किराएदारों में खौफ : दिल्ली में प्रॉपर्टी डीलर माफिया बन गए हैं

जिंदगी जीने और सिर छुपाने के लिए एक अदद छत की ज़रूरत होती है, लेकिन अमूमन छोटे शहरों की तरह आसानी से मिलने वाली किराए की छत को दिल्ली में प्रॉपर्टी डीलरों की नज़र लग गई है. तक़रीबन डेढ़ दशक पहले राजधानी दिल्ली में भी निजी पहचान के ज़रिए अथवा ख़ुद सीधे मकान मालिक से संपर्क करके लोग किराए के घर में रहते थे, लेकिन अब यह मुमकिन नहीं है. दिल्ली में किराएदार और गृहस्वामी के बीच प्रॉपर्टी डीलर नामक एक ऐसा तत्व आ गया है, जिसने दोनों के बीच का संबंध ख़त्म कर दिया है. प्रॉपर्टी डीलरों का यह जाल राजधानी दिल्ली समेत पूरे एनसीआर में फैल चुका है. अब किसी ज़रूरतमंद को बग़ैर किसी प्रॉपर्टी डीलर की मनुहार किए मकान नहीं मिल सकता. दिल्ली में कुल नौ ज़िले हैं. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी 1,38,50,507 है. ज़ाहिर है, यहां लाखों लोग किराए के मकान में रहते हैं. पूरी दिल्ली में कई इलाक़े ऐसे हैं, जहां हर वर्ग के लोग रहते हैं. मसलन, दक्षिणी दिल्ली के मुनिरका, बेर सराय, कटवारिया सराय, हौज़खास और मालवीय नगर जैसी कॉलोनियों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हज़ारों छात्र-छात्राएं रहते हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, भारतीय जनसंचार संस्थान और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे शिक्षण संस्थान यहीं स्थित हैं. इसी तरह प्रशासनिक एवं न्यायिक सेवा परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा उत्तरी दिल्ली स्थित मुखर्जी नगर, गांधी विहार, नेहरू विहार, आउट्रम लाइन, हडसन लेन, मॉल रोड, किंग्सवे कैंप, विजय नगर और हक़ीक़त नगर जैसे इलाक़ों में रहते हैं. ये इलाक़े दिल्ली विश्वविद्यालय के नज़दीक हैं, लिहाज़ा बेहतर पढ़ाई की उम्मीद लिए देश के अलग-अलग राज्यों से हर साल हज़ारों छात्र यहां आते हैं.

महानगरों का मिजाज़ भी अजीब होता है. यहां हर चीज़ किराए की है. कोख, संबंध और मकान भी. छोटे शहरों से आए किसी आदमी से पूछिए कि दिल्ली में एक अदद मकान ढूंढ पाने का दर्द क्या होता है? मकान मालिक सीधा आपको मकान नहीं देगा, क्योंकि उसे भरोसा नहीं है. मज़बूरन प्रॉपर्टी डीलरों की शरण में जाना पड़ता है. प्रॉपर्टी डीलरों का रवैया कुछ ऐसा है, मानों आप किसी लुटेरे से बात कर रहे हों. तुर्रा यह कि ज्यादातर प्रॉपर्टी डीलर रजिस्टर्ड नहीं हैं. लूट के इस खेल में सब शामिल है. सिवाय उस आम आदमी के, जिसे महानगर में रहने की क़ीमत चुकानी पड़ती है.

चार्टर्ड एकांउटेंसी एवं बैंकिंग सेवा परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा और नौकरीपेशा लोग पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर, शकरपुर, पांडव नगर, पटपड़गंज, विनोद नगर और गणेश नगर में रहते हैं. इसी तरह पश्चिमी दिल्ली के उत्तम नगर, जनकपुरी, नवादा और विकासपुरी जैसे इलाक़ों में बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर रहते हैं. यहां हर गली-मोहल्ले में चंद क़दमों की दूरी पर ढेरों प्रॉपर्टी डीलरों के साइन बोर्ड दिखेंगे, जिसमें फ्लैट ही फ्लैट और कमरे ही कमरे जैसे स्लोगन लिखे होते हैं. इन इलाक़ों में प्रॉपर्टी डीलर को कमीशन की मोटी रक़म दिए बिना किराए का कमरा खोजना भूसे में सुई ढूंढने जैसा है. मुखर्जी नगर, मुनिरका, बेरसराय, पांडव नगर, लक्ष्मी नगर जैसे इलाक़ों में, जहां छात्रों की बहुतायत है, एक रूम सेट का किराया 6 हज़ार से लेकर 7 हज़ार रुपये के बीच है, बिजली और पानी का बिल अलग से. इसके अलावा किराएदार को एक महीने का पूरा कमीशन प्रॉपर्टी डीलर को देना अनिवार्य है. अगर आपको इन इलाक़ों में किराए का मकान चाहिए तो पहले महीने का पूरा ख़र्च 12-15 हज़ार रुपये के बीच आएगा. मुखर्जी नगर में रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे रंजीत का कहना है कि पहले इस इलाक़े में कपड़े पर प्रेस करने वाले और चाय बेचने वाले दुकानदार भी खाली मकानों का ठिकाना बता देते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यहां प्रॉपर्टी डीलरों का ख़ौ़फ इतना बढ़ चुका है कि ये ग़रीब लोग चाहते हुए भी छात्रों की मदद नहीं कर पाते. मॉल रोड में रहने वाले छात्र आकाश का कहना है कि यहां काफी छोटे कमरे का भी किराया हज़ारों रुपये है. इसी तरह साउथ दिल्ली के मुनिरका में रहने वाले हिमांशु ने बताया कि पांच साल पहले मुनिरका में प्रॉपर्टी डीलरों का कोई ख़ास दखल नहीं था, लेकिन अब यहां भी दर्जनों प्रॉपर्टी डीलरों ने अपनी दुकानें सज़ा रखी हैं. अमित नामक छात्र ने बताया कि यहां मकान मालिकों का व्यवहार इस क़दर ख़राब है कि अगर कमरे पर किसी का दोस्त रात में आ जाए तो उन्हें बेहद नागवार गुजरता है. कभी-कभी तो मकान मालिक किराएदार के साथ अभद्र बर्ताव भी करते हैं. दरअसल, यह आपबीती दिल्ली में रहने वाले हज़ारों किराएदारों की है, जो अपमान सहकर भी कुछ नहीं कह पाते. ज़रा सोचिए उस परिवार के बारे में, जिसकी आमदनी 10-12 हज़ार रुपये के बीच है, क्या वह कभी अपना घर बना सकता है. यही वजह है कि दिल्ली आने के बाद कई युवा काफी उम्र के बाद शादी करते हैं. कई लोग ऊंची मंजिल की चाहत में अविवाहित जीवन व्यतीत करने लगते हैं, जबकि कई लोग शादी के बाद अपनी पत्नी को गांव में रखते हैं. जो ऐसा नहीं कर पाते, वह अपने ख्वाबों को कुचल कर दिल्ली को अलविदा कह देते हैं.

दरअसल, वर्ष 1990 के बाद राजधानी दिल्ली में शिक्षा और रोज़गार के लिए देश के दूसरे शहरों से काफी तादाद में लोगों का आगमन हुआ. यह सिलसिला आज भी जारी है. सवाल यह है कि दिल्ली के हर गली-कूचे में मौजूद प्रॉपर्टी डीलरों पर क्या सरकार की कोई नज़र है अथवा नहीं. किराएदारों को स्थानीय पुलिस थाने में अपना सत्यापन (वेरीफिकेशन) कराना पड़ता है. क्या दिल्ली सरकार और पुलिस ने कभी किराए का मकान दिलाने के नाम पर चांदी काट रहे किसी प्रॉपर्टी डीलर की कोई जांच की कि उसने जो दुकान खोल रखी है, क्या वह पंजीकृत है. चौथी दुनिया ने जब इन इलाक़ों में जाकर देखा तो कहीं भी किसी प्रॉपर्टी डीलर ने साइन बोर्ड पर अपना कोई रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं लिखा था. दिल्ली हाईकोर्ट में एडवोकेट जितेंद्र मेहता का कहना है कि राजधानी के अलग-अलग क्षेत्रों में आज हज़ारों की संख्या में प्रॉपर्टी डीलर अपनी दुकानें चला रहे हैं, जो अपंजीकृत हैं. उन्होंने कहा कि अगर दिल्ली सरकार इनके लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दे तो उसके राजस्व में भी वृद्धि होगी. एडवोकेट मेहता ने कहा कि दिल्ली सरकार किराया क़ानून में संशोधन करके उसे जनसुलभ बनाए. आज राजधानी दिल्ली में मकान का किराया सेंसेक्स की तरह छलांग मार रहा है. फर्क़ स़िर्फ इतना है कि इसमें कभी गिरावट नहीं आती, क्योंकि मकान मालिकों और प्रॉपर्टी डीलरों का लालच ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ गया है. वे हर वर्ष किराए में 15 से 18 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर रहे हैं. मकान मालिक और किराएदार के बीच 11 महीने का रेंट एग्रीमेंट होता है. यह अवधि बीतने के बाद मकान मालिक कोई न कोई तरकीब लगाकर मकान खाली करा लेते हैं और उसे ज़्यादा किराए पर चढ़ा देते हैं. प्रवासी किराएदार कितनी मेहनत से पैसा कमाता है, इससे मकान मालिकों को कोई मतलब नहीं. अपने घर से दूर रहने वाले किराएदार से मकान मालिक और प्रॉपर्टी डीलर का कोई मानवीय रिश्ता नहीं है, उसे तो केवल हर महीने की सात तारीख़ तक एकमुश्त किराया चाहिए. अगर किसी किराएदार की तबियत ख़राब हो जाए या किसी महीने उसका हाथ तंग हो तो भी गृहस्वामी उस पर कोई रहम नहीं करते. किसी कारणवश किराएदार को 2-3 महीने के लिए घर जाना पड़े और इस बीच अगर वह किराया नहीं देता है तो कई मकान मालिक प्रॉपर्टी डीलर से मिलकर उसका सामान बेचकर किराए की राशि वसूल लेते हैं. ऐसे कई मामले सामने आए हैं. अगर नोएडा एवं आनंद विहार की बात करें तो यहां हालत और भी ज़्यादा ख़राब है. यहां मेट्रो की सुविधा होने के चलते मकान मालिकों ने किराए में अनुचित बढ़ोत्तरी कर दी है.

किराया बढ़ने के मुख्य कारण

राजधानी दिल्ली के लाखों किराएदारों एवं दुकानदारों पर किराए का बोझ बढ़ने वाला है, क्योंकि सरकार जल्द ही नया किराया क़ानून लागू कर सकती है. अगर ऐसा होता है तो यह तय है कि प्रवासी लोगों पर इसका विपरीत असर पड़ेगा. ग़ौरतलब है कि वर्तमान में जो किराया नियंत्रण क़ानून लागू है, वह लोगों को कोई राहत नहीं पहुंचा रहा है. जानकारों की मानें तो किराया बढ़ने के पीछे एक अहम वजह यह किराया नियंत्रण क़ानून भी है, जिसे किराए की दरें संतुलित रखने के लिए बनाया गया था. राजधानी दिल्ली में किराया बढ़ने के लिए दूसरा बड़ा कसूरवार है डीडीए यानी देल्ही डेवलपमेंट अथॉरिटी. इसका काम है मकानों का निर्माण और आवंटन, लेकिन यह जिस चाल से फ्लैट-भवन का निर्माण कर रहा है, उसे देखते हुए आम लोगों का अपने घर का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा. तीसरी बड़ी वजह है कॉलोनियों को अवैध बनाए रखने की सरकारी प्रवृत्ति. दिल्ली में जब भी चुनाव नज़दीक आता है तो राजनीतिक दल दावा करते हैं कि वे सत्ता में आने के बाद दिल्ली की सैकड़ों अनाधिकृत कॉलोनियों को वैधता प्रदान करेंगे, लेकिन चुनाव समाप्ति और सत्ता हासिल होने के बाद नेताओं को अनाधिकृत कॉलोनियों की याद नहीं आती. हैरान करने वाला सवाल यह है कि अगर ये कॉलोनियां आज वैध हो सकती हैं तो कल तक अनाधिकृत क्यों थी? वजह साफ है, सरकार और नौकरशाह कभी चाहते ही नहीं है कि राजधानी में ऐसी बस्तियां नियमित हों, क्योंकि अगर उन्हें वैधता मिल जाएगी तो वहां रहने वाले लाखों लोगों को सभी बुनियादी सुविधाएं देनी होंगी, जिसके वे हक़दार हैं.

प्रॉपर्टी डीलरों को राजनीतिक संरक्षण

दिल्ली में प्रॉपर्टी डीलरों की संख्या हज़ारों में है. इसकी संभावना बहुत कम है कि दिल्ली सरकार को इनकी वास्तविक संख्या पता हो. साल दर साल इनकी संख्या बढ़ रही है, उसी तरह दिल्ली में रहने वाले किराएदारों की मुसीबतें भी बढ़ रही हैं. गली-मोहल्लों में एक छोटे से कमरे में प्रॉपर्टी डीलिंग का धंधा करने वाले ज़्यादातर वे लोग हैं, जो दादागिरी के लिए जाने जाते हैं. धीरे-धीरे इनका संपर्क राजनीतिक दलों के स्थानीय नेताओं से हो जाता है. नेताओं का संरक्षण मिलने के बाद ये पूरी तरह निरंकुश होकर किराएदारों के साथ मनमानी करते हैं. इनका ख़ौ़फ इस क़दर है कि कई इलाक़ों में मकान मालिक बग़ैर इनसे पूछे किसी को मकान नहीं देते. ये प्रॉपर्टी डीलर लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनावों में नेताओं के लिए बहुत कारगार साबित होते हैं. राजनीतिक पार्टियों के लिए इन प्रॉपर्टी डीलरों की कितनी अहमियत है, इसका अंदाज़ा आप चुनाव के समय लगा सकते हैं, जब इनकी दुकान-घर पर नेताओं का तांता लगा रहता है.

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।