उत्तर प्रदेश : यहां की जेलें यातना गृह हैं

राज्य की जेलों में वास्तविक क्षमता से चार गुना अधिक संख्या में रखे गए बंदी किस तरह का जीवन जीते होंगे, इसकी कल्पना भी डराती है, साथ ही यह आज़ाद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए प्रश्नचिन्ह भी है. आख़िर शासन और सरकार में आम जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे राजनेताओं ने आज तक इन जेलों की बंदी धारण क्षमता के विस्तार की कोई ज़रूरत क्यों नहीं समझी? जबकि वे ख़ुद इन्हीं जेलों में आ-जाकर अपनी नेतागीरी चमकाने का काम करते रहे हैं. चौथी दुनिया के पास उपलब्ध दस्तावेज़ प्रदेश के जेलों की नारकीय स्थिति के सबूत हैं. इनमें जेलों की बंदी धारण क्षमता, बंदियों की मौजूदा संख्या, पिछले पांच वित्तीय वर्षों में किस जेल को कितना धन मिला, किसने कितना ख़र्च किया, इन जेलों में श्रम कर रहे बंदियों को कितना पारिश्रमिक दिया जा रहा है और जो दिया जा रहा है, क्या वह न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम के मानकों के अनुरूप है, आदि तमाम जानकारियां हैं.

यहां की जेलों में मानवाधिकारों की बात बेमानी साबित हो रही है. समय-समय पर जेल भरो आंदोलन के तहत जेलों में पहुंचने वाले राजनेता बंदियों के जीवन के इस कड़वे सच का स्वाद आख़िर क्यों नहीं चख सके? दरअसल, लोकतंत्र के चुनावी उत्सव में भागीदारी से बंदियों का वंचित होना ही उनका दुर्भाग्य बन गया है.

प्रदेश में वर्ष 1800 से लेकर 2011 तक बनी कुल 63 जेलों में से 53 आज़ादी के पहले की और 10 आज़ादी के बाद की हैं. सबसे पुरानी वर्ष 1800 में बनी ज़िला जेल जौनपुर की है, जबकि सबसे नई 2011 में बनी ज़िला जेल महराजगंज की है. लखनऊ, नैनी, बरेली, आगरा एवं वाराणसी में केंद्रीय जेल हैं, जबकि फैज़ाबाद मंडल जेल बी श्रेणी, दोषसिद्ध बंदियों को रखने के लिए बनाई गई इकलौती जेल है, जिसका निर्माण 1840 में हुआ था. किशोर सदनों एवं नारी निकेतनों को छोड़कर सभी जेलें ज़िला कारागार हैं. इनमें सबसे छोटी ललितपुर ज़िला जेल है. जहां तक जेलों की बंदी धारण क्षमता की बात है तो मुख्यालय, कारागार प्रशासन एवं सुधार सेवाएं, लखनऊ के पत्रांक-18/शोध एवं प्र.सु. अनु.-5 के अनुसार, प्रदेश की कुल 63 जेलों में 46,216 की वास्तविक बंदी धारण क्षमता की जगह 82,935 बंदी हैं यानी क्षमता से लगभग दो गुना अधिक. सर्वाधिक कष्टकारी स्थिति ज़िला जेल देवरिया के बंदियों की है, जहां 293 की क्षमता के सापेक्ष 1068 बंदी हैं यानी क्षमता से लगभग 4 गुना अधिक. महोबा एवं देवबंद में भी क्षमता से तीन गुना अधिक बंदी हैं. मुज़फ्फरनगर, इटावा एवं मुरादाबाद में भी यही हाल है. ़फैज़ाबाद मंडल कारागार में क्षमता से दो गुना अधिक बंदी हैं. केंद्रीय कारागारों में सबसे दयनीय हालत वाराणसी की है, जहां ढाई गुना अधिक बंदी हैं. बमुश्किल आधा दर्जन जेलों को छोड़कर शेष में क्षमता से डेढ़, दो, तीन अथवा चार गुना अधिक बंदी हैं.

प्रदेश की 60 जेलों को वित्तीय वर्ष 2006-07 में आवंटित 1,41,30,24,497 रुपये के सापेक्ष 1,39,23,97,119 रुपये, 2007-08 में 1,54,41,59,391 के सापेक्ष 1,50,22,61,133, 2008-09 में 1,90,60,64,652 के सापेक्ष 1,89,27,25,400, 2009-10 में 2,56,37,39,627 के सापेक्ष 2,53,33,23,196, 2010-11 में 2,86,56,68,959 के सापेक्ष 2,80,55,11,749 रुपये ख़र्च किए गए. जबकि महराजगंज, कन्नौज एवं बलरामपुर ज़िला जेलों को पिछले पांच वित्तीय वर्षों में शासन से एक रुपया भी नहीं मिला. नारी बंदी निकेतनों को स़िर्फ वित्तीय वर्ष 2010-11 में 1,12,87,157 रुपये प्राप्त हुए, जिनमें से मात्र 92,27,164 रुपये ख़र्च किए गए. आश्चर्य की बात यह है कि करोड़ों रुपये ख़र्च होने के बावजूद किसी भी जेल में अतिरिक्त बैरकों का निर्माण नहीं कराया गया. ऐसा करने की ज़रूरत किसी ने आख़िर क्यों नहीं महसूस की. जेल प्रशासन इस समस्या के प्रति गंभीर क्यों नहीं है, वह बंदियों की दिक्कतों की अनदेखी क्यों कर रहा है?

एक अहम बात यह है कि पत्र संख्या-30771/उद्योग-1/32/2010 दिनांक 16-12-2010 के संदर्भ में राज्यपाल के शासनादेश संख्या-489 पी/22/4-2000-48 (43)/99 दिनांक 6-4-2000 के हवाले से कहा गया है कि उन दोषसिद्ध एवं विचाराधीन बंदियों, जिनके द्वारा स्वेच्छा से कारागारों में संचालित उद्योगों, कृषि, बागवानी, पाकशाला एवं अन्य विभिन्न कार्यों में श्रम किया जाता है, को कुशल, अर्द्धकुशल और अकुशल श्रम के बदले देय मज़दूरी की दर क्रमश: 18, 13 और 10 रुपये से बढ़ाकर क्रमश: 40, 30 और 25 रुपये प्रतिदिन कर दी गई है. बढ़ी हुई दरें तात्कालिक प्रभाव से लागू होंगी, लेकिन दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि यह देय पारिश्रमिक न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम के अंतर्गत है अथवा नहीं. यहां की विभिन्न जेलों में उक्त पारिश्रमिक दिए जाने का कार्य किस हद तक किया जा रहा है, यह भी पूरी तरह संदिग्ध है.

यहां की जेलों में मानवाधिकारों की बात बेमानी साबित हो रही है. समय-समय पर जेल भरो आंदोलन के तहत जेलों में पहुंचने वाले राजनेता बंदियों के जीवन के इस कड़वे सच का स्वाद आख़िर क्यों नहीं चख सके? दरअसल, लोकतंत्र के चुनावी उत्सव में भागीदारी से बंदियों का वंचित होना ही उनका दुर्भाग्य बन गया है. अगर बंदी भी वोट दे सकते तो शायद राजनेताओं और राजनीतिक दलों को उनकी कोई फ्रिक होती, शासन-प्रशासन भी उनकी पीड़ा को समझने का प्रयास करता.जेलों की बंदी धारण क्षमता के विस्तार की ज़रूरत एक ऐसा प्रश्न है, जिसके उत्तर की प्रतीक्षा हर उस बंदी को है, जो इन जेलों में जानवरों जैसी ज़िंदगी जी रहा है. इन जेलों की बंदी धारण क्षमता तुरंत बढ़ाई जानी चाहिए, साथ ही उनके श्रम के बदले उन्हें विधिक रूप से आदेशित मज़दूरी दिलाने के लिए प्रभावी एवं कारगर उपाय किए जाने चाहिए.

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