ईरान अभी कुछ देशों के निशाने पर है. अमेरिका और उसके सहयोगी यूरोपीय देश ईरान पर परमाणु बम बनाने की तकनीक विकसित करने का आरोप लगा रहे हैं. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को विश्व के लिए खतरा बताकर अमेरिका और यूरोपीय संघ के कई देशों ने उस पर आर्थिक प्रतिबंध की घोषणा भी कर दी है. हालांकि रूस ने कहा है कि ईरान के खिला़फ कोई ऐसा सबूत नहीं मिला है कि वह परमाणु बम बनाने की तकनीक विकसित कर रहा है. चीन, जापान ने भी ईरान से तेल खरीदते रहने का फैसला किया है. भारत का भी कहना है कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के अलावा किसी अन्य प्रतिबंध का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है और ईरान से तेल न खरीदने का प्रतिबंध अमेरिका तथा यूरोसंघ का है, इसलिए भारत ईरान से तेल खरीदता रहेगा. यहां तक बात ठीक है कि राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर ईरान को कमज़ोर करके उसके परमाणु कार्यक्रम को कमज़ोर किया जाए. अगर सही प्रमाण हो तो उस पर और कड़ा प्रतिबंध लगाया जा सकता है. लेकिन हाल फिलहाल में एक बुरी खबर आई, जिसे ग़लत परंपरा की शुरुआत कही जा सकती है. ईरान के एक परमाणु वैज्ञानिक मुस्त़फा अहमदी रोशन की हत्या कर दी गई. ईरान में परमाणु वैज्ञानिक की हुई यह पहली हत्या नहीं है. पिछले दो वर्षों में ईरान के तीन अन्य परमाणु वैज्ञानिकों मसूद अली मोहम्मद, माजिद शहरीयारी तथा रेजेनेयाद की हत्या हो चुकी है तथा एक वैज्ञानिक अब्बासी द्वानी हमले के शिकार होने के बाद बच गए. ईरान से सा़फ तौर पर आरोप लगाया है कि उसके वैज्ञानिकों की हत्या में अमेरिका तथा इजरायल का हाथ है. हालांकि दोनों देशों ने उसके इस आरोप का खंडन किया है. कुछ यूरोपीय देशों का तो कहना है कि इन वैज्ञानिकों की हत्या में ईरान का ही हाथ है, क्योंकि इन वैज्ञानिकों ने ईरान में सही लोकतंत्र स्थापित करने तथा वर्तमान सरकार की नीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी. वैसे ईरान की बात में ज़्यादा दम है. उसके परमाणु कार्यक्रम से इजरायल, अमेरिका और यूरोप के कुछ देश ज़्यादा ही नाराज़ दिखते हैं. इन देशों को विश्व की चिंता सबसे अधिक है. हालांकि इसके पीछे का राज़ कुछ और ही है. अमेरिका की नज़र ईरान पर बहुत दिनों से अटकी हुई है. उसे तो मौका मिलना चाहिए. अब तो अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट मांगने वाले प्रत्याशियों ने भी ईरान के नाम पर वोट मांगना शुरू कर दिया है. एक प्रत्याशी ने तो यहां तक कह दिया कि चुनाव जीतने के बाद वह ईरान पर हमला करेगा. ऐसी स्थिति में ईरान के किसी परमाणु वैज्ञानिक की हत्या होती है तो संदेह इन देशों पर तो होगा ही. इजरायल तो यह चाहता है कि इसी बहाने ईरान उसके ऊपर हमला करे, जिससे उसे ईरान को तबाह करने का मौका मिल जाए. लेकिन ईरान भी इसके झांसे में आने वाला नहीं है. उसने भी कहा है कि वह उन्हीं तरीक़ों का इस्तेमाल करेगा, जिनका इस्तेमाल उसके खिलाफ किया जा रहा है. अगर ईरान भी इन देशों के वैज्ञानिकों की हत्या का षड्यंत्र करता है, तो इससेएक ग़लत परंपरा की शुरुआत होगी. हालांकि इसके लिए ईरान को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. अगर इस तरह की हत्याओं का दौर शुरू हो गया तो फिर विज्ञान की प्रगति की रफ्तार पर तो बे्रक हीं लग जाएगा. इस तरह की कार्रवाइयों की वैश्विक स्तर पर कड़ी आलोचना होनी चाहिए. ईरान ने तो इस हत्या पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं विशेषकर मानवाधिकार संस्थाओं के मौन की आलोचना की है. ईरान की मांग जायज़ भी है. अगर मानवाधिकार संस्थाएं इतना भी नहीं कर पाएंगी तो उन्हें भी पिछलग्गू ही कहा जाएगा. ईरान के जख्मों को कुरेदने की बजाय सहलाने की ज़रूरत है. ऐसा न हो कि प्रतिक्रिया के चक्कर में विश्व के वैज्ञानिकों को राजनीति का शिकार होना पड़ जाए. उसे परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए ग़लत परंपरा क़ायम नहीं की जानी चाहिए, जिससे विश्व ही विनाश के कगार पर पहुंच जाए.
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