उत्तर प्रदेश : मायावती को सत्ता विरोधी लहर का ख़ौफ़

चुनाव आचार संहिता लागू होते ही मायावती राज और 15वीं विधानसभा के कार्यकाल की मियाद ख़त्म हो गई. अब मायावती स़िर्फ केयर टेकर (सीमित अधिकार) मुख्यमंत्री के रूप में काम कर पाएंगी. इस दौरान सरकार न कोई नीतिगत फैसला ले पाएगी और न अधिकारियों-कर्मचारियों का तबादला हो सकेगा. मायावती सरकार के कार्यकाल को कोई गोल्डन पीरियड बता रहा है तो कोई इसे भ्रष्ट और तानाशाह सरकार. पांच साल तक विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चलता रहा. मायावती अपने कार्यकाल से संतुष्ट हैं, लेकिन सत्ता विरोधी रुझान उनके लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है. अगर एक-दो प्रतिशत वोट भी बसपा के पाले से खिसक गया तो दोबारा सरकार बनाने का मायावती का सपना चकनाचूर होने में देर नहीं लगेगी. उन्हें इस बात का ख़तरा सता रहा है कि कहीं मुस्लिम मतदाता उनसे दूर न हो जाए. अपने पिछले तीन कार्यकालों के मुक़ाबले इस बार वह कुछ बदली-बदली ज़रूर नज़र आईं, लेकिन उनके इरादों में कोई बदलाव या भटकाव नहीं दिखा. सोशल इंजीनियरिंग के दम पर वह सत्ता में आईं तो उन्होंने सबको गले लगाया, लेकिन दलितों के हित सर्वोपरि रहे. निकाय चुनाव के लिए विपक्ष से लेकर विभिन्न अदालतों तक ने कोशिश कर ली, लेकिन मायावती ने ठान लिया था, चुनाव नहीं हो पाए. केंद्र सरकार के साथ टकराव के चलते मायावती सरकार को दुधारी तलवार पर चलना पड़ा. उन्होंने अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति के बल पर कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी तक को सलाखों के पीछे भेजने में गुरेज नहीं किया. रीता के लखनऊ स्थित आवास पर आगजनी करने के आरोपी विधायक को उन्होंने सज़ा की जगह लालबत्ती थमा दी. पूरे कार्यकाल के दौरान विपक्ष मुख्यमंत्री एवं उनके सहयोगी मंत्रियों के ख़िला़फ भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए लगातार हमलावर रहा, वहीं सरकार ने पलटवार करते हुए विपक्षी दलों के सियासी समीकरण बिगाड़ने के लिए हरसंभव कोशिश की. सरकार की तऱफ से सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय की बात तो की गई, लेकिन बसपा जातीय राजनीति से ऊपर नहीं उठ नहीं पाई. वह दलितों को अपने पाले में बनाए रखने और मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए लगातार कोशिशें करती रही. राहुल जब भी दलितों के घर जाते, मायावती उन्हें ख़ूब खरी-खोटी सुनातीं. कांग्रेस के पास जब सेनानी कम पड़े तो उसने दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को मैदान में उतार दिया. मध्य प्रदेश से दूर किए गए दिग्गी को जनता उनके विवादित बयानों से जानने लगी. मायावती ने चार साल तक अपने हिसाब से काम किया, लेकिन अंतिम साल में वह पूरी तरह चुनावी रंग में रंग गईं. सूबे को चार हिस्सों में बांटने जैसे अति महत्वपूर्ण प्रस्ताव को आनन-फानन में पारित कराकर मायावती ने एक नई जंग छेड़ दी. मायावती के लिए यह कार्यकाल मुश्किलों भरा रहा, कई मंत्रियों को लोकायुक्त की जांच के बाद पद गंवाना पड़ा. लोकायुक्त द्वारा साल के अंत तक दो दर्जन से अधिक मंत्रियों एवं क़रीब ढाई दर्जन विधायकों के ख़िला़फ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच जारी रहने से भी सरकार की जान सांसत में रही. पांच साल विधायकों एवं मंत्रियों पर बलात्कार, हत्या और भ्रष्टाचार के आरोपों पर सफाई देते-देते बीत गए.

मायावती के खास बाबू सिंह कुशवाहा एवं अवध पाल जैसे नेताओं ने ख़ूब किरकिरी कराई. दागी सांसद धनंजय सिंह के सितारे गर्दिश में रहे. एनआरएचएम घोटाला उजागर होने के बाद इस्ती़फा देने वाले कुशवाहा को प्रदेश के कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी एवं कुछ ताक़तवर नौकरशाहों पर आरोप लगाने की वजह से बसपा से निकाल दिया गया. मायावती के परिवारीजन पहली बार विपक्ष के निशाने पर आए.

कार्यकाल के अंतिम दौर में राज्य विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं. इस दौरान अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का आंदोलन भी छाया रहा, जिसका रुख़ मायावती ने कांग्रेस की तऱफ मुड़ा रहने दिया. दो-ढाई साल से राहुल गांधी ने प्रदेश में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज कराई. वह पुलिस-किसान संघर्ष के गवाह बने ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल जा पहुंचे, जहां निषेधाज्ञा के उल्लंघन में गिरफ्तार कर लिए गए. मिशन-2012 के मद्देनज़र राहुल ने किसान जागरण यात्रा की और किसान महापंचायत के लिए समर्थन जुटाया. राहुल ने अपनी रैलियों में जनता के बीच मायावती सरकार की छवि नोट खाने वाले हाथी के रूप में बनाने की कोशिश की. विकास कार्यों के लिए ज़मीन अधिग्रहण के ख़िला़फ किसानों के आंदोलन के चलते राज्य सरकार ने अधिग्रहण संबंधी नई नीति बनाई. नोएडा में अदालत ने अनेक ज़मीनों का अधिग्रहण रद्द कर दिया, जिससे वहां निवेश करने वालों को झटका लगा. बसपा सरकार की चौथी पारी घोटालों के नाम रही. राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम), महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) और जननी सुरक्षा योजना जैसी केंद्रीय योजनाओं में कथित अनियमितताएं चर्चा का विषय रहीं. स्वास्थ्य महानिदेशक बच्ची सिंह को मौत के घाट उतार दिया गया. इसके बाद मुख्य चिकित्साधिकारी (परिवार कल्याण) डॉ. बी पी सिंह की हत्या और एनआरएचएम घोटाले के अभियुक्त उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर वाई एस सचान की जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु जैसी सनसनीखेज घटनाएं हुईं, जिन्होंने स्वास्थ्य विभाग में माफिया तत्वों की पैठ का एहसास कराया. एनआरएचएम और स्वास्थ्य विभाग में अनियमितताओं के आरोपों के चलते सरकार के दो काबीना मंत्रियों बाबू सिंह कुशवाहा और अनंत मिश्र को पद छोड़ना पड़ा. मायावती की पत्र राजनीति भी चर्चा का विषय रही. कभी बुंदेलखंड, कभी पैकेज तो कभी आरक्षण के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखे. इतने पत्र आज तक किसी मुख्यमंत्री ने नहीं लिखे. चुनाव नज़दीक आते देख उन्होंने विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण की मांग करते हुए केंद्र को कई पत्र लिखे. चुनाव से पहले विरोधियों के सियासी समीकरण बिगाड़ने के लिए सरकार ने राज्य विधान मंडल में उत्तर प्रदेश को बुंदेलखंड, पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अवध प्रदेश में बांटने संबंधी प्रस्ताव मात्र 16 मिनट में पारित करा दिया. राज्य विधान मंडल की ओर से भेजे गए प्रस्ताव पर केंद्र सरकार ने मायावती सरकार को पत्र लिखकर कुछ बुनियादी सवाल पूछे. इस पर मायावती ने उसे संविधान का उल्लंघन बताया और आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सूबे के विभाजन के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है. बसपा को अपने कई विधायकों की हरकतों की वजह से शर्मसार होना पड़ा. बसपा नेता उमाकांत यादव को जेल भेजकर मायावती ने जो वाहवाही लूटी, उसे विधायक आनंद सेन यादव, शेखर तिवारी, गुड्डू पंडित एवं पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी ने अपने कारनामों से खो दिया.

मायावती के खास बाबू सिंह कुशवाहा एवं अवध पाल जैसे नेताओं ने ख़ूब किरकिरी कराई. दागी सांसद धनंजय सिंह के सितारे गर्दिश में रहे. एनआरएचएम घोटाला उजागर होने के बाद इस्ती़फा देने वाले कुशवाहा को प्रदेश के कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी एवं कुछ ताक़तवर नौकरशाहों पर आरोप लगाने की वजह से बसपा से निकाल दिया गया. मायावती के परिवारीजन पहली बार विपक्ष के निशाने पर आए. भाजपा ने उनके भाई आनंद कुमार के ख़िला़फ बाकायदा मुहिम छेड़ते हुए उन पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अनेक फर्ज़ी कंपनियां बनाकर घोटाले के 10 हज़ार करोड़ रुपये निवेश करने का आरोप लगाया. मायावती के वफादार नौकरशाह इस बार भी चर्चा में रहे. शशांक शेखर की कैबिनेट सचिव पद पर तैनाती का विवाद अदालत तक पहुंचा, लेकिन उनका कुछ नहीं बिगड़ा. फतेह बहादुर, डीजीपी बृजलाल एवं कैबिनेट सचिव शशांक शेखर पूरे कार्यकाल के दौरान मायावती की गुडबुक में रहे. इसी प्रकार सतीश मिश्र को लेकर कई अफवाहों ने जन्म लिया. कभी कहा गया कि उन्हें मायावती ने किनारे कर दिया है तो कभी कहा गया कि वह अपने परिवार को राजनीतिक फायदा पहुंचा रहे हैं, लेकिन उनके रुतबे में कोई कमी नहीं आई. 2007 में चौथी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाली मायावती का आगाज़ जितना अच्छा था, अंजाम उतना ही ख़राब लग रहा है. मायावती के पास ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है, जिसके बल पर वह जनता से वोट की अपील करेंगी.

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