उत्तर प्रदेश : अन्ना और रामदेव, कांग्रेस के लिए ख़तरा

सरकार और राजनेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए किस तरह लोगों की छवि धूमिल करते हैं, इसकी ताजा मिसाल हैं समाजसेवी अन्ना हजारे और योग गुरु बाबा रामदेव. कुसूर यह है कि एक जनता को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए सख्त क़ानून की वकालत कर रहा है और दूसरा विदेशों में जमा काला धन वापस मंगाने के लिए हाथ-पैर मार रहा है. दोनों को केंद्र सरकार ने तर्कों-कुतर्कों के सहारे विवादित बनाने का अभियान चला दिया. छवि धूमिल करने के लिए ऐसे शिगूफे छोड़े गए कि लोग दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गए. कभी संसद के अंदर तो कभी बाहर उन्हें खरी-खोटी सुनाई गई. उनके साथ खड़े होने वालों का भी मज़ाक उड़ाया गया. श्रीश्री रविशंकर भी अछूते नहीं रह सके. राजनीति से दूर रहने वाले लोगों से पूछा गया कि वे किसके इशारे पर जनता के हित के लिए अभियान चला रहे हैं. मानों कांग्रेस को छोड़कर किसी अन्य को जनहित की बात करने का अधिकार न हो. हद तो तब हो गई, जब कांग्रेस के अंदर कहा जाने लगा कि 125 साल के इतिहास में कई लोग चुनौती देने आए और चले गए, लेकिन कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया. कांग्रेस की तऱफ से अन्ना, बाबा रामदेव एवं श्रीश्री रविशंकर को भाजपा और संघ का ए, बी और सी प्लान बताया जा रहा है. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जो भी आवाज़ उठाता है, कांग्रेस उसका गला घोंट देना चाहती है. कांग्रेस को सख्त लोकपाल से परहेज है, इसलिए वह उसे संसद के माध्यम से लटकाए रखना चाहती है. सवाल उठ रहा है कि कांगे्रस लोकपाल के ख़िला़फ क्यों है और लोग उसके जवाब में राहुल गांधी की ओर इशारा कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश में यह आम धारणा है कि कांगे्रस अपने भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के रास्ते में लोकपाल रूपी रोड़ा नहीं डालना चाहती. इसके लिए उसे न संसद की अवमानना की चिंता है और न संविधान के ख़िला़फ जाने से परहेज. कांगे्रस सख्त लोकपाल लाने से बचने के लिए जो टोटके आजमा रही है, वे कहीं उत्तर प्रदेश में उसकी राह में बाधक न बन जाएं. कांगे्रस के बड़े नेता ऐसी चर्चा करने से भले बच रहे हों, लेकिन आम कांग्रेसी को लगातार यह भय सता रहा है कि मतदाताओं की नाराज़गी कहीं भारी न पड़ जाए. अन्ना और बाबा रामदेव कांग्रेस के ख़िला़फ हुंकार भर रहे हैं. यह हुंकार चुनाव आते-आते दहाड़ में बदल सकती है. अन्ना अपनी टीम के साथ उत्तर प्रदेश सहित पांचों राज्यों का दौरा करके कांग्रेस और सरकार की कलई खोलने के लिए बेताब हैं. और तो और, जिन युवाओं को राहुल गांधी अपनी ताक़त समझ रहे थे, वे भ्रष्टाचार और लोकपाल के प्रति उनके ढुलमुल रवैये से आहत होकर अन्ना के साथ खड़े हो गए हैं.

चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए कांग्रेस छोड़कर हर दल अन्ना और रामदेव के ख़िला़फ मुंह खोलने से बच रहा है. मायावती कहती हैं कि अगर सीबीआई को लोकपाल के दायरे में नहीं लाया गया तो बसपा समर्थन नहीं करेगी. मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि मज़बूत लोकपाल आना चाहिए, सरकारी लोकपाल कमज़ोर है. पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि अन्ना केंद्र की तरह मायावती सरकार के भ्रष्टाचार को भी उजागर करें. प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि अच्छे और ईमानदार उम्मीदवारों को जिताने की अन्ना की मुहिम पर किसी को कोई आपति नहीं है. कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं, मुझे नहीं लगता कि अन्ना का असर विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा.

यह लगभग तय हो गया है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आंदोलन की अगुवाई कर रहे अन्ना हजारे के साये में होंगे. बाबा रामदेव भी काला धन प्रकरण पर कांग्रेस की नाक में दम भरने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ेंगे. वह झांसी से शुरू हुई अपनी 10 हज़ार किलोमीटर की भारत स्वाभिमान यात्रा भी पूरी कर चुके हैं. यात्रा के दौरान उन्होंने दोहराया कि यह संग्राम सड़क से संसद तक चलेगा. देश को जगाने के लिए निकला हूं और उसके जागने तक चुप नहीं बैठूंगा. अन्ना ने भी साफ कर दिया है कि वह उत्तर प्रदेश में घूम-घूमकर जनता को बताएंगे कि केंद्र सरकार ने जन लोकपाल पर लोगों को किस तरह गुमराह किया. इंडिया अगेंस्ट करप्शन की कोर कमेटी के सदस्य अंशुमालि शर्मा कहते हैं कि अन्ना के दौरे का सीधा असर विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा. टीम अन्ना शुरू से ही स्वच्छ छवि का प्रत्याशी चुनने की मुहिम चला रही है. मतदान के दिन युवा मतदाताओं की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यकर्ता नए मतदाता बनाने का अभियान भी चला रहे हैं. अन्ना को अगर युवाओं का साथ मिल गया तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के युवराज का सपना टूट सकता है.

राष्ट्रीय सेवा योजना संगठन की सक्रियता का ही परिणाम था कि इस बार लखनऊ में दो लाख नए मतदाताओं में डेढ़ लाख युवा शामिल हैं. पूरे प्रदेश में यह आंकड़ा और भी मज़बूत होता दिख रहा है. राजनीति से दूर, मौजमस्ती को तरजीह देने वाले युवा अन्ना के कारण पहली बार राजनीतिक रूप से परिपक्व दिख रहे हैं. उन्हें अन्ना के रूप में आईकॉन मिल गया है. राजनीति को लेकर भ्रमित रहने वाले युवा आज अन्ना को अपने युग का महात्मा गांधी मानते हैं. आख़िर राजनेताओं ने उन्हें बेरोज़गारी और शिक्षा के व्यवसायीकरण के अलावा दिया ही क्या है. उच्च शिक्षा हासिल करना गरीब ही नहीं, निम्न मध्यम परिवार के होनहार बेटे-बेटियों के लिए भी सपने जैसा हो गया है. लंबे समय के बाद युवाओं को कोई ऐसा जननेता दिखा, जिसकी बात में दम है और हौसलों में फौलाद. 74 वर्षीय अन्ना हजारे ने जिस तरह 13 दिनों तक भूखे रहकर जनता के सवालों और चिंताओं को सरकार तक पहुंचाया, वह विरले लोग कर सकते हैं. अगर अन्ना ने किसी भी विधानसभा क्षेत्र में जाकर जन लोकपाल बिल पर सरकार के धोखे को बयान किया तो वहां कांग्रेस प्रत्याशी की राह मुश्किल हो जाएगी. इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है. युवाओं को लक्ष्य करके उनके बीच कांगे्रस के ख़िला़फ चुनावी अभियान चलाया जा रहा है. उत्तर प्रदेश के पूर्व नौकरशाह अखंड प्रताप सिंह कहते हैं कि अन्ना की अपील चुनाव में असर दिखाएगी. ऐसे में अन्ना को यह ज़रूर ध्यान रखना होगा कि हर राजनीतिक दल में भ्रष्ट और आपराधिक किस्म के लोग हैं, इसलिए उनकी अपील से ऐसा नहीं लगना चाहिए कि वह किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध कर रहे हैं.

लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा कहती हैं कि आम जनता का अन्ना के प्रति विशेष लगाव है. वह भ्रष्टाचार से त्रस्त है, वह जन लोकपाल बिल की बारीकियां तो नहीं समझती, लेकिन एक ऐसा बिल चाहती है, जिससे उसे भ्रष्टाचार से छुटकारा मिले. उसकी सोच यह है कि अन्ना हजारे तो फकीर जैसे हैं, उन्हें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए. वह जनता के हित में सख्त लोकपाल बिल चाहते हैं, जिसमें सीबीआई हो और सी-डी ग्रेड के कर्मचारी भी. उत्तर प्रदेश के चुनाव में उनके कूदने से कांग्रेस के ख़िला़फ माहौल बन सकता है. कांग्रेसी अक्सर कहते हैं कि अन्ना कांग्रेस का विरोध कर रहे हैं और भाजपा को फायदा पहुंचा रहे हैं, लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि पार्टी और सरकार अपने वचन से पीछे क्यों हट रही है. कभी वह आरक्षण का शिगूफा छोड़ देती है तो कभी अन्ना को बेईमान बताने लगती है. जानकार कहते हैं कि अन्ना के विरोध को इस तरह लेना चाहिए कि वह कांग्रेस नहीं, सरकार का विरोध कर रहे हैं. कांग्रेस का विरोध इसलिए है, क्योंकि उसकी सरकार है और उसके नेता दोमुंही बातें कर रहे हैं. कांगे्रसी भले कह रहे हों कि उन्हें अन्ना का डर नहीं सता रहा है, वह तो भाजपा और संघ के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस डरी-सहमी है. कांग्रेस को पटकनी देने के लिए बसपा भी ना-ना करते हुए अन्ना के समर्थन में आ गई. उसने लोकपाल मुद्दे पर अपना स्टैंड बदल लिया. अन्य राजनीतिक दल भी अन्ना को लेकर असमंजस में हैं. वे यह नहीं सोच पा रहे हैं कि क्या किया जाए. अन्ना के आंदोलन को दलित विरोधी बताने वाली बसपा प्रमुख मायावती भले ही उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त को इतनी ताक़त नहीं देना चाहती कि मुख्यमंत्री उसके दायरे में आए, पर जब बात केंद्र की चलती है तो वह सशक्त लोकपाल बिल के लिए अन्ना का समर्थन करती नज़र आती हैं, प्रधानमंत्री को उसके दायरे में लाने के लिए कहती हैं.

चुनाव के बाद कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार बनाने का सपना देख रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव भले ही जन लोकपाल का विरोध करते हुए संसद में कहते हों कि दारोगा भी हमारा गिरेबान पकड़ कर जेल में डाल देगा, लेकिन वह कई बार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना का समर्थन कर चुके हैं. सपा की तऱफ से रामगोपाल यादव अन्ना के मंच पर गए. भारतीय जनता पार्टी तो लगातार उनका समर्थन कर रही है. उसका मक़सद अन्ना के बहाने वोट बैंक मज़बूत करना है. अगर भाजपा केंद्र में सत्तारूढ़ होती तो उसका स्टैंड भी कांग्रेस से अलग न होता, ऐसी सोच रखने वालों की भी संख्या कम नहीं है. अन्ना जैसा समर्थन रामदेव को भले न मिल रहा हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनका आंदोलन कोई गुल नहीं खिला सका. रामदेव के समर्थकों की संख्या करोड़ों में है, जो मौक़ा पड़ने पर उनकी ताक़त बन सकते हैं. रामदेव कहते हैं, 2012 में जनक्रांति होगी, जिसकी कमान युवा वर्ग संभालेगा. बाबा अपने साथ जुटती भीड़ से गदगद हैं. वह मौक़ा देखकर बात करना भी सीख गए हैं. वह अन्ना और अपने आंदोलन में ़फर्क़ भी बताते हैं. उनका कहना है, अन्ना हजारे व्यवस्था परिवर्तन से भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि हमारा आंदोलन समूल नाश के लिए है. विदेशों में जमा काला धन वापस आ गया तो लोग अवैध कमाई और घोटाले करना भूल जाएंगे. दिल्ली के रामलीला मैदान में जैसा व्यवहार उनके साथ किया गया, उसकी टीस अभी भी उनकी बातों में झलकती है.

चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए कांग्रेस छोड़कर हर दल अन्ना और रामदेव के ख़िला़फ मुंह खोलने से बच रहा है. मायावती कहती हैं कि अगर सीबीआई को लोकपाल के दायरे में नहीं लाया गया तो बसपा समर्थन नहीं करेगी. मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि मज़बूत लोकपाल आना चाहिए, सरकारी लोकपाल कमज़ोर है. पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि अन्ना केंद्र की तरह मायावती सरकार के भ्रष्टाचार को भी उजागर करें. प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि अच्छे और ईमानदार उम्मीदवारों को जिताने की अन्ना की मुहिम पर किसी को कोई आपति नहीं है. कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं, मुझे नहीं लगता कि अन्ना का असर विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा. अन्ना के आंदोलन में पर्दे के पीछे कोई और है. यह आंदोलन सोनिया और राहुल की छवि ख़राब करने के लिए चलाया जा रहा है.

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