सोवियत रूस में संसदीय चुनाव के नतीजे आने के बाद सरकार पर चुनाव में धांधली करने के आरोप लगे हैं. इस चुनाव में रूसी प्रधानमंत्री ब्लादिमिर पुतिन की यूनाइटेड रशिया पार्टी को जीत तो हासिल हो गई, लेकिन यह कोई बड़ी जीत नहीं है. पुतिन की पार्टी को मात्र 50.2 फीसदी मत मिले हैं, जबकि पिछले चुनाव में उसे 64 फीसदी मत मिले थे. 450 सीटों के लिए हुए ड्यूमा के चुनाव में यूनाइटेड रसिया पार्टी को 238 सीटें मिली हैं. संसदीय चुनाव में इस बार सात दलों ने हिस्सा लिया, जबकि इससे पहले हुए चुनाव में 11 दलों को हिस्सा लेने का मौक़ा मिला था. कम्युनिस्ट पार्टी (केपीआरएफ) को 19.12 फीसदी मत मिले हैं, जबकि जस्ट रशिया को 13.3 फीसदी. हालांकि इस चुनाव में कामयाबी पुतिन को मिली, लेकिन यह कामयाबी एक साथ कई सवालों को जन्म देती है. पहला सवाल यह है कि क्या वास्तव में पुतिन सफल हुए हैं अथवा यह उनकी घटती लोकप्रियता के बीच का पड़ाव है, जहां से हार तक पहुंचने में ज़्यादा व़क्त की ज़रूरत नहीं है. दूसरा सवाल इस चुनाव के संबंध में उठ रहे विवादों और विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा है कि जिस तरह की चुनावी तस्वीर पेश की जा रही है, क्या वह वास्तव में वैसी है या कुछ उलटफेर किया गया है. क्या चुनाव में सचमुच धांधली हुई है, जैसे कि आरोप लगाए जा रहे हैं या फिर इसके पीछे की सच्चाई कुछ और है. पुतिन ने भी आरोप लगाया है कि रूस में विद्रोह फैलाने की कोशिश की जा रही है. अगर यह आरोप ग़लत है तो फिर जनता के बीच आक्रोश का कारण क्या है, जिसके चलते पुतिन विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं.
रूस में इस बार सूखा पड़ा, जिससे लगभग 14 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. हालांकि तेल की बढ़ती क़ीमतों के कारण बजट घाटे को कम कर लिया गया, लेकिन विनिर्माण और खुदरा बाज़ार के क्षेत्र में कमी आई, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव सामान्य जनता पर पड़ता है. मुद्रास्फीति की दर भी लगभग सात फीसदी रही. इसके अलावा भ्रष्टाचार भी रूस में एक अहम मुद्दा रहा है.
अगर संसदीय चुनाव के नतीजों पर नज़र डालें तो यह साफ है कि पहले की अपेक्षा पुतिन की लोकप्रियता में कमी आई है. हालांकि ताजा चुनाव में उनकी पार्टी को पचास फीसदी से अधिक मत मिले, लेकिन ये पिछले चुनाव में मिले मतों से लगभग चौदह फीसदी कम हैं. ग़ौरतलब है कि पुतिन एक बार फिर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं, जिसका चुनाव आगामी मार्च माह में होने वाला है. अगर लोकप्रियता में इज़ा़फा हुआ होता तो उनकी पार्टी को पिछले चुनाव से अधिक मत मिलते, लेकिन हुआ इसके विपरीत. ऐसे में पुतिन को राष्ट्रपति बनने के लिए काफी मशक्कत करनी होगी, जिससे यह पचास फीसदी समर्थन बढ़ाया जा सके, न कि इसे घटने दिया जाए, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो पुतिन की सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा. चुनाव में धांधली का आरोप गोलोस एवं ओएससीई जैसी चुनाव की देखरेख करने वाली संस्थाओं ने लगाया है. गोलोस को अमेरिका और यूरोपीय संघ से आर्थिक मदद मिलती है, जबकि ओएससीई यूरोपीय संस्था है. ऐसे में इन संस्थाओं पर कितना भरोसा किया जा सकता है.
पुतिन के कार्यकाल में रूस की आर्थिक एवं सामरिक ताक़त में वृद्धि हुई है. हालांकि आर्थिक स्थिति मज़बूत करने में देश के तेल और गैस भंडारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व को इसका श्रेय देना ही पड़ेगा. चुनाव में धांधली के आरोपों पर शक इसलिए है, क्योंकि अमेरिका इस मामले को जोर-शोर से उठा रहा है. अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भी इस धांधली के संदर्भ में बयान दिया है. अमेरिका ने पुतिन पर चुनाव पर्यवेक्षकों को तंग करने का आरोप लगाया है. ऐसे में इस आरोप पर शक करना अधिक लाजिमी है. पुतिन ने भी अमेरिका पर रूसी जनता को भड़काने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि चुनाव में कैमरों का इस्तेमाल किया गया और किसी तरह की कोई गड़बड़ी नहीं हुई. अमेरिका और यूरोप के कुछ देश उनके ख़िला़फ साजिश कर रहे हैं. अब सवाल यह है कि अगर अमेरिकी हस्तक्षेप की वजह से पुतिन विरोधी प्रदर्शन हुए तो इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं. रूस के पचास शहरों में लाखों लोगों ने प्रदर्शन किया और सरकार पर धांधली का आरोप लगाते हुए दोबारा चुनाव कराने की मांग की.
रूस में इस बार सूखा पड़ा, जिससे लगभग 14 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. हालांकि तेल की बढ़ती क़ीमतों के कारण बजट घाटे को कम कर लिया गया, लेकिन विनिर्माण और खुदरा बाज़ार के क्षेत्र में कमी आई, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव सामान्य जनता पर पड़ता है. मुद्रास्फीति की दर भी लगभग सात फीसदी रही. इसके अलावा भ्रष्टाचार भी रूस में एक अहम मुद्दा रहा है. बड़े-बड़े उद्योगपति रूस के बजाय अन्य देशों में निवेश कर रहे हैं. कई तो रूस में रहते भी नहीं हैं. इन कारणों से जनता में पुतिन के विरुद्ध आक्रोश है. ऐसे में जब चुनाव में धांधली का मामला उठा तो विभिन्न कारणों से परेशान जनता सड़कों पर उतर आई. हालांकि पुतिन के समर्थन में भी प्रदर्शन हुए हैं. बहरहाल, अगर पुतिन राष्ट्रपति का चुनाव जीतना चाहते हैं तो उन्हें जनता की समस्याओं को न स़िर्फ समझना होगा, बल्कि उनका निराकरण भी करना होगा, वरना यह जनाक्रोश उनकी पराजय में तब्दील हो सकता है.
|
|
|









