पाकिस्तान : सरकार और सेना आमने-सामने

पाकिस्तान में सरकार और सेना के बीच विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है. हालांकि सरकार भी यह कोशिश कर रही है कि इस विवाद का ख़ुलासा न हो, इसलिए जैसे ही मीडिया में ख़बर आई कि सरकार सेना प्रमुख एवं आईएसआई प्रमुख को हटाना चाहती है तो प्रधानमंत्री गिलानी ने विरोध में अपना बयान जारी किया कि ऐसी अफवाह सरकार को अस्थिर करने के लिए फैलाई जा रही है. उनका कहना था कि अगर सरकार की ऐसी मंशा होती तो जनरल कियानी और लेफ्टिनेंट जनरल अहमद पाशा को सेवा विस्तार क्यों दिया जाता. सेना प्रमुख ने भी कहा कि सरकार के साथ उनका कोई विवाद नहीं है और न सेना ने सत्ता पर कब्जा करने के लिए किसी तरह का कोई षड्‌यंत्र किया था. दूसरी ओर इन दिनों पाकिस्तान में जैसा माहौल चल रहा है, उससे तो यही लगता है कि सरकार को इस बात का डर है कि सेना कभी भी लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी गई सरकार के लिए ख़तरा उत्पन्न कर सकती है.

अगर कियानी को लगा कि अधिकारी उनके साथ हैं और उनके द्वारा लिए गए फैसले को मंजूरी दे देंगे तो फिर वह सरकार के ख़िला़फ कमर कस लेंगे. यदि कियानी अपनी स्थिति से संतुष्ट न हुए तो वह अपने विरुद्ध की गई कार्रवाई के ख़िला़फ न्यायालय जाएंगे. गुप्त ज्ञापन से संबंधित विवाद भी थमने का नाम नहीं ले रहा है.

प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी ने संसद में कहा कि अगर कोई समझता है कि वह संसद के प्रति जवाबदेह नहीं है तो यह उसकी ग़लती है और यह सरकार को किसी हालत में मंजूर नहीं है. गिलानी ने कहा कि राज्य के अंदर राज्य की इजाज़त नहीं दी सकती है और सभी संस्थाएं संसद के प्रति जवाबदेह हैं, कोई भी क़ानून से ऊपर नहीं है. हालांकि गिलानी ने किसी भी संस्था का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा सेना और आईएसआई की तऱफ ही था, क्योंकि पाकिस्तान में ऐसी कोई अन्य संस्था नहीं है, जिसके बारे में ऐसा कहने की ज़रूरत महसूस हो. पाकिस्तानी नेता सेना से डरते हैं. वे हमेशा इस बात से भयभीत रहते हैं कि सेना किसी भी समय उन्हें सत्ता से बेदख़ल कर सकती है. इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि गिलानी के बयान का समर्थन विपक्षी पार्टियों ने भी किया. संसद में विपक्ष के नेता चौधरी निसार ख़ान ने कहा कि हर विपक्षी पार्टी सरकार को गिराने की साजिश करती है, लेकिन हम सरकार का साथ दे रहे हैं. उन्होंने सदन को यक़ीन दिलाते हुए कहा कि उनकी पार्टी किसी भी गैर संवैधानिक बदलाव का हिस्सा नहीं बनेगी. इसका मतलब साफ है कि विपक्ष को भी सेना की ओर से विद्रोह की आशंका है.

विपक्षी पार्टियों को पता है कि जब तक देश में लोकतंत्र है, तभी तक उनका अस्तित्व है. अगर सेना का शासन स्थापित हो गया तो फिर न सत्ता में आने के बारे में सोच सकती हैं और न विपक्ष में बैठने के. इसलिए अभी यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में केवल सेना और सरकार के बीच टकराव नहीं है, बल्कि सेना और नेताओं के बीच भी टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है. संसद में इस मुद्दे पर एकजुटता है कि सेना को संसद के दायरे में ही रहना चाहिए. न केवल प्रधानमंत्री गिलानी, बल्कि राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी भी सेना द्वारा सत्ता पर कब्जा करने की आशंका से डरे हुए हैं और जनता को विश्वास में लेने की कोशिश कर रहे हैं. पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की जयंती पर दिए गए संदेश में ज़रदारी ने कहा कि जनता को ताक़त और डर की वजह से बदलाव की इजाज़त नहीं देनी चाहिए. सत्ता परिवर्तन मतदान के ज़रिए होना चाहिए. बात बिल्कुल साफ है कि ज़रदारी को अभी भी सेना द्वारा सत्ता हथियाने का डर है.

राजनीतिक दल सेना को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर सेना भी अपनी ताक़त दिखाने की तैयारी में जुटी हुई है. सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कियानी और आईएसआई प्रमुख अहमद शुजा पाशा ने कहा है कि अगर सरकार उन्हें उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाती है तो वे न्यायालय में जाएंगे. कियानी ने तो अपने कमांडरों के साथ मिलना-जुलना भी शुरू कर दिया है. उन्होंने सैन्य अधिकारियों के साथ कई बैठकें कीं. हालांकि उन बैठकों में क्या बात हुई, इसका ख़ुलासा नहीं हो पाया है, लेकिन इस समय तो यही उम्मीद की जा सकती है कि कियानी अपनी ताक़त परख कर रहे हैं. राष्ट्रपति जरदारी द्वारा दिए गए आधिकारिक भोज में कियानी का न पहुंचना भी इस बात की ओर संकेत करता है कि पाकिस्तान में स्थितियां सरकार के अनुकूल नहीं है. दुबई से लौटे ज़रदारी ने यह भोज चीन के शीर्ष राजनयिक देई बिंगुआ के सम्मान में दिया था, जिसमें शामिल होने वालों की सूची में कियानी का भी नाम था. पाकिस्तान में सेना और सरकार, दोनों ही सत्ता के लिए अपनी ताक़त का इस्तेमाल कर रही हैं. सरकार लोकतंत्र का हवाला देकर, जनता को उसकी शक्ति के बारे में जागरूक और सांसदों को एकजुट करके अपनी सत्ता बरक़रार रखने का प्रयास कर रही है तो वहीं दूसरी तऱफ सेना प्रमुख कियानी अपने अधिकारियों से मिलकर अपनी स्थिति का जायज़ा ले रहे हैं.

अगर कियानी को लगा कि अधिकारी उनके साथ हैं और उनके द्वारा लिए गए फैसले को मंजूरी दे देंगे तो फिर वह सरकार के ख़िला़फ कमर कस लेंगे. यदि कियानी अपनी स्थिति से संतुष्ट न हुए तो वह अपने विरुद्ध की गई कार्रवाई के ख़िला़फ न्यायालय जाएंगे. गुप्त ज्ञापन से संबंधित विवाद भी थमने का नाम नहीं ले रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने जब राष्ट्रपति से जवाब मांगा तो उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 248 का हवाला देते हुए जवाब देने से मना कर दिया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि राष्ट्रपति को इस मामले में कोई छूट नहीं मिलने वाली है. इससे ज़रदारी और सर्वोच्च न्यायालय के बीच तनातनी बढ़ गई है. सेना को इसका भी फायदा मिल सकता है. पाकिस्तान में कभी भी कुछ हो सकता है. वहां किसी भी घटना को अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता. अब यह समय ही तय करेगा कि वहां लोकतंत्र मज़बूत है या सेना. वैसे जिस सरकार पर सेना का डर हावी हो, उससे कितनी उम्मीद की जा सकती है.

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