नई संसद लोकपाल बिल पास करे

एक बार फिर लोकपाल विधेयक को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. मानों यह एक पहेली बन गया हो. पहले सरकार को खुदरा बाज़ार में एफडीआई पर पीछे लौटना पड़ा और अब लगता है कि उसे पेंशन और कंपनी बिल के मामलों में भी ऐसा ही करना पड़ेगा. ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ख़ुद अपने ही निर्णय में उलझ गई हो, कैद हो गई हो. यह इस देश के लिए अच्छा नहीं है. इसे एक अच्छा शगुन नहीं माना जा सकता है. हर समय यह ज़रूरी है कि देश में एक प्रभावशाली सरकार हो, वह प्रभावी ढंग से काम करे, ताकि देश में अराजकता का माहौल न बने. टीम अन्ना अपनी मांगें रख सकती है, धरना दे सकती है, प्रदर्शन कर सकती है, जेल भरो आंदोलन चला सकती है, रैली कर सकती है.

कोई आदमी इस स्थिति में काम नहीं कर सकता और न एक ऐसा प्रधानमंत्री हो सकता है, जो यह कहे कि वह एक मज़बूत लोकपाल के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है. टीम अन्ना द्वारा डेडलाइन दिए जाने से स़िर्फ दबाव बढ़ा है, न कि यह एक अच्छा निर्णय कर पाने में सहायक साबित हुआ. अन्ना ने जब अपना अभियान शुरू किया और उसके बाद इतने महीने बीत गए, तब क्या किया जा सकता है? सच तो यह है कि एक अच्छे लोकतंत्र में इसका सही जवाब है, चुनाव. जनता को अपना नया प्रतिनिधि चुनना चाहिए, जो उसकी आकांक्षाओं पर खरा उतर सके, बेहतर काम कर सके.

देश में अराजकता न फैले, यह देखने और रोकने की ज़िम्मेदारी टीम अन्ना की नहीं है. सरकार अन्ना को संतुष्ट करने के लिए बहुत कुछ कर चुकी है और बहुत कोशिश भी कर चुकी है. ऐसी स्थिति एक उत्तरदायी और कार्यशील लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं मानी जा सकती है.

कोई आदमी इस स्थिति में काम नहीं कर सकता और न एक ऐसा प्रधानमंत्री हो सकता है, जो यह कहे कि वह एक मज़बूत लोकपाल के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है. टीम अन्ना द्वारा डेडलाइन दिए जाने से स़िर्फ दबाव बढ़ा है, न कि यह एक अच्छा निर्णय कर पाने में सहायक साबित हुआ. अन्ना ने जब अपना अभियान शुरू किया और उसके बाद इतने महीने बीत गए, तब क्या किया जा सकता है? सच तो यह है कि एक अच्छे लोकतंत्र में इसका सही जवाब है, चुनाव. जनता को अपना नया प्रतिनिधि चुनना चाहिए, जो उसकी आकांक्षाओं पर खरा उतर सके, बेहतर काम कर सके. यदि अन्ना राजनीति में न भी कूदना चाहें तो ऐसे लोग, जो अन्ना के समर्थक हैं, वे एक अपनी पार्टी बनाकर या व्यक्तिगत रूप से चुनाव मैदान में जा सकते हैं.

यदि 25 युवा भी, जो किसी वर्तमान पार्टी से संबद्ध न हों, चुनाव जीतकर संसद में पहुंच जाएं तो एक बड़ा बदलाव हो सकता है. अभी सारे सांसद एक लिखी हुई पटकथा के मुताबिक़ संसद में बोलते हैं. बहुत कम ही सांसद अपनी व्यक्तिगत भावना को संसद में रख पाते हैं. लगभग सभी सांसद अपनी पार्टी की राय को ही संसद में रखते हैं. ज़ाहिर है, ऐसे में युवा अन्ना के समर्थन से चुनाव लड़ें. नई समस्याओं के लिए नए समाधान की ज़रूरत होती है. ऐसे लोग, जो अन्ना का समर्थन कर रहे हैं, एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर चुनाव का आह्वान करें, कोई बड़ा वायदा न करें. सरकार पर इस बात का दबाव बनाना चाहिए कि वह संसद भंग करे, नया चुनाव हो और तब तक लोकपाल बिल पर कुछ न हो. नई संसद ही इस बिल को देखे और पास करे.

loading...