सद्गुरु की पहचान

जो वेद, वेदांत एवं छहों शास्त्रों की शिक्षा प्रदान करके ब्रह्म विषयक मधुर व्याख्यान देने में पारंगत हो, जो अपनी श्वांसोच्छवास क्रियाओं पर नियंत्रण कर सहज ही मुद्राएं लगाकर अपने शिष्यों को मंत्रोपदेश दे, निश्चित अवधि में यथोचित संख्या का जप करने का आदेश दे और केवल अपने वाक्‌ चातुर्य से ही उन्हें जीवन के अंतिम ध्येय का दर्शन कराता हो तथा जिसे स्वयं आत्म साक्षात्कार न हुआ हो, वह सद्गुरु नहीं है. बल्कि जो अपने आचरण से लौकिक एवं पारलौकिक सुखों से विरक्ति की भावना का निर्माण करके हमें आत्मानुभूति का रसास्वादन करा दे, जो अपने शिष्यों को क्रियात्मक एवं प्रत्यक्ष ज्ञान (आत्मानुभूति) करा दे, उसे ही सद्गुरु कहते हैं. जो स्वयं ही आत्म साक्षात्कार से वंचित हों, वे भला अपने अनुयायियों को किस प्रकार आत्मानुभूति करा सकते हैं. सद्गुरु स्वप्न में भी अपने शिष्यों से कोई लाभ या सेवा की लालसा नहीं करते, बल्कि स्वयं उनकी सेवा करने के लिए तत्पर रहते हैं. उन्हें यह कभी भी भान नहीं होता कि मैं महान हूं और मेरा शिष्य मुझसे तुच्छ है, अपितु वे उसे अपने ही सदृश (या ब्रह्मस्वरूप) समझते हैं. सद्गुरु की मुख्य विशेषता यही है कि उनके हृदय में सदैव परम शांति विद्यमान रहती है. वे कभी अस्थिर या अशांत नहीं होते और न उन्हें अपने ज्ञान का ही गर्व होता है. उनके लिए राजा-रंक, स्वर्ग-नर्क सब एक ही समान है.

हेमाड पंत कहते हैं कि मुझे गत जन्मों के शुभ संस्कारों के परिणाम स्वरूप श्री साई बाबा सदृश सद्गुरु के चरणों की प्राप्ति और उनका कृपापात्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. वह अपने यौवन काल में चिलम के अतिरिक्त कुछ संग्रह नहीं करते थे, न उनके बाल-बच्चे एवं मित्र थे, न घर-बार था और न उन्हें किसी का आश्रय प्राप्त था. 18 वर्ष की अवस्था से ही उनका मनोनिग्रह बड़ा विलक्षण था.

हेमाड पंत कहते हैं कि मुझे गत जन्मों के शुभ संस्कारों के परिणाम स्वरूप श्री साई बाबा सदृश सद्गुरु के चरणों की प्राप्ति और उनका कृपापात्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. वह अपने यौवन काल में चिलम के अतिरिक्त कुछ संग्रह नहीं करते थे, न उनके बाल-बच्चे एवं मित्र थे, न घर-बार था और न उन्हें किसी का आश्रय प्राप्त था. 18 वर्ष की अवस्था से ही उनका मनोनिग्रह बड़ा विलक्षण था. वह निर्भय होकर निर्जन स्थानों में विचरण करते और सदा आत्मलीन रहते थे. वह सदैव भक्तों की नि:स्वार्थ भक्ति देखकर उनकी इच्छानुसार आचरण करते थे. उनका कहना था कि मैं सदा भक्तों के पराधीन रहता हूं. जब वह शरीर में थे, उस समय भक्तों ने जो अनुभव किए, उनके समाधिस्थ होने के  पश्चात आज भी जो उनके शरणागत हो चुके हैं, उन्हें भी उसी प्रकार के अनुभव होते रहते हैं. भक्तों को तो केवल इतना ही यथेष्ठ है कि यदि वे अपने हृदय को भक्ति और विश्वास का दीपक बनाकर उसमें प्रेम की ज्योति प्रज्ज्वलित करें तो ज्ञान ज्योति (आत्म साक्षात्कार) स्वयं प्रकाशित हो उठेगी. प्रेम के अभाव में शुष्क ज्ञान व्यर्थ है. ऐसा ज्ञान किसी के लिए भी लाभप्रद नहीं हो सकता, प्रेम भाव में संतोष नहीं होता. इसलिए हमारा प्रेम असीम और अटूट होना चाहिए. प्रेमांकुर उदय होते ही भक्ति, वैराग्य, शांति और कल्याणरूपी संपत्ति सहज ही प्राप्त हो जाती है. जब तक किसी वस्तु के लिए प्रेम उत्पन्न नहीं होता, तब तक उसे प्राप्त करने की भावना ही उत्पन्न नहीं होती. इसलिए जहां व्याकुलता और प्रेम है, वहां भगवान स्वयं प्रगट हो जाते हैं. भाव में ही प्रेम अंतर्निहित है और वही मोक्ष का माध्यम है. यदि कोई व्यक्ति कलुषित भाव से भी किसी सच्चे संत के चरण पकड़ ले तो यह निश्चित है कि वह तर जाएगा.