यूआईडीः नागरिकों के मूल अधिकारों के साथ खिलवाड़

जब लोकपाल बिल को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना हज़ारे का एक दिवसीय अनशन शुरू हुआ तो उन्होंने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को जनलोकपाल बिल पर बहस करने की दावत दी, लेकिन सांसदों ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि इस बिल पर चर्चा करने का अधिकार केवल संसद को है, सड़क पर चर्चा नहीं होनी चाहिए. क्या सरकार और हमारे नेता इस बात का जवाब दे सकते हैं कि जब संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने यूआईडीएआई के चेयरमैन नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में जारी आधार स्कीम पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे ख़ारिज करके सरकार से उस पर दोबारा ग़ौर करने के लिए कहा है तो फिर क्यों अभी तक यह कार्ड बनने का सिलसिला जारी है. हमारे सांसद इस बात को लेकर हंगामा क्यों नहीं करते कि संसद में चर्चा और यूआईडी बिल पास किए बिना प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने नंदन नीलेकणी को इतना बड़ा अधिकार कैसे दे दिया. यूआईडी कार्ड के नामांकन के समय नागरिकों से उनके उंगलियों और आइरिस स्कैनिंग जैसे बायोमैट्रिक्स निशान लिए जा रहे हैं, जिनकी मंजूरी संसद से नहीं ली गई है. बायोमैट्रिक्स निशान तो अपराधियों के लिए जाते हैं और जब वे रिहा हो जाते हैं तो उनके बायोमैट्रिक्स निशानों को भी ख़त्म कर दिया जाता है, लेकिन यूआईडी के तहत नागरिकों के जो बायोमैट्रिक्स निशान लिए जा रहे हैं, वे तो हमेशा के लिए सुरक्षित रहेंगे और वह भी यूआईडीएआई जैसी असंवैधानिक संस्था के पास, जिसने सभी डाटा को एकत्र करने का काम निजी कंपनियों को दे रखा है. क़ानून और संसद की इतनी बड़ी अवहेलना देश में हो रही है और सरकार ख़ामोश है. ये सभी सवाल ऐसे हैं, जिनका जवाब यूपीए सरकार को देना होगा.

अगर ग़ौर किया जाए तो यूआईडी कार्ड के नाम पर देश का ख़ज़ाना लूटा जा रहा है, क्योंकि इस कार्ड के बन जाने के बाद इसके प्रयोग के लिए सरकार को करोड़ों कंप्यूटर और स्कैनर ख़रीदने होंगे. ज़ाहिर है, इससे उन्हीं कंपनियों का फ़ायदा होगा, जो कंप्यूटर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर बनाती हैं. इस तरह देखा जाए तो कॉमनवेल्थ एवं टूजी स्पेक्ट्रम जैसे एक और बड़े घोटाले को अंजाम देने की तैयारी चल रही है, जिसके लिए मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया के ख़िलाफ़ जांच होनी चाहिए, इन्हें जेल भेजा जाना चाहिए, क्योंकि इन लोगों ने न केवल संसदीय सिद्धांतों का उल्लंघन किया है, बल्कि निजी कंपनियों को यहां के नागरिकों की व्यक्तिगत सूचनाएं अवैध तरीके से इकट्ठा करने का अधिकार दे दिया है और यह देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है.

इस कार्ड द्वारा पूरी दुनिया के नागरिकों का डाटा इकट्ठा करके कंप्यूटर के किसी एक सर्वर पर डालने की योजना बनाई जा रही है. ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाले दिनों में अलग-अलग राष्ट्रों की सीमाओं का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. जिस देश के पास ये तमाम जानकारियां होंगी, वह बड़ी आसानी से किसी एक जगह पर बैठकर पूरी दुनिया पर बेरोकटोक राज करेगा. अगर ऐसा हुआ तो यह पूरे विश्व के लिए निहायत ख़तरनाक स्थिति होगी, क्योंकि जो देश पिछड़े और ग़रीब हैं, उनके नागरिकों को ताकतवर देशों की गुलामी करनी पड़ेगी. एक शंका यह भी जताई जा रही है कि अगर इस कार्ड का धारक सात से दस वर्षों तक इसका प्रयोग नहीं करेगा तो उसे बड़ी आसानी से मृत घोषित कर दिया जाएगा.

इस योजना पर सरकार अब तक 556 करोड़ रुपये ख़र्च कर चुकी है. लोगों के बढ़ते विरोध से ऐसा लगता है कि सरकार को आज नहीं तो कल यह प्रोजेक्ट वापस लेने पर विवश होना पड़ेगा. नंदन नीलेकणी ने जितने भी तर्क इस कार्ड के पक्ष में दिए थे, उन सभी को देश का बुद्धिजीवी वर्ग ख़ारिज कर चुका है. माना जा रहा है कि यूआईडी कार्ड देश की सुरक्षा के लिए एक बड़ा ख़तरा है. प्रसिद्ध वैज्ञानिक मैथ्यू थॉमस एवं सामाजिक कार्यकर्ता वी के सोमशेखर ने बंगलुरू की एक अदालत में अपील दायर की है कि इस प्रोजेक्ट को अवैध घोषित किया जाए. उन्होंने आरोप लगाया कि यह योजना कुछ सॉफ्टवेयर कंपनियों को वित्तीय लाभ पहुंचाने के लिए शुरू की गई है. उन्होंने कहा कि इसका मूल उद्देश्य नागरिकों की गतिविधियों पर नज़र रखना, उनकी जासूसी करना और क्षेत्रीय एवं भौगोलिक बुनियाद पर नागरिकों की जानकारी व्यापारिक उद्देश्यों के लिए प्रयोग में लाना है. इसके द्वारा कुछ स्थायी और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, वित्तीय संस्थाओं, इंश्योरेंस, टेलीकॉम एवं इमेजिंग कंपनियों, हितवादी संगठनों, संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले संगठनों को लाभ पहुंचाया जा सकता है. यह सब करदाताओं से प्राप्त धन से किया जा रहा है, जो कि सरासर क़ानून का उल्लंघन है. यह भी एक सच्चाई है कि आधार कार्ड के नामांकन के लिए जिन लोगों को लगाया गया है, न तो उनकी पृष्ठभूमि जानने की कोशिश की गई और न यह जानने की कि कहीं ये लोग देश विरोधी गतिविधियों में तो शामिल नहीं हैं.

बड़े आश्चर्य की बात है कि नंदन नीलेकणी के कार्यालय से आरटीआई के तहत जब यह सवाल पूछा जाता है कि यूआईडी कार्ड बनाने का ठेका जिन कंपनियों को दिया गया है, वह किस देश की हैं तो जवाब मिलता है कि बहुत कोशिश करने के बाद भी यूआईडीएआई इन कंपनियों के देशों के बारे में पता करने में नाकाम रही. इतना बड़ा  झूठ बोलने के लिए भी नीलेकणी के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर होना चाहिए.

दूसरा सवाल यह उठता है कि देश के अंदर जब किसी का पासपोर्ट बनता है तो उसके लिए पुलिस द्वारा पहले जांच-पड़ताल की जाती है, लेकिन यूआईडी कार्ड बनवाने के लिए किसी जांच-पड़ताल की कोई ज़रूरत नहीं है. इस स्थिति में कोई भी बड़ी आसानी से यह कार्ड बनवा सकता है, चाहे वह विदेशी ही क्यों न हो या फिर उसका संबंध किसी आतंकी समूह से ही क्यों न हो. मसलन, पिछले दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय में होने वाले बम धमाके के सिलसिले में पुलिस ने कश्मीर के दो लोगों को गिरफ्तार किया, लेकिन बाद में उन्हें इसलिए रिहा कर दिया गया, क्योंकि उनके पास यूआईडी कार्ड था. ऐसे में तो नेपाल, बांग्लादेश, भूटान एवं म्यांमार जैसे किसी भी दूसरे देश का नागरिक बड़ी आसानी से यूआईडी कार्ड बनवा कर भारत विरोधी गतिविधियां चला सकता है और उस पर शक इसलिए नहीं किया जाएगा, क्योंकि उसके पास यूआईडी कार्ड है.

हमारी सरकार पूरी दुनिया के लोगों के लिए पहचान पत्र बनाने का सिरदर्द क्यों मोल लेना चाहती है, क्या उसके पास और कोई काम नहीं है या उसके पास अब इतने पैसे हो गए हैं कि उसे समझ में नहीं आ रहा है कि उन पैसों को कहां ख़र्च किया जाए. यह सवाल पैदा होना लाज़िमी इसलिए है, क्योंकि सरकार यूआईडी योजना पर एक लाख 50 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करने का मन बना चुकी है. सरकार को यह अधिकार भला किसने दिया कि वह इतनी बड़ी धनराशि एक ऐसे काम में ख़र्च कर दे, जिसका कोई मतलब नहीं है, जिसका मक़सद साफ़ नहीं है.

योजना आयोग की दलील है कि सरकार इस कार्ड द्वारा नागरिकों को यूनिक नंबर इसलिए देना चाहती है, ताकि कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा उन तक भी पहुंच सके, जिनके पास अब तक कोई पहचान पत्र नहीं है. एक अनुमान के अनुसार, नामांकन के समय जो बायोमैट्रिक्स निशान (आंखों और उंगलियों के) लिए जाते हैं, वे देश के हर कोने में रहने वाले लोगों के लिए सफल नहीं हैं. मसलन, दूरदराज़ और पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले ग़रीब लोगों में कुछ ऐसी बीमारियां पाई गईं, जिनकी वजह से उनकी उंगलियों या आंखों के निशान कंप्यूटर पर उतारे नहीं जा सके. फिर भला ऐसे लोगों को सरकार यह कार्ड कैसे जारी करेगी. सरकार का तर्क है कि यह कार्ड नागरिकता की पहचान के लिए जारी नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसका मक़सद हर व्यक्ति की पहचान स्थापित करना है. इसलिए यहां रहने वाले दूसरे देशों के लोगों को भी यह कार्ड जारी करने में कोई परेशानी नहीं है. सवाल यह है कि क्या सरकार के पास विदेशियों की पहचान के लिए मशीनरी नहीं है. जिन देशों से उनका रिश्ता है, वहां की सरकारों के पास ऐसा कोई तरीक़ा नहीं है, जिससे वे अपने नागरिकों को पहचान पत्र जारी कर सकें. हमारी सरकार पूरी दुनिया के लोगों के लिए पहचान पत्र बनाने का सिरदर्द क्यों मोल लेना चाहती है, क्या उसके पास और कोई काम नहीं है या उसके पास अब इतने पैसे हो गए हैं कि उसे समझ में नहीं आ रहा है कि उन पैसों को कहां ख़र्च किया जाए. यह सवाल पैदा होना लाज़िमी इसलिए है, क्योंकि सरकार यूआईडी योजना पर एक लाख 50 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करने का मन बना चुकी है. सरकार को यह अधिकार भला किसने दिया कि वह इतनी बड़ी धनराशि एक ऐसे काम में ख़र्च कर दे, जिसका कोई मतलब नहीं है, जिसका मक़सद साफ़ नहीं है.

भारत में करोड़ों लोगों के पास रहने के लिए घर नहीं है, शौचालय नहीं है, पीने का पानी नहीं है, पर्याप्त संख्या में स्कूल-कॉलेज नहीं हैं, जहां देश के बच्चे शिक्षा प्राप्त कर सकें. सरकार को अगर पैसा ख़र्च करना है, तो उसे इन मूलभूत समस्याओं के निराकरण की दिशा में खर्च करना चाहिए, लेकिन नहीं, वह केवल कुछ निजी आईटी कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने का काम कर रही है. अगर ग़ौर किया जाए तो यूआईडी कार्ड के नाम पर देश का ख़ज़ाना लूटा जा रहा है, क्योंकि इस कार्ड के बन जाने के बाद इसके प्रयोग के लिए सरकार को करोड़ों कंप्यूटर और स्कैनर ख़रीदने होंगे. ज़ाहिर है, इससे उन्हीं कंपनियों का फ़ायदा होगा, जो कंप्यूटर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर बनाती हैं. इस तरह देखा जाए तो कॉमनवेल्थ एवं टूजी स्पेक्ट्रम जैसे एक और बड़े घोटाले को अंजाम देने की तैयारी चल रही है, जिसके लिए मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया के ख़िलाफ़ जांच होनी चाहिए, इन्हें जेल भेजा जाना चाहिए, क्योंकि इन लोगों ने न केवल संसदीय सिद्धांतों का उल्लंघन किया है, बल्कि निजी कंपनियों को यहां के नागरिकों की व्यक्तिगत सूचनाएं अवैध तरीके से इकट्ठा करने का अधिकार दे दिया है और यह देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है.

बड़े आश्चर्य की बात है कि नंदन नीलेकणी के कार्यालय से आरटीआई के तहत जब यह सवाल पूछा जाता है कि यूआईडी कार्ड बनाने का ठेका जिन कंपनियों को दिया गया है, वह किस देश की हैं तो जवाब मिलता है कि बहुत कोशिश करने के बाद भी यूआईडीएआई इन कंपनियों के देशों के बारे में पता करने में नाकाम रही. इतना बड़ा  झूठ बोलने के लिए भी नीलेकणी के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर होना चाहिए. देश के लोग यह जानते हैं कि 19 जुलाई 2011 को यूआईडीएआई ने जिस एल1 आईडेंटिटी सोल्यूशंस को कार्ड बनाने का ठेका दिया था, उसे हाल ही में फ्रांस के सैफरन गु्रप ने ख़रीद लिया है. इस कंपनी ने नई दिल्ली स्थित हिन्दुस्तान टाइम्स भवन में एक कार्यालय भी शुरू किया है. ऐसे में एक विदेशी कंपनी के साथ भारतीय नागरिकों के बारे में सारी जानकारियां साझा करना क्या देश की सुरक्षा के साथ ख़िलवाड़ नहीं है. इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों और शिक्षाविदों सहित प्रबुद्ध नागरिकों ने एक बयान में अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए यूआईडी जैसी पहचान प्रक्रियाओं पर रोक लगाने की मांग की थी.

यह कार्ड खतरनाक है

चौथी दुनिया ने बहुत पहले जनता को इस कार्ड के बारे में चेता दिया था कि यूआईडी एक ऐसी योजना है, जिस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है. वह इसलिए, क्योंकि इस कार्ड का प्रयोग इतिहास के सबसे ख़तरनाक नरसंहार का कारण बन सकता है, क्योंकि यह कार्ड सरकार में भ्रम पैदा कर रहा है. इस कार्ड को बनाने वाली कंपनियों के तार विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियों से जुड़े हैं. इसे लागू करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. यूआईडीएआई के चेयरमैन नंदन नीलेकणी ने देश के साथ-साथ सरकार को भी गुमराह किया. देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करते हुए यूआईडीएआई ने कार्ड बनाने के लिए तीन कंपनियों का चयन किया, जिनमें एसेंचर, महिंद्रा-सत्यम-मार्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन शामिल हैं. इन तीनों कंपनियों पर गौर करते हैं तो डर सा लगता है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं. इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनके रिश्ते अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रहे हैं. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से एक है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रॉनिक पासपोर्ट आदि बेचती है. अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट और यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के सभी काम इसी कंपनी के पास हैं. यह पासपोर्ट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक बनाकर देती है. इस कंपनी के डायरेक्टरों के बारे में जानना बहुत ही ज़रूरी है. इसके सीईओ ने 2006 में कहा था कि उन्होंने सीआईए के जॉर्ज टेनेट को कंपनी बोर्ड में शामिल किया है. जॉर्ज टेनेट सीआईए के डायरेक्टर रह चुके हैं और उन्होंने ही इराक़ के ख़िलाफ झूठे सबूत इकट्ठा किए थे कि उसके पास महाविनाश के हथियार हैं. अब कंपनी की वेबसाइट पर उनका नाम नहीं है, लेकिन जिनका नाम है, उनमें से किसी का रिश्ता अमेरिका के आर्मी टेक्नोलॉजी साइंस बोर्ड, आर्म्ड फोर्स कम्युनिकेशन एंड इलेक्ट्रॉनिक एसोसिएशन, आर्मी नेशनल साइंस सेंटर एडवाइज़री बोर्ड और ट्रांसपोर्ट सिक्योरिटी जैसे संगठनों से रहा है. इसकी गहराई में जाएं तो पता चलता है कि इन सभी अधिकारियों के संबंध यहूदी संगठनों के साथ भी रहे हैं.

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  • Anil Gupta

    चौथी दुनिया कई महीनों से इस कार्ड के बारे में चिंताओं को अभिव्यक्त कर रही है लेकिन इस पर संसद में किसी ने भी जोरदार तरीके से नहीं
    उठाया.क्या कोई इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायलय का दरवाजा खट खताएगा?क्या देश के नागरिकों के लिए संभावित खतरे के निराकरण का उपाय करने का कोई कानूनी अधिकार है?क्या माननीय सर्वोच्च न्यायलय इस महत्व पूर्ण मसले पर देश के सामान्य नागरिकों को कोई रहत दे सकता है?क्या ये आम नागरिकों के जीवन के अधिकार से नहीं जुड़ा है?क्या ये नागरिकों के निजता के अधिकार से नहीं जुड़ा है?आखिर हमारे खोजी पत्रकार इस विषय की तह तक जाकर इसके असली मकसद तक पहुँचाने का कार्य क्यों नहीं करते?किन किन के व्यापारिक उद्देश्य इस योजना से पूरे हो रहे हैं ये जानने का देश को अधिकार है.