समाज अपनी खामियों को पहचाने

हमें अपने भारतीय पारिवारिक मूल्यों पर गर्व होता है. अपने पारिवारिक मूल्यों को हम अन्य संस्कृतियों के पारिवारिक मूल्यों से श्रेष्ठ समझते हैं. अगर किसी से स्वर्ग के बारे में पूछा जाए तो वह कहेगा कि वैसा जीवन, जिसमें ब्रिटिश घर हो, अमेरिकी वेतन हो, चाइनीज खाना हो और भारतीय परिवार हो, स्वर्ग कहा जा सकता है. इसी तरह नरक की परिभाषा यह कहकर दी जाती है कि जिसमें भारतीय वेतन, चीनी घर, ब्रिटिश खाना और अमेरिकी परिवार हो, वह नरक होगा. इस तरह कहा जा सकता है कि भारतीय पारिवारिक मूल्य अन्य सभी संस्कृतियों के पारिवारिक मूल्यों से बेहतर हैं, लेकिन वर्तमान समय में यह स्थिति बदलती जा रही है. हमारे पारिवारिक मूल्यों में विशेषताओं के साथ-साथ कई खामियां भी हैं, जिनकी ओर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता है. इन खामियों की वजह से हमारी पारिवारिक व्यवस्था चरमरा गई है. इन्हीं में से कुछ खामियों पर चर्चा करने की आवश्यकता आजकल महसूस की जा रही है.

जो समाज बहुओं को मूक रहने के लिए बाध्य करता है, दहेज के लिए हत्याएं करता है, दहेज को आवश्यक बनाता है, जहां औरतों को उनके अधिकारों से वंचित किया जाता है और जिसमें अंतरजातीय या अंतरधर्मीय विवाह करने पर पंचायत द्वारा मौत की सजा दी जाती है, उसे हम श्रेष्ठ समाज कैसे कह सकते हैं. ऐसे समाज को, ऐसे मूल्यों को बदलना ही चाहिए, लेकिन मुद्दा यह है कि इसे बदलने के लिए किया क्या जा सकता है. सबसे पहले सोच बदलने की आवश्यकता है.

भारतीय पारिवारिक व्यवस्था की एक खास बात अथवा कहें कि कमी है, परिवार में पुत्र को अधिक महत्व देना. यही समस्या चीन में है. वहां भी एक बच्चे की नीति के बावजूद पुत्र को अधिक महत्व दिया जाता है, जिसके कारण वहां का लिंग अनुपात प्रभावित हो रहा है. पुत्र की चाहत इस कदर भारत के लोगों के ऊपर हावी है कि इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं. यदि आपकी पहली संतान लड़की है तो फिर आपके तथाकथित शुभचिंतक आपको यह सलाह देना शुरू कर देंगे कि कम से कम एक लड़का तो होना ही चाहिए. इसके बाद हम में से कई लोग इस दबाव के बाद एक लड़के के लिए तैयार हो जाते हैं. सबसे बड़ी समस्या तो तब होती है, जब लोग लड़के की चाहत में कन्या भ्रूण हत्या शुरू कर देते हैं. वे अनैतिक जांच का इस्तेमाल करते हैं और अगर एक बच्चा होना हो तो फिर लड़के को ही चुनते हैं, लेकिन ऐसी स्थिति लड़कियों के लिए कम दिखाई पड़ती है. अगर किसी का पहला बच्चा लड़का हो तो वह ऐसा नहीं करता कि दूसरा बच्चा लड़का न हो, बल्कि लड़की हो. हमारे आसपास के सभी शुभचिंतक लोग हमें लड़के के लिए तो कहते हैं, लेकिन कोई यह नहीं कहता कि लड़की की भी उतनी ही आवश्यकता है. इसके चलते हमारे समाज में लिंग अनुपात सही नहीं रह पाता है. लिंग अनुपात का लड़कियों के प्रतिकूल होना भारत में औरतों के प्रति हिंसा और पुरुषों के अविवाहित रहने की एक बड़ी वजह है. हमारे परिवार में दूसरा मूल्य है, बहू को गाय के समान मानना अर्थात उसका सीधा-सादा होना, जो ससुराल में किसी को कोई जवाब न दे. ऐसी बहुएं परिवार में अपनी सास या किसी और सदस्य की आज्ञा का बिना किसी प्रतिक्रिया के पालन करती हैं. अगर बहू पढ़ी-लिखी हो और परिवार के लोगों के सवालों का जवाब देती है तो उसे अच्छा नहीं कहा जाता है. उसके लिए ग़लत शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है. परिवार के बुजुर्ग लोगों, खासकर महिलाओं का व्यवहार अपनी बहुओं के प्रति अच्छा नहीं होता. वे हमेशा अपनी बात मनवाने के चक्कर में रहती हैं. कभी-कभी तो वे पारिवारिक व्यवस्था को ही बिगाड़ देती हैं. ऐसा देखा गया है कि कई बार सास अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए बेटे और बहू के बीच दरार पैदा कर देती है. ऐसा करके वह अपनी बहू को दबाती है, लेकिन घर में फूट पड़ जाती है. इन्हीं कारणों से संयुक्त परिवार की संस्कृति समाप्त होती जा रही है. भारतीय परिवार के बुजुर्ग लोगों को गाय जैसी बहू चाहिए, लेकिन ऐसी शादियां ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक पाती हैं. इसी तरह की एक समस्या दहेज को लेकर है. यह हमारे समाज की सबसे बड़ी बुराई है. लोग दहेज के लालच में अंतरजातीय या अंतरधर्मीय विवाह का विरोध करते हैं, वे दहेज को अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने का एक साधन मानने लगे हैं. यही नहीं, लोग दहेज को अपने आगे के जीवन को सुरक्षित रखने का आधार भी मानते हैं. इसके कारण शादी-विवाह में जाति की महत्ता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. दहेज के इस लालच के कारण महिलाओं का उत्पीड़न दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. आएदिन दहेज के लिए बहुओं को जलाए जाने की ख़बरें मिलती रहती हैं. समाज के इस मूल्य को किसी भी आधार पर सही नहीं कहा जा सकता है. यही नहीं, इससे जाति प्रथा और भेदभाव को बढ़ावा मिलता है, जो समाज के लिए कतई सही नहीं है और यह भारतीय पारिवारिक मूल्यों की एक बड़ी कमज़ोरी भी है. इस प्रकार का संकीर्ण समाज किसी भी तरह सही नहीं कहा जा सकता है. इससे वैश्विक स्तर की विचारधारा का बनना मुश्किल हो जाता है. इसका एक कारण शिक्षा की संकीर्णता है. हमें दूसरी संस्कृतियों की अच्छी बातें स्वीकार करनी चाहिए. इससे किसी भी संस्कृति के नकारात्मक पक्षों को हटाया जा सकता है. इस संकीर्ण सोच को बदलने के बाद ही सैम्युल हटिंगटन के सभ्यता के संघर्ष के सिद्धांत को बदला जा सकता है और उसकी जगह मार्शल मैकलुहान की वैश्विक गांव (ग्लोबल विलेज) की नीति को बढ़ावा दिया जा सकता है. हमें अपनी धारणाएं बदलनी होंगी, ताकि इस संकुचित मानसिकता के दायरे से बाहर निकला जा सके. पितृसत्तात्मक समाज का मूल्य कभी भी समतावादी नहीं हो सकता है. इस समाज में वही मूल्य सिखाए जाते हैं, जिनसे किसी एक समुदाय को लाभ हो. इस समाज की शिक्षा व्यवस्था ऐसी होती है, जिसमें औरतों को उनके अधिकारों से वंचित किया जाता है. ऐसे समाज में पुरुष की प्रधानता होती है और औरतों का शोषण किया जाता है. यह हमारे समाज की एक बहुत बड़ी खामी है. इस मूल्य को भी बदलने की आवश्यकता है, ताकि समाज में समानता आ सके और किसी को भी किसी दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता दिखाने का मौक़ा न मिले. परंपरागत मूल्यों में संशोधन की आवश्यकता है. जिन परंपरागत मूल्यों के कारण समाज को परेशानी हो रही है, उन्हें केवल इस आधार पर नहीं बनाए रखा जा सकता है कि वे परंपरागत समाज के हिस्से हैं. जो समाज बहुओं को मूक रहने के लिए बाध्य करता है, दहेज के लिए हत्याएं करता है, दहेज को आवश्यक बनाता है, जहां औरतों को उनके अधिकारों से वंचित किया जाता है और जिसमें अंतरजातीय या अंतरधर्मीय विवाह करने पर पंचायत द्वारा मौत की सज़ा दी जाती है, उसे हम श्रेष्ठ समाज कैसे कह सकते हैं. ऐसे समाज को, ऐसे मूल्यों को बदलना ही चाहिए, लेकिन मुद्दा यह है कि इसे बदलने के लिए किया क्या जा सकता है. सबसे पहले सोच बदलने की आवश्यकता है. परंपरागत सोच से बाहर निकल कर उदार सोच की ओर बढ़ना होगा. जिन परंपरागत विचारों और मूल्यों की वजह से समाज के एक हिस्से का लगातार शोषण होता रहा है, उन्हें आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है. इस सोच को बदलने के लिए आवश्यकता है एक सही शिक्षा प्रणाली की. जब तक शिक्षा प्रणाली में सुधार नहीं किया जाएगा, तब तक इस परंपरागत विचार को बदलना मुश्किल है. इसके लिए संकुचित शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना होगा. सांस्कृतिक शिक्षा के अंतर्गत हमें दूसरी सभी संस्कृतियों की अच्छी बातों को शामिल करना पड़ेगा, ताकि हमें यह अनुभव हो सके कि हम जो सोचते हैं, वही सच्चाई नहीं है, बल्कि इससे इतर भी सच्चाई है. हमें आत्ममंथन और आत्मचिंतन करना होगा कि जिन सामाजिक मूल्यों की बात हम ब़ढ़-चढ़कर करते हैं, उनमें कई खामियां भी हैं, जिन्हें अगर जल्दी दूर नहीं किया गया तो ये सामाजिक मूल्य अब ज़्यादा दिनों तक  गर्व करने के लायक़ नहीं रह जाएंगे. हमें अब नवीन उदारवादी समाज की स्थापना के लिए काम करना होगा, जिसमें सभी वर्ग को समान अधिकार मिलें, जिसमें किसी एक समुदाय को दूसरे पर शासन करने का अधिकार न हो. हमें ऐसे ही उदारवादी समाज की आवश्यकता है. आधुनिक वैश्विक शिक्षा को आधार बनाकर ही समाज की कमियों को समाप्त किया जा सकता है.

(लेखक आईएएस अधिकारी हैं, इस आलेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं, जिनका सरकार से कोई संबंध नहीं है.)

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं
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सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं