जान देंगे, ज़मीन नहीं

बिहार राज्य विद्युत बोर्ड द्वारा बरौनी ताप विद्युत संयंत्र का विस्तारीकरण किया जाना है. राज्य मंत्रिमंडल ने 3666 करोड़ रुपये की इस योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी है. सरकार का कहना है कि फिलहाल 2250 मेगावॉट क्षमता वाले कोयला आधारित विद्युत संयंत्र की स्थापना होगी. भविष्य में 250 मेगावॉट क्षमता वाले तीसरे संयंत्र की भी स्थापना की जा सकती है. बरौनी ताप विद्युत संयंत्र बेगूसराय ज़िले में एनएच 31 के किनारे स्थित है, जिसकी स्थापना राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के प्रयासों से हुई थी. बीटीपीएस में फिलहाल दो संयंत्र स्थापित किए जाएंगे, जिन पर काम शुरू हो चुका है. विद्युत संयंत्र के पास पहले से ही बीटीपीएस की अधिग्रहीत ज़मीन है, जिसका उपयोग ऍश पॉण्ड यानी छाई निस्तारण क्षेत्र के तौर पर किया जा रहा था. सरकार पूर्व के ऍश पॉण्ड इलाक़े को समतल करके 250 मेगावॉट क्षमता के कोयला आधारित दो विद्युत उत्पादन संयंत्र स्थापित कर रही है. दर्जनों जेसीबी एवं पोकलेन मशीनें और सैकड़ों मज़दूर ज़मीन के समतलीकरण में जुट गए हैं. सरकार को कुल 565 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण करना है, जिसका उपयोग ऍश पॉण्ड के लिए किया जाना है.

किसान राजकिशोर कहते हैं कि मसले को बातचीत के माध्यम से सुलझाने के बजाय सरकार हम लोगों को डंडा दिखा रही है. किसान झुन्ना सिंह चेतावनी देते हुए कहते हैं कि सरकार इस भुलावे में न रहें कि हम डर जाएंगे. झुन्ना सिंह की मानें तो इलाक़े में पपीते की खेती पहले ही बर्बाद हो चुकी है.

बिहार राज्य विद्युत बोर्ड और बरौनी थर्मल पावर स्टेशन के अधिकारी बेगूसराय की रामदीरी पंचायत के किसानों की लगभग 270 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण करना चाहते हैं. किसान रामनंदन सिंह उर्फ बौकू सिंह कहते हैं कि विद्युत विभाग उनकी कृषि योग्य उपजाऊ भूमि लेना चाहता है, जिसके सहारे वह अपने परिवार का जीवनयापन कर रहे हैं. किसानों को इस बात पर गहरी आपत्ति है कि कम उपजाऊ ज़मीन लेने से सरकार क्यों भाग रही है और किसानों की कृषि योग्य उपजाऊ ज़मीन सरकार को इतनी पसंद क्यों आ रही है. चार पंचायतों वाले रामदीरी गांव के किसानों की रोजी-रोटी का एकमात्र सहारा यही ज़मीन है. किसानों की आपत्तियों के संबंध में बेगूसराय के ज़िलाधिकारी जितेंद्र श्रीवास्तव ने मटिहानी प्रखंड के रैली बाध में उनके साथ एक बैठक भी की. ज़िलाधिकारी श्रीवास्तव कृषि योग्य उपजाऊ ज़मीन को देखकर हतप्रभ रह गए और उन्होंने वहां पर मौजूद बीटीपीएस के जीएम अविनाश कुमार से पूछा कि आप इतनी उपजाऊ ज़मीन लेने पर क्यों आमादा हैं? किसानों ने मटिहानी अंचल के अंतर्गत थाना संख्या 424 की रैली बाध की ज़मीन देने से इंकार कर दिया. ज़िलाधिकारी ने किसानों से वैकल्पिक ज़मीन की मांग की तो किसान मनोज सिंह ने गड़हरा रेलवे यार्ड, एनएच 31 और रेलवे लाइन से पश्चिम की ज़मीन विकल्प के तौर पर सुझाई. बीटीपीएस के जीएम अविनाश कुमार ने इस विकल्प को यह कहकर खारिज कर दिया कि पश्चिम की ज़मीन रेलवे लाइन से काफी नीची है और गड़हरा यार्ड के पास स्थित ज़मीन अधिग्रहीत करने पर रेलवे से झंझट का सामना करना पड़ेगा.

मनोज सिंह एवं टुल्लू सिंह सरीखे किसानों ने कथित निचली ज़मीन को राख से भरने की सलाह दी. किसानों का तर्क था कि ऐसा करने से ज़मीन अधिग्रहण पर किसी तरह का बवाल नहीं होगा और कथित निचली ज़मीन को भरे जाने से राख का निस्तारण भी हो जाएगा. बीटीपीएस जीएम अविनाश कुमार एवं अन्य संबंधित अधिकारियों के अड़ियल रुख को देखते हुए ज़िलाधिकारी ने बीच का रास्ता निकालने की कवायद में दूसरा विकल्प मांगा. इस पर किसानों ने उनसे कहा कि जिस ज़मीन पर फिलहाल काम चल रहा है, उससे पूरब और दक्षिण दिशा की ज़मीन ली जा सकती है. ज़िलाधिकारी ने तत्काल एक संयुक्त समिति बना डाली और उसे ज़मीन के चयन के लिए अधिकृत कर दिया. मटिहानी अंचल के तत्कालीन अंचलाधिकारी वीरेंद्र मोहन की अध्यक्षता में गठित इस समिति में बरौनी थर्मल के दो अधिकारियों एवं तीन किसानों को शामिल किया गया. ज़िलाधिकारी के निर्देश पर तय हुआ कि बीटीपीएस यह व्यवस्था करेगा कि संयुक्त समिति तीनों वैकल्पिक ज़मीनों का मौक़ा मुआयना करे. किसानों की सलाह को बीटीपीएस अधिकारी नज़रअंदाज़ करते रहे, लेकिन सीओ द्वारा हस्तक्षेप किए जाने पर संयुक्त समिति ने उक्त तीनों ज़मीनों का निरीक्षण किया. रामदीरी के किसानों ने ज़िला अंतर्गत मटिहानी अंचल के मल्हीपा मौजा के थाना संख्या 503 की ज़मीन सुझाई. इस ज़मीन का रकबा 843 एकड़ है, जो कि आवश्यकता से काफी अधिक है. हैरानी इस बात की है कि सरकार किसानों द्वारा सुझाई गई ज़मीन को खारिज कर रही है और रैली बाध की ज़मीन लेने पर आमादा है. किसान मुन्ना सिंह चेतावनी भरे शब्दों में कहते हैं कि यदि सरकार हमारी जान लेना चाहती है तो हम जान दे देंगे, पर ज़मीन नहीं. बकौल मुन्ना सिंह, परिवार को भूखा मारने से अच्छा है, एकबारगी जान दे देना.

उपजाऊ भूमि अधिग्रहण मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष रामनंदन सिंह उर्फ बौकू बाबू पिछले अक्टूबर माह में ही एंजियोग्राफी कराकर दिल्ली से लौटे हैं, पर ज़मीन छीन लिए जाने के भय से आंदोलन में शामिल हैं. बौकू सिंह कहते हैं कि जब मल्हीपुर मौजा की ज़मीन किसान स्वत: देना चाह रहे हैं तो उस ज़मीन को लेने में अधिकारियों को आख़िर क्या परेशानी है. रामचंद्र सिंह कहते हैं कि रैली बाध और कसहा दियारा मरांची मौजा की ज़मीनों का किसी सूरत में अधिग्रहण नहीं होने दिया जाएगा. राम प्रवेश सिंह कहते हैं कि हज़ारों परिवारों की रोजी-रोटी इन्हीं ज़मीनों पर निर्भर है और सरकार को हमारी रोटी छीनने का हक़ नहीं है. राम प्रवेश सिंह की मानें तो सरकार किसानों की आवाज़ दबाने के लिए दमनकारी रवैया अपना रही है. मोकामा में जन सुनवाई के दौरान हुई पुलिसिया ज़्यादती का हवाला देते हुए रामचंद्र सिंह कहते हैं कि मोकामा को छावनी में तब्दील कर दिया गया था और बेगूसराय-मोकामा के बीच बारह स्थानों पर बैरियर लगाकर किसानों को वहां जाने से जबरन रोका गया. पूर्व मुखिया गणेश सिंह कहते हैं कि जब मरांची मौजा की ज़मीन ग़ैर मजरुआ थी, तब भूदान आंदोलन के दौरान उसे सरकार ने किसानों से कैसे लेकर भूमिहीनों के बीच वितरित कर दी. गणेश सिंह कहते हैं कि मुआवज़े की रकम बचाने के लिए सरकार घिनौना खेल कर रही है.

अमीन और ज़मीन मामलों के जानकार महेंद्र सिंह कहते हैं कि सरकारी दावा अनुचित है. महेंद्र सिंह की मानें तो सरकार के पास ज़मीन का कोई काग़ज़ात नहीं है और वह केवल जमाबंदी के आधार पर किसानों को उनके हक़ से वंचित कर रही है. ज़मीन बचाओ आंदोलन शुरू करने वाले राम भरोसा सिंह कहते हैं कि यह ज़मीन उन्हें अपने पुरखों से मिली थी, जिसे उन्होंने अपने वंशजों को देने के लिए बचा रखी है. राम भरोसा सिंह कहते हैं कि जान देना ज़्यादा अच्छा है, बजाय ज़मीन देने के. किसान राजकिशोर कहते हैं कि मसले को बातचीत के माध्यम से सुलझाने के बजाय सरकार हम लोगों को डंडा दिखा रही है. किसान झुन्ना सिंह चेतावनी देते हुए कहते हैं कि सरकार इस भुलावे में न रहें कि हम डर जाएंगे. झुन्ना सिंह की मानें तो इलाक़े में पपीते की खेती पहले ही बर्बाद हो चुकी है. राजकिशोर आशंका जताते हुए कहते हैं कि प्रदूषण का बढ़ा हुआ स्तर लोगों का जीना मुहाल कर देगा. युवा किसान कुमार अभिजीत कहते हैं कि सरकार रामदीरी को फारबिसगंज समझने की भूल कतई न करे. टुल्लू कहते हैं कि किसानों को उनकी ज़मीन के स्वामित्व से वंचित करने के प्रयासों के परिणाम काफी घातक होंगे. किसान आंदोलन में सक्रिय रत्नेश उर्फ टुल्लू कहते हैं कि किसानों ने ज़मीन अधिग्रहण के संबंध में सरकार से बातचीत का रास्ता खुला तो छोड़ रखा है, लेकिन वह आंख दिखाकर किसानों के साथ ज़बरदस्ती हरगिज़ नहीं कर पाएगी.

loading...