श्रीमती तर्खड और साई बाबा

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एक बार श्रीमती तर्खड ने तीन वस्तुएं यानी भरित (भुर्ता यानी मसाला मिश्रित भुना हुआ बैगन और दही), काचर्या (बैगन के गोल टुकड़े घी में तले हुए) और पेड़ा (मिठाई) बाबा के लिए भेजीं. बाबा ने उन्हें किस प्रकार स्वीकार किया, अब इसे देखेंगे. बांद्रा के श्री रघुवीर भास्कर पुरंदरे बाबा के परम भक्त थे. एक बार वह शिरडी जा रहे थे. श्रीमती तर्खड ने श्रीमती पुरंदरे को दो बैगन दिए और उनसे प्रार्थना की कि शिरडी पहुंचने पर वह एक बैगन का भुर्ता और दूसरे का काचर्या बनाकर बाबा को भेंट कर दें. शिरडी पहुंचने पर श्रीमती पुरंदरे भुर्ता लेकर मस्जिद गईं. बाबा उसी समय भोजन के लिए बैठे ही थे. उन्हें भुर्ता बहुत स्वादिष्ट प्रतीत हुआ, इसलिए उन्होंने उसे थोड़ा-थोड़ा सभी को वितरित किया. इसके पश्चात राधाकृष्ण माई के पास संदेश भेजा गया कि बाबा काचर्या मांग रहे हैं. वह असमंजस में पड़ गईं कि अब क्या करना चाहिए, क्योंकि बैगन की तो अभी ऋतु नहीं है. अब समस्या उत्पन्न हुई कि बैगन किस प्रकार उपलब्ध हो. जब इस बात का पता लगाया गया कि भुर्ता लाया कौन था, तब ज्ञात हुआ कि बैगन श्रीमती पुरंदरे लाई थीं और फिर उन्हें ही काचर्या बनाने का कार्य सौंपा गया. अब हर आदमी को बाबा की इस पूछताछ का अभिप्राय विदित हो गया और सबको बाबा की सर्वज्ञता पर महान आश्चर्य हुआ.

दिसंबर,1915 में श्री गोविंद बालाराम मानकर शिरडी जाकर वहां अपने पिता की अंत्येष्टि क्रिया करना चाहते थे. प्रस्थान करने से पूर्व वह श्रीमती तर्खड से मिलने आए. श्रीमती तर्खड बाबा के लिए कुछ भेंट शिरडी भेजना चाहती थीं. उन्होंने पूरा घर छान डाला, परंतु केवल एक पेड़े के अतिरिक्त उन्हें कुछ नहीं मिला और वह पेड़ा भी अर्पित नैवेद्य का था. फिर भी अति प्रेम के कारण उन्होंने वही पेड़ा बाबा के लिए भेज दिया. उन्हें पूर्ण विश्वास था कि बाबा उसे अवश्य स्वीकार कर लेंगे. शिरडी पहुंचने पर गोविंद मानकर बाबा के दर्शनार्थ गए, परंतु वहां पेड़ा ले जाना भूल गए. बाबा यह सब चुपचाप देखते रहे, परंतु जब गोविंद पुन: संध्या समय बिना पेड़ा लिए वहां पहुंचे तो फिर बाबा शांत न रह सके और उन्होंने पूछा, तुम मेरे लिए क्या लाए हो? उत्तर मिला, कुछ नहीं. बाबा ने पुन: प्रश्न किया और गोविंद ने फिर वही उत्तर दोहरा दिया. अब बाबा ने स्पष्ट शब्दों में पूछा, क्या तुम्हें मां (श्रीमती तर्खड) ने चलते समय कुछ मिठाई नहीं दी थी? अब गोविंद को स्मृति हो आई और वह बहुत लज्जित हुए और बाबा से क्षमायाचना करने लगे. वह दौड़कर गए और फिर पेड़ा लाकर बाबा के सम्मुख रख दिया. बाबा ने तुरंत ही पेड़ा खा लिया. इस प्रकार श्रीमती तर्खड की भेंट बाबा ने स्वीकार की और भक्त मुझ पर विश्वास करता है, इसलिए मैं स्वीकार कर लेता हूं, यह भगवद्वचन भी सत्य साबित हुआ.

एक बार श्रीमती तर्खड शिरडी आईं. दोपहर का भोजन प्राय: तैयार हो चुका था और थालियां परोसी जा रही थीं कि उसी समय वहां एक भूखा कुत्ता आया और भौंकने लगा. श्रीमती तर्खड तुरंत उठीं और उन्होंने रोटी का एक टुकड़ा कुत्ते को डाल दिया. कुत्ता बड़ी रुचि के साथ उसे खा गया. संध्या के समय जब वह मस्जिद में जाकर बैठीं तो बाबा ने उनसे कहा, मां, आज तुमने बड़े प्रेम से मुझे खिलाया, मेरी भूखी आत्मा को बड़ी सांत्वना मिली. सदैव ऐसा ही करती रहो, तुम्हें कभी न कभी इसका उत्तम फल अवश्य प्राप्त होगा. इस मस्जिद में बैठकर मैं कभी असत्य नहीं बोलूंगा. सदैव मुझ पर ऐसा ही अनुग्रह करती रहो. पहले भूखों को भोजन कराओ, बाद में तुम भोजन किया करो. इसे अच्छी तरह ध्यान में रखो. बाबा के शब्दों का अर्थ उनकी समझ में न आया, इसलिए उन्होंने प्रश्न किया, भला मैं किस प्रकार भोजन करा सकती हूं, मैं तो स्वयं दूसरों पर निर्भर हूं और उन्हें दाम देकर भोजन प्राप्त करती हूं. बाबा कहने लगे, उस रोटी को ग्रहण कर मेरा हृदय तृप्त हो गया और अभी तक मुझे डकारें आ रही हैं. भोजन करने से पूर्व तुमने जो कुत्ता देखा था और जिसे तुमने रोटी का टुकड़ा दिया था, वह यथार्थ में मेरा ही स्वरूप था. इसी प्रकार अन्य प्राणी (बिल्लियां, सुअर, मक्खियां एवं गाय आदि) भी मेरे ही स्वरूप हैं. मैं ही उनके आकारों में डोल रहा हूं. जो इन सब प्राणियों में मेरे दर्शन करता है, वह मुझे अत्यंत प्रिय है. इसलिए भेदभाव भूलकर तुम मेरी सेवा किया करो. यह अमृत समान उपदेश ग्रहण कर वह द्रवित हो गईं और उनकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी, गला रुंध गया और उनके हर्ष का पारावार न रहा.

यूरोपियन महाशय

एक समय बंबई के एक यूरोपियन महाशय नाना साहेब चांदोरकर से परिचय पाकर किसी विशेष कार्य से शिरडी आए. उन्हें एक आलीशान तंबू में ठहराया गया. वह तो बाबा के समक्ष नत मस्तक होकर उनके करकमलों का चुंबन करना चाहते थे. इसी कारण उन्होंने तीन बार मस्जिद की सीढ़ियों पर चढ़ने का प्रयत्न किया, परंतु बाबा ने उन्हें अपने समीप आने से रोक दिया. उन्हें आंगन में ही ठहरने और वहीं से दर्शन करने की आज्ञा मिली. इस विचित्र स्वागत से अप्रसन्न होकर उन्होंने शिरडी से प्रस्थान करने का विचार किया और विदा लेने के लिए वह वहां आए. बाबा ने उन्हें दूसरे दिन जाने और शीघ्रता न करने की राय दी. अन्य भक्तों ने भी उनसे बाबा के आदेश का पालन करने की प्रार्थना की, परंतु वह सबकी उपेक्षा कर तांगे में बैठकर रवाना हो गए. कुछ दूर तक तो घोड़े ठीकठाक चलते रहे, परंतु सावली विहीर नामक गांव पार करने पर एक साइकिल सामने से आई, जिसे देखकर घोड़े भयभीत हो गये और तेज गति से दौड़ने लगे. फलस्वरूप तांगा उलट गया और महाशय जी नीचे लुढ़क गए और कुछ दूर तक तांगे के साथ-साथ घिसटते चले गए. उन्हें अस्पताल जाना पड़ा. इस घटना से भक्तों ने शिक्षा ग्रहण की कि जो लोग बाबा के आदेशों की अवहेलना करते हैं, उन्हें किसी न किसी दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है और जो आज्ञा का पालन करते हैं, वे सकुशल और सुखपूर्वक घर पहुंच जाते हैं.

शिक्षा

समस्त प्राणियों में ईश्वर के दर्शन करो, यही इस अध्याय की शिक्षा है. उपनिषदों एवं गीता का यही उपदेश है कि ईशावास्यमिदं सर्वम्‌ यानी सभी प्राणियों में ईश्वर का वास है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव करो.

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