण यह कि पंचसूना यानी पांच पाप और उनका प्रायश्चित. सबको ज्ञात है कि भोजन सामग्री या रसोई बनाने के लिए गृहस्थाश्रमियों को पांच प्रकार की क्रियाएं करनी पड़ती हैं, कंडणी (पीसना), पेषणी (दलना), उदकुंभी (बर्तन मलना), मार्जनी (मांजना और धोना) और चूली (चूल्हा सुलगाना). इन क्रियाओं के परिणाम स्वरूप अनेक कीटाणुओं एवं जीवों का नाश होता है और इस प्रकार गृहस्थाश्रमियों को पाप लगता है. उन पापों के प्रायश्चित स्वरूप शास्त्रों ने पांच प्रकार के याग (यज्ञ) करने की आज्ञा दी है:-

1.         ब्रह्मयज्ञ यानी वेदाध्ययन: ब्रह्म को अर्पण करना या वेद का अध्ययन करना.

2.         पितृयज्ञ: पूर्वजों को दान.

3.         देवयज्ञ: देवताओं को बलि.

4.         भूतयज्ञ: प्राणियों को दान.

5.         मनुष्य (अतिथि) यज्ञ: मनुष्यों (अतिथियों) को दान.

यदि ये कर्म विधिपूर्वक शास्त्रानुसार किए जाएं तो चित्त शुद्ध होकर ज्ञान और आत्मानुभूति की प्राप्ति सुलभ हो जाती है. बाबा द्वार-द्वार जाकर गृहस्थाश्रमियों को इस पवित्र कर्तव्य की स्मृति दिलाते रहते थे और वे लोग अत्यंत भाग्यशाली थे, जिन्हें घर बैठे ही बाबा से शिक्षा ग्रहण करने का अवसर मिल जाता था. तर्खड कुटुंब (पिता और पुत्र) श्री रामचंद्र आत्माराम उपनाम बाबा साहेब तर्खड पहले प्रार्थना समाजी थे, तथापि वह बाबा के परम भक्त थे. उनकी स्त्री और पुत्र तो बाबा के एकनिष्ठ भक्त थे. एक बार उन्होंने निश्चय किया कि पुत्र एवं उसकी मां ग्रीष्मकालीन छुट्टियां शिरडी में ही व्यतीत करें, परंतु पुत्र बांद्रा छोड़ने को सहमत न हुआ. उसे भय था कि बाबा का पूजन घर में विधिपूर्वक न हो सकेगा, क्योंकि पिता जी प्रार्थना समाजी हैं और संभव है कि वह श्री साई बाबा के पूजनादि का उचित ध्यान न रख सकें, परंतु पिता द्वारा यह आश्वासन देने पर कि पूजन यथाविधि ही होता रहेगा, मां और पुत्र ने एक शुक्रवार की रात्रि में शिरडी को प्रस्थान कर दिया.

दूसरे दिन शनिवार को श्रीमान तर्खड ब्रह्म मुहूर्त में उठे और स्नानादि करके पूजन प्रारंभ करने के पूर्व बाबा के समक्ष साष्टांग दंडवत करके बोले, हे बाबा, मैं ठीक वैसे ही आपका पूजन करता रहूंगा, जैसे मेरा पुत्र करता रहा है, परंतु कृपा करके इसे शारीरिक परिश्रम तक ही सीमित न रखना. ऐसा कहकर उन्होंने पूजन आरंभ किया और मिश्री का नैवेद्य अर्पित किया, जो दोपहर के भोजन के समय प्रसाद के रूप में वितरित कर दिया गया. उस दिन की संध्या एवं अगला दिन इतवार भी निर्विघ्न व्यतीत हो गया. सोमवार को उन्हें ऑफिस जाना था, परंतु वह दिन भी निर्विघ्न निकल गया. श्री तर्खड ने अपने जीवन में इस प्रकार कभी पूजा नहीं की थी. उनके हृदय में अति संतोष हुआ कि पुत्र को दिए गए वचनानुसार पूजा यथाक्रम संतोषपूर्वक चल रही है. अगले दिन मंगलवार को सदैव की भांति उन्होंने पूजा की और ऑफिस चले गए. दोपहर को घर लौटने पर जब वह भोजन को बैठे तो थाली में प्रसाद न देखकर उन्होंने अपने रसोइए से इस संबंध में प्रश्न किया. उसने बताया कि आज विस्मृतिवश वह नैवेद्य अर्पण करना भूल गए हैं. यह सुनकर वह तुरंत अपने आसन से उठे और बाबा को दंडवत करके क्षमा याचना करने लगे तथा उनसे उचित पथ प्रदर्शन न करने व पूजन को केवल शारीरिक परिश्रम तक ही सीमित रखने के लिए उलाहना देने लगे. उन्होंने संपूर्ण घटना का विवरण अपने पुत्र को पत्र द्वारा सूचित किया और उससे प्रार्थना की कि वह पत्र बाबा के श्रीचरणों पर रखकर उनसे कहे कि वह इस अपराध के लिए क्षमा प्रार्थी हैं. यह घटना बांद्रा में लगभग दोपहर को हुई थी और उसी समय शिरडी में जब दोपहर की आरती प्रारंभ होने ही वाली थी कि बाबा ने श्रीमती तर्खड से कहा,  मां, मैं कुछ भोजन पाने के विचार से तुम्हारे घर बांद्रा गया था. द्वार पर ताला लगा देखकर भी मैंने किसी प्रकार गृह में प्रवेश किया, परंतु वहां देखा कि भाऊ (श्री तर्खड) मेरे लिए कुछ भी खाने को नहीं रख गए हैं. अत: आज मैं भूखा ही लौट आया हूं. किसी को भी बाबा के वचनों का अभिप्राय समझ में नहीं आया, परंतु श्री तर्खड का पुत्र, जो समीप ही खड़ा था, सब कुछ समझ गया कि बांद्रा में पूजन में कुछ तो त्रुटि हो गई है, इसलिए वह बाबा से लौटने की अनुमति मांगने लगा, परंतु बाबा ने आज्ञा न दी और वहीं पूजन करने का आदेश दिया. तर्खड के पुत्र ने शिरडी में जो कुछ हुआ, उसे पत्र में लिखकर पिता को भेजा और भविष्य में पूजन में सावधानी बरतने के लिए विनती की. दोनों पत्र डाक द्वारा दूसरे दिन दोनों पक्षों को मिले. क्या यह घटना आश्चर्यपूर्ण नहीं है?

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