दो खुदकुशी और एक क़त्ल

नए साल की समाप्ति का रास्ता क्या है. हम शुरू करते हैं अन्ना हजारे के अनशन और जेल भरो आंदोलन की धमकी से, जिसके बारे में 27 दिसंबर की दोपहर के बाद पता चल गया था कि उनका यह आंदोलन मुंबई में असफल रहा. दिल्ली की बात कुछ और है. यह ऐसा शहर है, जहां राजनीति का प्रभाव है, शक्ति का केंद्र है, लेकिन मुंबई में ऐसा नहीं है. वहां तो एक साथ कई क्षेत्रों की प्रधानता है और राजनीति को दूसरा दर्जा भी प्राप्त नहीं है. मैंने पहले ही अनशन को उबाऊ और अप्रभावी बताया था, जो अब साबित भी हो गया है. अन्ना ने 28 दिसंबर को अनशन समाप्त और जेल भरो आंदोलन स्थगित कर, आगे का कार्यक्रम निश्चित न करके एक तरह से आत्महत्या कर ली. इस बीच एक बात और देखने को मिली. अन्ना हजारे की धमकी से मुक्त होने के बाद यूपीए सरकार ने भी आत्महत्या कर ली. इसकी शुरुआत सोनिया गांधी के उस बयान के साथ हुई कि कांग्रेस लोकपाल पर लड़ाई के लिए तैयार है, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं. उनकी पार्टी अव्यवस्थित रही. यहां तक कि वह अपनी पार्टी के सभी सांसदों को लोकसभा में रोके रखने में भी असफल रहीं. मैंने भी कम ही इस तरह के नेतृत्व वाला संसदीय दल देखा है, जिसमें पार्टी प्रमुख अपने दल को व्यवस्थित भी न कर सका हो. 27 दिसंबर को लोकसभा में कुछ ऐसा ही देखा गया.

लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने वाला संशोधन कांग्रेस पारित नहीं करा पाई. यह उसके लिए अच्छी बात नहीं थी. कहा जा सकता है कि राहुल गांधी को पहली बार में ही इतना बड़ा झटका लगा, क्योंकि सभी लोग जानते हैं कि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का सुझाव उन्हीं का था. कांग्रेस ने लोकपाल बिल लोकसभा में पारित कराया, जिसका कारण दोस्ताना तरीक़े से सपा और बसपा के सांसदों द्वारा सदन से बाहर चले जाना था. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण चुनाव आयोग द्वारा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तारीख़ों की घोषणा को माना जा सकता है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस समय सबसे अहम मुद्दा मुस्लिम वोट पाना है. कांग्रेस ने नरसिम्हा राव के समय ही मुस्लिमों का समर्थन खो दिया था, जब वह बाबरी मस्जिद को ढहने से नहीं रोक पाए थे. मुलायम सिंह ने इसका फायदा उठाया और मुस्लिमों को अपने पक्ष में कर लिया. कांग्रेस अब फिर से मुस्लिमों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है. यही कारण है कि कांगे्रस ने लोकपाल में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का प्रावधान रखा है. इसी कारण सपा और बसपा ने लोकसभा का बहिष्कार किया, जबकि भाजपा के कई संशोधनों का समर्थन किया गया.

लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने वाला संशोधन कांग्रेस पारित नहीं करा पाई. यह उसके लिए अच्छी बात नहीं थी. कहा जा सकता है कि राहुल गांधी को पहली बार में ही इतना बड़ा झटका लगा, क्योंकि सभी लोग जानते हैं कि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का सुझाव उन्हीं का था. कांग्रेस ने लोकपाल बिल लोकसभा में पारित कराया, जिसका कारण दोस्ताना तरीक़े से सपा और बसपा के सांसदों द्वारा सदन से बाहर चले जाना था.

लोकसभा में लोकपाल बिल पारित हो गया, लेकिन उसे संवैधानिक दर्जा दिए जाने का संशोधन पारित नहीं हो सका. इस तरह का लोकपाल प्रभावशाली नहीं हो सकता. सीबीआई की स्वायत्तता भी सुनिश्चित नहीं की गई. इसके बाद के दो दिन तो और भी ख़राब रहे. राज्यसभा को एक दिन में ही स्थगित कर दिया गया. यहां लोकपाल बिल पारित नहीं हो पाया. इसका मतलब यह है कि अब लोकपाल बिल संशोधनों के साथ फिर से लोकसभा में नहीं जा सकेगा. यह कोई अचानक घटने वाली घटना नहीं थी. संसद को समझने वाला कोई भी व्यक्ति इसे जान सकता है. ऐसा जानबूझ कर किया गया है या फिर इसे सरकार की अक्षमता कहा जा सकता है. कांग्रेस इस कदर दिवालिया हो गई है कि उसके पास भाजपा की आलोचना करने के अलावा और कुछ कहने को बचा ही नहीं है. कांग्रेस का कहना है कि संवैधानिक सुधार के लिए ज़रूरी दो तिहाई बहुमत न ला पाने के लिए भी भाजपा ज़िम्मेदार है. अगर कांग्रेस भाजपा को कोसना छोड़ दे तो वह उसका सहयोग प्राप्त कर सकती है. अपनी अक्षमता के लिए कांगे्रस भाजपा को क्यों दोष दे रही है. कांग्रेस या यूपीए सरकार ने 27 दिसंबर को आत्महत्या की और 29 दिसंबर को संसदीय लोकतंत्र की हत्या कर दी. इसकी वजह उसकी कायरता थी. राज्यसभा में उसका बहुमत नहीं था और तृणमूल कांग्रेस भी उसका विरोध कर रही थी. ममता बनर्जी मेरी पसंदीदा नहीं हैं, लेकिन इतना तो है कि उनके द्वारा लाया गया संशोधन प्रभावशाली था.

कांग्रेस ने केंद्रीयकरण की नीति अपना कर राज्य की स्वायत्तता छीनने की कोशिश की थी. 1947 के बाद समय बदल गया है. अब राज्यों के पास अपनी ताक़त और पहचान है. यह संघीय व्यवस्था का ही परिणाम है कि केंद्र में सत्ता में रहने के बावजूद राज्यसभा में उसका बहुमत नहीं है, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ रहा है. देखा जाए तो कांगे्रस के प्रवक्ता लोकपाल बिल पारित न हो पाने के लिए भाजपा पर आरोप बौखलाहट वश ही लगा रहे थे. यह सही रवैया नहीं कहा जा सकता. राज्यसभा में लोकपाल बिल पर हुई बहस के अंतिम आधे घंटे में कांग्रेस ने हंगामा कराने की रणनीति अपनाई, ताकि मतदान न हो सके और राज्यसभा की कार्रवाई स्थगित कर दी जाए. यह सारा नाटक इसलिए किया गया, ताकि राज्यसभा में कांग्रेस को पराजय का मुंह न देखना पड़े. कांग्रेस ने 29 दिसंबर की मध्य रात्रि को लोकतंत्र की हत्या कर दी. इसे किसी भी तरह से किसी लोकतांत्रिक सरकार के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता. अगर ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहीं तो लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी गई सरकार पर से लोगों का भरोसा धीरे-धीरे उठ जाएगा.

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