उत्तराखंड : कांग्रेस में गुटबंदी थम नहीं रही है

विधानसभा चुनाव सिर पर है, लेकिन पार्टी नेताओं को आपस में लड़ने से फुर्सत नहीं है. कांग्रेस हाईकमान की अब तक की सारी कोशिशें नाकाम सिद्ध हो रही हैं. इस गुटबाज़ी को कांग्रेस के पांच पांडवों में शुमार सांसद विजय बहुगुणा, हरीश रावत, सतपाल महाराज, नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत एवं यशपाल आर्य हवा दे रहे हैं. इन दिग्गजों में अभी से वर्चस्व की जंग शुरू हो गई है और सभी के निशाने पर है सूबे के मुख्यमंत्री की कुर्सी. इस चुनाव में जिस तरह कांग्रेसी दिग्गज शह और मात का खेल खेल रहे हैं, उसके मद्देनज़र राजनीति के जानकार मानते हैं कि इसका सीधा फायदा भाजपा और बसपा को मिलेगा. इस खेल में पार्टी के भीतर नित्य नए समीकरण जन्म ले रहे हैं. केंद्रीय राज्यमंत्री हरीश रावत के विपरीत अब यशपाल आर्य, सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत एक दिखाई पड़ रहे हैं.

यह और बात है कि 2009 में लोकसभा चुनाव में हरिद्वार संसदीय सीट को कांग्रेस की झोली में डालने के बाद हरीश रावत का प्रभाव क्षेत्र कुमाऊं के साथ-साथ हरिद्वार तक बढ़ आया है और चुनाव से पहले पार्टी आलाकमान हरीश रावत को नज़रअंदाज़ करने की स्थिति में नहीं है. चुनाव के नतीज़े जो भी आएं, लेकिन कांग्रेस के दिग्गज अभी से अपने हिसाब से पार्टी की अंदरूनी सियासी शतरंज में अपने प्यादों को मज़बूती से खड़ा करने की कोशिश में हैं. पार्टी के भीतर गुपचुप समझौते हो रहे हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव समिति की पिछली बैठक में केंद्रीय मंत्री हरीश रावत का उठकर चले जाना पार्टी में वर्चस्व की जंग का संकेत है. सूत्रों की मानें तो मौजूदा व़क्त में कांग्रेस प्रदेश की सियासत को इस तरह देख रही है, जैसे सत्ता का फल उसकी ही झोली में गिरना है, लेकिन यह मात्र उसका दिवास्वप्न सिद्ध होगा. पार्टी के सभी कद्दावर नेता उन दावेदारों को टिकट दिलाना चाहते हैं, जो चुनाव जीतने की सूरत में उनके साथ खम ठोंककर खड़े हो सकें और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनका दावा पुख्ता हो सके.

इस गुटबाज़ी को कांग्रेस के पांच पांडवों में शुमार सांसद विजय बहुगुणा, हरीश रावत, सतपाल महाराज, नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत एवं यशपाल आर्य हवा दे रहे हैं. इन दिग्गजों में अभी से वर्चस्व की जंग शुरू हो गई है और सभी के निशाने पर है सूबे के मुख्यमंत्री की कुर्सी. इस चुनाव में जिस तरह कांग्रेसी दिग्गज शह और मात का खेल खेल रहे हैं, उसके मद्देनज़र राजनीति के जानकार मानते हैं कि इसका सीधा फायदा भाजपा और बसपा को मिलेगा.

कांग्रेस हाईकमान इस राज्य में किसी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करके चुनाव मैदान में नहीं उतार रही है. कांग्रेस में जबसे अपनी सीट छोड़कर दूसरी सीट पर दावा ठोंकने वाले विधायकों को सिटिंग विधायक मानने पर बहस शुरू हुई है और दिग्गजों के पलायन के मामले ने तूल पकड़ा है, सतपाल महाराज और डॉ. हरक सिंह रावत काफी क़रीब आ गए हैं. उनके बीच छत्तीस का आंकड़ा एक और एक ग्यारह का आंकड़ा बन गया है. इस तरह पार्टी संगठन में प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य, सतपाल महाराज और नेता प्रतिपक्ष डॉ. हरक सिंह रावत की एक तिकड़ी बन गई है. वजह यह मानी जा रही है कि यशपाल आर्य, सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत एवं नेता प्रतिपक्ष डॉ. हरक सिंह रावत बाजपुर, रामनगर और डोईवाला से पार्टी टिकट के लिए जोर लगा रहे हैं और पलायन का सवाल एक तरह से उन्हीं पर चला तीर है. वैसे इस तीर ने वंश परंपरा के पोषक हरीश रावत को भी चोटिल किया है, जो अपने पुत्र आनंद रावत को हरिद्वार सीट से लड़ाना चाहते थे.

दूसरी ओर इस हमले ने तीनों दिग्गजों को एक सूत्र में बांधने का काम किया है. सूत्रों की मानें तो इन नए समीकरणों के बीच पार्टी सीधे-सीधे हरीश रावत, यशपाल आर्य और विजय बहुगुणा के खेमों में बंटी दिखाई दे रही है. यह बात और है कि पार्टी के कई कार्यक्रमों में ये सभी नेता एक मंच पर दिखाई दे रहे हैं. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस में इन दिनों वही स्थितियां हैं, जो 2009 में भाजपा में थीं. माना जाता है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा संगठन में हरीश रावत जैसी पकड़ रखने वाले भगत सिंह कोश्यारी लगभग किनारे कर दिए गए थे, जिसका असर चुनाव परिणामों पर पड़ा और भाजपा के हाथों से पांचों लोकसभा सीटें जाती रहीं. सियासी दांव-पेंच के जानकारों का कहना है कि कांग्रेस आलाकमान इस बात को बख़ूबी समझता है, इसलिए वह टिकट बंटवारे के समय हरीश रावत फैक्टर को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएगा. चुनाव से पहले ही लोग मांग करने लगे हैं कि राज्य में अगर कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में आती है तो मुख्यमंत्री किसी सांसद को न बनाकर चुनाव जीतकर आने वाले विधायकों में से ही बनाया जाए. समय से पूर्व उठी इस मांग ने तीनों सांसदों के पर कतर दिए हैं, वहीं इससे यशपाल आर्य और डॉ. हरक सिंह रावत की बांछें खिल उठी हैं.

भाजपा ने पलटी मारकर जिस तरह बी सी खंडूरी के हाथों चुनाव की कमान दे दी है, उससे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कथित दाग़ी निशंक को हटाते ही भाजपा का ग्राफ बेहतर हो रहा है. बसपा का हाथी पहले से ही हरिद्वार में अपना कौशल दिखा चुका है. भाजपा और कांग्रेस के दिग्गजों की आपसी जंग के चलते अगर बसपा का हाथी पहाड़ पर चढ़ जाए तो किसी को इस पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. दिग्गजों की आपसी कलह इस बात का संकेत दे रही है कि भविष्य में इस राज्य की सत्ता के ताले की चाबी बसपा के हाथों में होगी. बसपा के हाथी को पहाड़ पर चढ़ने से रोकने के लिए ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने संगठन की कमान दलित नेता यशपाल आर्य को सौंपी थी और इस चुनाव में भी आर्य को ऊंची जाति बाहुल्य वाले प्रदेश में अग्रिम पंक्ति में रखना एक खास संकेत है.

उत्तराखंड

कुल सीटें                           70
भाजपा                             34
कांग्रेस                              21
बसपा                              08
आईएनडी                          03
अन्य                               04

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