यह देश के लिए परीक्षा की घड़ी है

जितना हम अनुभव करते हैं, उससे ज़्यादा कठिन दौर से हमारा देश गुज़र रहा है. 1991 में हुए आर्थिक सुधारों ने ढेर सारी संभावनाएं पैदा कीं, जिन्होंने इस बात की उम्मीद बढ़ाई कि देश की आर्थिक विकास दर में वृद्धि होगी. पिछले बीस सालों में बहुत सारी घटनाएं घटीं. आर्थिक विकास दर में लगातार वृद्धि हुई, जिसे विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले विकास में देखा जा सकता है. बड़े और छोटे शहरों में सड़कों, फ्लाई ओवरों एवं माल्स आदि का निर्माण बड़े पैमाने पर हुआ. मध्य वर्ग ने अच्छा विकास किया.

लोगों की उम्मीदें बढ़ने लगीं और वे इससे बेहतर सुधार की आवश्यकता महसूस करने लगे. कारों की संख्या लगातार बढ़ती रही. हर महीने नई कारें बाज़ार में आती रहीं. लेकिन आज आर्थिक विकास में गिरावट देखने को मिल रही है. आर्थिक विकास दर 8-9 फीसदी से गिरकर 7 फीसदी या उससे कम हो गई है. बाज़ार में अवसाद की स्थिति छाने लगी है और पूंजीपतियों को चिंता सताने लगी है. हम इस बात को भूल गए हैं कि आज़ादी के बाद चालीस सालों तक इस देश की आर्थिक विकास दर 3-4 फीसदी रही थी. आज भी चीन को छोड़ दिया जाए तो विश्व के लगभग सभी देशों की आर्थिक विकास दर 3 फीसदी के आसपास ही है. दूसरी तऱफ देश के ग़रीब लोगों एवं आदिवासियों के मन में काफी गुस्सा है. उनकी स्थिति अच्छी नहीं है, वे ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. माओवादी हिंसा इसी का परिणाम कही जा सकती है, जिसे रोकने के लिए बर्बर पुलिसिया कार्रवाई की जाती है. ऐसे ही वातावरण में अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आंदोलन चलाया, जिसने लोगों की उम्मीदें बढ़ा दीं. पश्चिमी देशों की तर्ज पर उच्च विकास दर और प्रतिस्पर्द्धा की नीति पर प्रश्न उठने लगे हैं. एक तऱफ इस तरह की व्यवस्था लाई जाए और दूसरी तऱफ कॉरपोरेट क्षेत्र को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की बात हो, यह समझ से परे है. पश्चिमी देशों में भी भ्रष्टाचार मुक्त कॉरपोरेट संस्कृति संभव नहीं है.

अगर अन्ना हजारे के आंदोलन को तार्किक रूप से समाप्त हुआ मान लिया जाए तो फिर हमें इसके विकल्प की तलाश करनी है. एक बात यह कही जा सकती है कि वर्तमान संसद ने लोगों का नेतृत्व करना बंद कर दिया है. ऐसे में फिर से चुनाव कराया जाना चाहिए. दूसरी बात यह कही जा सकती है कि संसद लोगों का प्रतिनिधित्व करती ही नहीं है और अब इसके विकल्प की तलाश करने का व़क्त आ गया है. अगर हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि वर्तमान संसदीय व्यवस्था सबसे अच्छी व्यवस्था नहीं है, क्योंकि इसमें सांसद धनबल और बाहुबल की बदौलत चुनाव जीतकर आते हैं, तो फिर हमें इसके विकल्प के बारे में सोचना होगा. हमारे पड़ोस और पश्चिम एशिया के कुछ देशों में सत्ता की बागडोर सेना के हाथ में है. इससे पहले कि हम उस अराजक स्थिति में आ जाएं, जबकि लोग किसी तरह की ज़िम्मेदारी के बिना जो चाहें करना शुरू कर दें, हमें इस बिंदु पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. हम इस व्यवस्था में भी सुधार कर सकते हैं. अगर हम केवल इस व्यवस्था की खामियों की ओर इशारा करेंगे और इसमें सुधार करने के बजाय इसे त्यागने की बात सोचेंगे तो उसका विपरीत परिणाम निकल सकता है. जैसी व्यवस्था वर्तमान समय में है, उससे भी ख़राब स्थिति उत्पन्न हो सकती है.