सबका मालिक एक : साईं बाबा

शिरडी ही साई बाबा है और साई बाबा ही शिरडी, एक-दूसरे का प्रत्यक्ष पर्यायवाची होने के साथ-साथ यह आध्यात्मिक भी है. साई शब्द के उच्चारण से आशा और आदर का भाव उत्पन्न होता है. साई बाबा को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है. ऐसा माना जाता है कि साई बाबा 1858 में औरंगाबाद से एक शादी समारोह में शिरडी आए थे. उन्होंने सबसे पहला शिविर खंडूबा मंदिर में लगाया था. वर्तमान समय में यह मंदिर श्री साई बाबा संस्थान के सामने स्थित है. आरंभ में खंडूबा मंदिर के पुरोहित भगत महालसापति थे. उन्होंने साई बाबा का स्वागत किया, आओ साई कहकर. साई एक संत के रूप में जाने जाते हैं. पश्चिम महाराष्ट्र स्थित शिरडी भारत का प्रमुख धार्मिक स्थान है. कोई भी श्री साई बाबा की पृष्ठभूमि के बारे में बहुत अधिक नहीं जानता है. साई बाबा ने महालसापति से कहा था कि उनका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था, लेकिन उन्हें बड़ा किसी मुस्लिम फकीर ने किया था. साई लोगों के घर-घर जाकर उनसे अल्ला मालिक कहकर भिक्षा मांगा करते थे. बहुत सारे लोग उन्हें बाबा कहकर बुलाते थे. बाबा प्रत्येक व्यक्ति से रात-दिन, सप्ताह के सातों दिन ईश्वर का स्मरण करने के लिए कहा करते थे, जिसे नामसप्तक के नाम से जाना जाता है. बाबा का कहना था कि दाकूरनाथ, विट्ठल और रणछोड़ (सभी कृष्ण के नाम), ये सब भी शिरडी में निवास करते हैं.

शिरडी में सबसे प्रमुख समाधि मंदिर है, जिसका निर्माण भगवान विट्ठल ने किया था. इस मंदिर का वास्तविक नाम भुट्टीवाड़ा है. गोपाल भुट्टी बाबा के बहुत बड़े उपासक थे. बाबा ने भुट्टी से कहा था, मैं एक दिन वापस यहां रहने के लिए आऊंगा. साई बाबा की मृत्यु 15 अक्टूबर, 1918 को हुई. वर्तमान समय में शिरडी में साई बाबा की सफेद संगमरमर की समाधि और एक बड़ी सी मूर्ति है. इस सर्वोत्तम मूर्ति की रचना मुंबई के मूर्तिकार भाहू साहब तलिम ने 1954 में की थी. भगवान विट्ठल की मूर्ति को शिरडी स्थित दीक्षित वाड़ा संग्रहालय में रखा गया है. श्री साई बाबा संस्थान एक विशाल प्रशासकीय इमारत और आध्यात्मिक मंदिर है. यहां स्थित शांति निवास में श्री साई वेंगमे कर्कशा नामक एक पुस्तकालय भी है. समाधि मंदिर में साई बाबा की समाधि है. प्रवेश स्थान से समाधि मंदिर की दूरी लगभग 800 मीटर है. यहां आए तीर्थयात्रियों के विश्राम के लिए अनेक बेंच लगाई गई हैं. मंदिर में भक्तों की भीड़ हमेशा रहती है. मंदिर में चार बार आरती होती है. सुबह 5.15 पर होने वाली कक्कड़ आरती सबसे प्रमुख है. शिरडी में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहार गुरु पूर्णिमा, दशहरा और रामनवमी हैं. इन त्योहारों के समय समाधि मंदिर 24 घंटे के लिए खुला रहता है.

श्री साई बाबा अपने जीवन के अंतिम क्षणों में द्वारकामाई में ही ठहरे थे. द्वारकामाई एक पुरानी उबड़-खाबड़ मस्जिदनुमा कोठी थी, यहां बैठकर वह लोगों की समस्याओं, बीमारियों और चिंताओं को दूर करते थे. साई बाबा इसी द्वारकामाई में आकर रहने लगे. उनका मानना था कि सबका मालिक एक है. द्वारकामाई के प्रथम तल पर बाबा की फोटो और एक बड़ा पत्थर रखा है, जिस पर बाबा बैठा करते थे. यहां पर दो कमरे हैं. पहले कमरे में रथ और दूसरे में पालकी रखी है. पत्थर का एक चौकोर स्टूल भी है, जिसका इस्तेमाल बाबा नहाने के लिए करते थे. द्वारकामाई मस्जिद समाधि मंदिर के प्रवेश द्वार के दाईं ओर स्थित है. गुरुस्थान एक छोटा सा मंदिर है. इसमें शिवलिंग और साई बाबा की तस्वीर है. इस मंदिर में गुरुवार और शुक्रवार को बड़ी संख्या में भक्तजन आते हैं. यह वह स्थान है, जहां साई बाबा ने पहली बार शिरडी में बाल योगी के रूप में प्रवेश किया था. इसीलिए इसे गुरुस्थान के रूप में जाना जाता है. यहां एक छोटी सी मस्जिद भी है. मंदिर के प्रवेश द्वार पर शिवलिंग और नंदी का चित्र बना हुआ है. इसके अलावा मंदिर में बारह ज्योर्तिलिंगों के भी चित्र लगे हैं. द्वारकामाई से थोड़ी ही दूरी पर साई बाबा की चावड़ी है. इस स्थान का प्रयोग बाबा सोने के लिए करते थे. चावड़ी दो भागों में विभाजित है. चावड़ी के पहले हिस्से में बाबा की एक बहुत बड़ी फोटो लगी है, वहीं दूसरे हिस्से में लकड़ी का पलंग और सफेद कुर्सी रखी है. अब्दुल बाबा की झोपड़ी से कुछ ही दूर मारुति मंदिर है. इस मंदिर में साई बाबा देवीदास (बाल योगी) के साथ सत्संग के लिए आते थे. देवीदास इस मंदिर में साई बाबा के आगमन से दस-बारह साल पहले से रह रहे थे. इसके अलावा यहां शिरडी शनि, गणपति और शंकर नाम से मंदिर भी हैं. गुरुस्थान से थोड़ी सी दूरी पर लेंडी बाग है. इसे स्वयं बाबा ने बनाया था. वह हर रोज यहां स्वयं पानी दिया करते थे. बाबा ने इस बाग को नुल्लाहा नाम दिया. इस बाग में बाबा सुबह-शाम नीम के पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिए आते थे. इस बाग में आठ जगहों पर संगमरमर के पत्थरों से बने दीपगृह (नंदा दीप) हैं. यहां एक तरफ पीपल का पेड़ है, दूसरी ओर नीम का. खंडूबा मंदिर मुख्य मार्ग पर स्थित है. इसी मंदिर में पुजारी महालसापति ने साई बाबा का स्वागत आओ साई कहकर किया था. इस मंदिर में खंडूबा, बानाई और महलसाई की मूर्तियां हैं.