एक अच्छी कोशिश हमेशा प्रशंसनीय होती है, लेकिन जब ऐसी कोई कोशिश नए और संसाधनों का अभाव झेलने वाले लोग करते हैं तो वे दो-चार अच्छे शब्दों और शाबाशी के हक़दार ख़ुद-बख़ुद हो जाते हैं. त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका समसामयिक सृजन इसकी मिसाल है. इसका सितंबर-दिसंबर 2011 अंक कविता विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ है. यह पत्रिका दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी करके निकले दो युवा, महेंद्र प्रजापति एवं साक्षी अपने सुयोग्य एवं साहित्यप्रेमी शिक्षकों डॉ. प्रभात कुमार एवं डॉ. रमा के मार्गदर्शन में निकाल रहे हैं.
कई वरिष्ठ लेखकों-कवियों के सारगर्भित लेखों और युवा कवियों, खासकर नए कवियों की रचनाओं से सज़ा यह विशेषांक बताता है कि अगर मन में चाह हो तो कोई भी अभाव आपके रास्ते में बाधा नहीं बन सकता. युवा कविता: सारे दृश्य बदल रहे हैं, आज का युवा कवि और युवा काव्य दृष्टि की सूक्ष्मता: युगीन यथार्थ का प्रतिरूप आदि गंभीर आलेखों के ज़रिए वरिष्ठ साहित्यकार नीलाभ, डॉ. सत्यकेतु सांकृत एवं अशोक गुप्ता ने विशेषांक को मज़बूती प्रदान की है. इसके अलावा डॉ. सीमा शर्मा, दीविक रमेश, आर सी पांडेय एवं अभिषेक सचान के आलेख भी उल्लेखनीय हैं. इस कविता विशेषांक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें युवा, खासकर नए कवियों की रचनाओं को उनका सम्मानजनक स्थान हासिल हुआ है. छात्र एवं रंगकर्मी राजकमल की रचना अधूरापन काफी प्रभावित करती है. जीवन की भाग-दौड़, रोजी-रोटी की जद्दोजहद हर संवेदनशील शख्स को अक्सर इस दर्द से दो-चार करती है कि वह कहीं न कहीं अधूरा रहा जाता है, ख़ुद से दूर हुआ जाता है, अपने प्रियजनों से छूटा जाता है और इसी छटपटाहट में जन्म लेती हैं ये पंक्तियां:-
मैं वापस लौटना चाहता हूं/अपने घर
अपने संपूर्ण रूप में/लेकिन कुछ न कुछ
बाहर ही रह जाता है मेरा.
संस्कारों का जीवन में काफी महत्व है. बिना संस्कार जीवन निरर्थक है. संस्कार जन्मजात नहीं होते, बल्कि संस्कार रोपे जाते हैं घर में, समाज में और तब तैयार होता है एक संस्कारवान व्यक्तित्व. प्रेरणा दुबे ने अपनी कविता-अच्छी लड़की में इसी सत्य की ओर इशारा किया है:-
पैदा नहीं होती वरन्/बनाई जाती है अच्छी लड़की
बोकर अच्छे संस्कार जन्म से/उगाई जाती है अच्छी लड़की.
युवा हस्ताक्षर अभिषेक अंशु ने अपनी कविता में तंग बस्तियों यानी महानगरों में यत्र-तत्र बसी झोपड़पट्टियों, मलिन बस्तियों का दर्द बयान किया है कि ऐसी बस्तियां होकर भी नहीं होतीं. वे अस्तित्व में हैं, लेकिन व्यवस्था की नज़र में उनका कोई महत्व नहीं है:-
हर शहर के आखिरी छोर पर/होती हैं तंग बस्तियां
योजनाओं की सूची में/जिनका क्रम भी
अक्सर आखिरी ही होता है/ रेल की पटरियां
ठीक बीच से चीरती हैं/इन बस्तियों को
शहर भर की गंदगी/इन्हीं के आसपास होकर
गुजरती है/इनके नामों में
गांधी और अंबेडकर की घुसपैठ रहती है.
प्रज्ञा गुप्ता ने अपनी रचना में राखी जैसे पावन पर्व पर एक बहन द्वारा अपने भाई की प्रतीक्षा का वर्णन किया है कि उन पलों में उसकी मनोदशा क्या होती है, उसकी हर गतिविधि में किस तरह शामिल रहता है अपने भाई का इंतज़ार:-
आने वाला है त्योहार/राखी बंधन का
ससुराल में बहन/सरियाती है रोज
घर-आंगन-द्वार/तुलसी चौरा के पास
निहोरा करती है आंगन में/दिन में कई बार
दरवाजे के पार पदचाप सुन/चिंहुक उठती है.
कवि अजय मेहताब ने एक रचनाकार के शिकारीपन पर बड़ी बेबाकी से कलम चलाई है:-
सड़क पर/कलम और डायरी थामे
शिकारी सा एक रचनाकार/अक्सर ढूंढता कोई शिकार
गिद्ध सी नज़रों से/ताड़ता कई दृश्य
किसी का झगड़ना/इंतज़ार किसी पागल का.
इनके अलावा शोभा मिश्रा, विभा नायक, सरिता सलिल, नितिन सारंग, प्रियोबती निड्थौजा, सुमन सिंह, विजय कुमार सिंह, आशीष कुमार अंशु एवं बृजराज सिंह आदि रचनाकार भी अपनी कविताओं के ज़रिए काफी प्रभावित करते हैं.
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