संसद और भारतीय राजनीति की शिथिलता

यूपीए-2 सरकार ने आर्थिक उदारीकरण की दिशा में एक और क़दम उठाया है. विदेशी निवेशकों को भारतीय कंपनी में शेयर ख़रीदने के लिए सरकार से अनुमति लेने की बाध्यता समाप्त कर दी गई है. इसी तरह का निर्णय खुदरा बाज़ार में एफडीआई के लिए लिया जा सकता था, लेकिन किसी ने इसके लिए साहस नहीं दिखाया. प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद हंगामा हो गया और सरकार ने इसे वापस ले लिया. प्रणब मुखर्जी ने कहा कि वह जानते हैं कि इसे लोकसभा में पारित कराने के लिए उनके पास बहुमत नहीं था और वह मध्यावधि चुनाव कराने के लिए तैयार नहीं हैं. अगर वह अपनी बात पर अड़े रहते तो सरकार के लिए मुसीबत हो जाती. गठबंधन सरकार में बहुत सारे फैसले इसलिए नहीं लिए गए, क्योंकि कांग्रेस न तो तृणमूल कांग्रेस को अपने पक्ष में कर पाई और न राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को. दूसरी ओर कनिमोझी के कारण डीएमके कांग्रेस का साथ नहीं दे रही थी. यूपीए-1 की सरकार में वामदल बाहर से समर्थन दे रहे थे और वे उचित तरीक़े से अपनी मांग रखते थे, लेकिन ममता बनर्जी ऐसा नहीं कर रही हैं, उनका तरीक़ा सही नहीं कहा जा सकता. मैंने सिंगुर मामले के समय ही चेतावनी दी थी कि कांग्रेस सीपीएम से छुटकारा पाने के लिए जिस तरीक़े से तृणमूल कांग्रेस का साथ दे रही है, वह उसके लिए आग से खेलने जैसा है. आज कांग्रेस को यह बात समझ में आ रही है. देखा जाए तो खुदरा बाज़ार में एफडीआई हो या पेंशन संबंधी नीति या फिर खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण विधेयक, सभी को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, क्योंकि ममता बनर्जी ने इस पर वीटो कर दिया था. आगे भी इस बात की संभावना कम है कि ममता बनर्जी नरम रुख़ अख्तियार कर लें. इसकी वजह यह है कि उन्हें कांग्रेस की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कांग्रेस को उनकी ज़रूरत है. शरद पवार के साथ भी ऐसा ही है. वह भी ख़ुद निर्णय लेते हैं कि कब और कितनी ढील कांग्रेस को देनी है. कांग्रेस के साथ यह बहुत बड़ी समस्या है. कांग्रेस के कुछ लोग यह आस लगाए बैठे हैं कि उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों में उनकी स्थिति अच्छी रहेगी. कांग्रेस को इन चुनावों में सफलता मिलेगी और अच्छी-खासी सीटें उसकी झोली में आ जाएंगी. इसके बाद उसे राज्यसभा में बहुमत मिल जाएगा और किसी भी विधेयक को राज्यसभा में पारित कराने के लिए उसे जुगाड़ करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, लेकिन ऐसा कुछ होने की कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही है.

राहुल गांधी का जादू भी कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में पचास से अधिक सीटें नहीं दिला सकता है. आरएलडी के साथ मिलकर भी वह 75 सीटों से अधिक का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी. बसपा को सबसे अधिक सीटें मिल सकती हैं और सबसे बड़ी पार्टी की नेता मायावती होंगी, मुलायम सिंह यादव नहीं. अभी जिस तरह से कांग्रेस मायावती को परेशान करने में लगी है, उससे तो यही कहा जा सकता है कि मायावती चुनाव के बाद कांग्रेस के साथ नहीं, बल्कि भाजपा के साथ गठबंधन करना पसंद करेंगी.

राहुल गांधी का जादू भी कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में पचास से अधिक सीटें नहीं दिला सकता है. आरएलडी के साथ मिलकर भी वह 75 सीटों से अधिक का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी. बसपा को सबसे अधिक सीटें मिल सकती हैं और सबसे बड़ी पार्टी की नेता मायावती होंगी, मुलायम सिंह यादव नहीं. अभी जिस तरह से कांग्रेस मायावती को परेशान करने में लगी है, उससे तो यही कहा जा सकता है कि मायावती चुनाव के बाद कांग्रेस के साथ नहीं, बल्कि भाजपा के साथ गठबंधन करना पसंद करेंगी. कांग्रेस का समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का सपना साकार होना मुश्किल लग रहा है. ऐसी स्थिति में इन चुनावों द्वारा राज्यसभा में बहुमत लाना कांग्रेस के लिए मुश्किल होगा. वर्तमान समय में कांग्रेस और भाजपा की जैसी स्थिति है, उससे तो यही लगता है कि आगे भी फैसला लेने में ऐसी ही कठिनाइयां आने वाली हैं. लोकसभा में बीते 27 दिसंबर को जो कुछ हुआ, उससे कांग्रेस की पोल खुल गई है. कांग्रेस अपने ही सांसदों को मैनेज करने में नाकाम रही, वह अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकी. हालांकि इससे भी उसे दो तिहाई बहुमत नहीं प्राप्त होता, लेकिन इसे पार्टी की कमज़ोरी तो कहा ही जा सकता है. राज्यसभा में मोहम्मद हामिद अंसारी ने कांग्रेस को मुश्किल घड़ी से निकाल लिया. ब्रिटेन के हाउस ऑफ कामंस में स्पीकर स्वयं या फिर सत्ता पक्ष एवं विपक्ष से मिलकर यह निर्णय ले सकता है कि संसद की अवधि बढ़ाई जाए या नहीं. हाउस ऑफ लाड्‌र्स में भी कुछ इसी तरह की व्यवस्था है, लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं है. सभापति को इसके लिए कैबिनेट की अनुमति चाहिए या फिर राष्ट्रपति की, जो कि कैबिनेट की सलाह पर काम करते हैं.

इस प्रकार देखा जाए तो भारतीय संसद ने अपना अधिकार सरकार को दे दिया है. ब्रिटिश संसद से इतर भारतीय संसद मतदान के मुद्दे पर भी कमज़ोर है. हाउस ऑफ लाड्‌र्स में कोई भी सदस्य सभापति को इस बात के लिए चुनौती दे सकता है कि ध्वनि मत से वह संतुष्ट नहीं है और इस पर मतदान कराया जाना चाहिए. ऐसी स्थिति में मतदान कराया जाता है और इस बात की जानकारी होती है कि कौन किसके पक्ष में मत दे रहा है. लोकसभा में लोकपाल बिल ध्वनि मत से पारित किया गया, जिसके कारण अन्ना हजारे को इस बात की जानकारी नहीं हो पाई कि किसने लोकपाल बिल के पक्ष में मत दिया और किसने विरोध में. अगर सरकार संसदीय नियमों को नहीं बदल सकती है तो बेहतर यही होगा कि वह अपना व्यवहार बदले. अगर भारतीय संसद में सब ठीक चल रहा है तो इसका मतलब है कि भाजपा और कांग्रेस में पहले ही बातचीत हो चुकी है, जैसा कि लोकपाल बिल के मुद्दे पर सेंस ऑफ हाउस रिजोल्यूशन पारित होने के समय दिखा था. उस समय संसद सबसे मज़बूत स्थिति में थी और पिछले दिनों वह सबसे कमज़ोर स्थिति में थी. प्रश्न यह नहीं है कि ग़लती किसकी थी, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या भारतीय राजनीति का विकास हो पाएगा?

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  • Anil Gupta

    भारतीय कंपनियों में बिना सरकारी मंजूरी के विदेशियों द्वारा निवेश की अनुमति का निर्णय कहीं इस कारन तो नहीं लिया गया है की पश्चिम की डूबती अर्थव्यवस्था के चलते विदेशों में जमा ४०० लाख करोड़ का काला धन भारत की कंपनियों को कब्जाने के लिए प्रयोग किये जाने का रास्ता साफ़ हो जाये. अगर ऐसा हुआ तो विदेशियों को भौतिक रूप से भारत में आये बिना ही पुरे भारत की दौलत पर हाथ साफ़ करने का मौका मिल जायेगा.इसमें वर्तमान सर्कार के नियंत्रकों की प्रमुख भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता. श्री संतोष भारतीय जी जैसे खोजी और देशप्रेमी पत्रकार इस की तह तक जाकर देश को इसकी सच्चाई से अवगत करा सकेंगे.