उत्तराखंड: भाजपा और कांग्रेस में बग़ावत के आसार

देवभूमि के रूप में प्रख्यात उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेताओं को इस भीषण सर्दी के मौसम में पसीने से तर-बतर कर दिया है. राज्य में आगामी 30 जनवरी को मतदान होना है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले दोनों ही पार्टियों में आंतरिक कलह सतह पर आ गई है. भाजपा और कांग्रेस के भीतर मचे घमासान का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव की घोषणा और अधिसूचना जारी होने के बाद भी कांग्रेस अपने उम्मीदवारों के नामों पर अंतिम मुहर नहीं लगा पाई. हालांकि इस मामले में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति कांग्रेस की तुलना में थोड़ी बेहतर रही. भाजपा ने नया साल शुरू होते ही अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी, लेकिन टिकट वितरण को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक खासे आहत हैं. उनकी पीड़ा की पहली वजह है, चुनाव के कुछ महीने पहले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छिन जाना और दूसरी वजह यह कि उनके क़रीब दर्जन भर चहेतों का टिकट काट दिया जाना. निशंक पार्टी के इन फैसलों से न स़िर्फ ख़ुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं, बल्कि वह पार्टी को चुनाव में सबक सिखाने का भी मूड बना चुके हैं. दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री निशंक पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे. ख़ासकर कुंभ मेले के सिलसिले में कैग की रिपोर्ट आने के बाद न स़िर्फ विपक्षी पार्टी कांग्रेस, बल्कि भाजपा के कई शीर्ष नेता भी उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे, ताकि विधानसभा चुनाव में यह मामला पार्टी का खेल न बिगाड़ दे. इसीलिए पिछले साल सितंबर महीने में निशंक की जगह भुवन चंद्र खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया गया. इन चुनाव में खंडूरी को अपने पिछले कार्यकाल की उपलब्धियों पर यक़ीन है. उल्लेखनीय है कि बतौर मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी के बेहतर शासन की वजह से वर्ष 2007 में हुए एक सर्वेक्षण में उत्तराखंड को देश के दस प्रमुख राज्यों में पहला स्थान हासिल हुआ था. इसी तरह 2008 के सर्वेक्षण में भी उत्तराखंड तीसरे स्थान पर रहा था, लेकिन मौजूदा समय में उत्तराखंड की छवि लगातार दाग़दार होती जा रही है. उत्तराखंड में बड़ी पार्टियों के बीच जारी घमासान के बीच जनता ख़ामोश है. प्रदेश की जनता भारतीय जनता पार्टी और बीजेपी के भीतर जारी उठापटक को बख़ूबी समझ रही है. ऐसे में जनता का वोट किसे मिलेगा इसका अंदाज़ा सूबे की पार्टियों को भी नहीं है.

अमूमन शांत समझे जाने वाले उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव को लेकर राज्य की दोनों बड़ी पार्टियों में जिस तरह घमासान मचा हुआ है, उससे दोनों पार्टियों के नेता बेहद परेशान हैं. एक तऱफ भाजपा नेता रमेश पोखरियाल निशंक पार्टी की राह में कांटे बिछा रहे हैं, वहीं दूसरी तऱफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी भी पार्टी को मटियामेट करने पर तुले हैं.

अमूमन शांत समझे जाने वाले उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव को लेकर राज्य की दोनों बड़ी पार्टियों में जिस तरह घमासान मचा हुआ है, उससे दोनों पार्टियों के नेता बेहद परेशान हैं. एक तऱफ भाजपा नेता रमेश पोखरियाल निशंक पार्टी की राह में कांटे बिछा रहे हैं, वहीं दूसरी तऱफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी भी पार्टी को मटियामेट करने पर तुले हैं. यही वजह थी कि कांग्रेस ने उत्तराखंड में काफी देर बाद अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया. इसकी सबसे बड़ी वजह नारायण दत्त तिवारी बताए जा रहे हैं. तिवारी प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं. उनकी नाराज़गी की सबसे बड़ी वजह पार्टी में उन्हें कम अहमियत दिया जाना बताया जा रहा है. नारायण दत्त तिवारी पिछले दिनों खुल्लमखुल्ला कह चुके हैं कि वह उन लोगों को टिकट देंगे, जो कांग्रेस और भाजपा से टिकट न मिलने की वजह से बग़ावत कर चुके हैं. उनके इस ऐलान से न स़िर्फ कांग्रेस, बल्कि भाजपा में भी खलबली मची हुई है. वैसे भाजपा की मुश्किलें यहीं ख़त्म नहीं होतीं, कभी उसके साथ रहा उत्तराखंड क्रांति दल भी इस बार उसे सबक सिखाने के मूड में है. वहीं पिछले चुनाव में आठ सीटें जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी भी इस बार पूरे दम-खम के साथ चुनावी समर में उतर चुकी है. बहुजन समाज पार्टी में भाजपा और कांग्रेस की तरह न तो टिकट के बटवारे को लेकर कोई ख़ास विरोध था और न ही प्रदेश में पार्टी नेताओं के बीच कोई आपसी विवाद.

बहरहाल, उत्तराखंड में सियासी हालात इस क़दर बिगड़ चुके हैं कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां अभी तक अपनी घरेलू मुश्किलों से बाहर नहीं निकल पाई हैं. इससे जहां भाजपा का राज्य में दूसरी बार हुकूमत करने का मंसूबा नाकाम होता दिख रहा है, वहीं सत्ता पर काबिज़ होने के कांग्रेस के ख्वाब को नारायण दत्त तिवारी पलीता लगाने पर तुल गए हैं. इन दोनों अहम सियासी पार्टियों के भीतर मची आपसी खींचतान से उत्तराखंड में चुनाव की तस्वीर पर बागियों की नज़र लग गई है. हालांकि, भाजपा और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बड़ी पार्टियों को चुनाव में ऐसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है, लिहाज़ा इससे पार्टी की सेहत पर कोई फर्क़ नहीं पड़ता. सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चाहे जो कहें, लेकिन इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि अपनी-अपनी पार्टियों से लगभग बग़ावत कर चुके रमेश पोखरियाल निशंक और नारायण दत्त तिवारी चुनावी नतीज़ों में कोई बड़ा उलट-फेर भी कर सकते हैं.

विधानसभा की मौजूदा तस्वीर

कुल सीटें 70
भाजपा 34
कांग्रेस 21
बसपा 08
निर्दलीय 03
अन्य 04

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।
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अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।