क्या हम स्वतंत्रता के लायक़ हैं?

गणतंत्र दिवस और महात्मा गांधी की पुण्यतिथि दोनों एक ही महीने में आते हैं. दोनों के बीच के निचोड़ को किस तौर देखा जाए. पाखंड और अतिश्योक्ति से मुक्ति के लिए किए गए कामों की सुरक्षा की जानी चाहिए या उन्हें केवल दस्तावेज़ों में रखा जाना चाहिए. हमने अहिंसा के नैतिक गुण को अपना लिया है, लेकिन जयपुर में हिंसा होने के डर के कारण जो हुआ, उससे तो यही लगता है कि यह सब कहने की बात है. हमारा गणतंत्र बासठ साल का हो गया है, लेकिन अभी भी हमारी स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं दिखाई देती है. 1950 के मध्य में जवाहर लाल नेहरू ने संपादकों की एक प्रेस वार्ता में कहा था, वाक्‌ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल अच्छे संपादकों को नहीं मिलनी चाहिए, बल्कि उन्हें भी मिलनी चाहिए, जिन्हें खराब संपादक कहा जाता है. यह कहना आसान है कि संपादकों को अपनी स्वतंत्रता का उपयोग ज़िम्मेदारी के साथ और राष्ट्र हित के लिए करना चाहिए. बेशक खराब संपादक ऐसा नहीं करते हैं और वे फूहड़ लेख छापते हैं. सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इसका फैसला कौन करेगा कि कौन संपादक सही है और कौन ग़लत. अगर इसका फैसला सरकार को करना है, फिर तो केवल वही संपादक रह पाएंगे, जो सरकार के चमचे हैं. जो संपादक सत्य लिखते हैं और उनका सत्य सरकार के विरुद्ध होता है, उन्हें ग़लत संपादक क़रार देकर जेल में डाल दिया जाएगा तथा कहा जाएगा कि ये संपादक अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रहे हैं.

नेहरू का यह कथन पहले की अपेक्षा आज ज़्यादा समीचीन मालूम होता है. इस बात की आज पहले से अधिक आवश्यकता है. जस्टिस काटजू ने सलमान रुश्दी को कमज़ोर लेखक कहा और यह भी कहा कि वह अपनी फूहड़ किताब-सैटेनिक वर्सेस के कारण चर्चित हो गए. जस्टिस काटजू के इस कथन से मुझे निराशा हुई. काटजू का यह कथन रुश्दी के भारत आने से रोकने से अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है. बेशक, प्रत्येक व्यक्ति साहित्यिक मानदंड तय करने के लिए स्वतंत्र है. मैं आशा करता हूं कि जस्टिस काटजू के इस कथन पर बुकर समिति ध्यान दे, उसके बाद वह तुरंत रुश्दी को मिडनाइट्‌स चिल्ड्रेन के लिए दिए गए बुकर पुरस्कार और बुकर ऑफ बुकर्स को वापस ले ले. लेकिन एक कमज़ोर लेखक को भी लिखने का अधिकार है, जबकि उनकी किताबों को पढ़ा जाता है और उन्हें एक अच्छे लेखक से ज़्यादा तवज्जो दी जाती है. लेखकों एवं पाठकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गुणवत्ता के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता है. यह कोई आईआईटी में प्रवेश के लिए होने वाली परीक्षा नहीं है, जिसमें अगर आपके 99 फीसदी नंबर नहीं आए तो आप बेकार हो गए. भारतीय संविधान के निर्माताओं ने लेखकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बिना किसी तरह की साहित्यिक परीक्षा के दी है. उन्होंने संविधान में इस बात का ज़िक्र नहीं किया है कि किसी भी साहित्यकार को पहले एक टेस्ट देना पड़ेगा, जिसमें पास होने के पश्चात ही उन्हें लिखने की स्वतंत्रता मिलेगी. बेशक जितनी स्वतंत्रता पढ़ने के लिए दी गई है, उतनी ही स्वतंत्रता न पढ़ने के लिए भी है. अगर आपको कोई रचना पसंद नहीं है तो आप इस बात के लिए स्वतंत्र हैं कि उसे न पढ़ें. कोई भी आपको उसे पढ़ने के लिए बाध्य नहीं करेगा, लेकिन सभी पाठकों को इस आधार पर कुछ पढ़ने से नहीं रोका जा सकता है, क्योंकि अल्पसंख्यक वर्ग इसे पढ़ने की अनुमति नहीं देता है.

नेहरू का यह कथन पहले की अपेक्षा आज ज़्यादा समीचीन मालूम होता है. इस बात की आज पहले से अधिक आवश्यकता है. जस्टिस काटजू ने सलमान रुश्दी को कमज़ोर लेखक कहा और यह भी कहा कि वह अपनी फूहड़ किताब-सैटेनिक वर्सेस के कारण चर्चित हो गए. जस्टिस काटजू के इस कथन से मुझे निराशा हुई. काटजू का यह कथन रुश्दी के भारत आने से रोकने से अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है.

इन बासठ सालों के दौरान भारत ने अपने नागरिकों को उनकी पहचान बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया है. भारत विविध सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने वाला देश रहा है. यहां सभी को अपनी अलग पहचान बनाए रखने का अधिकार है. यह एक अच्छी चीज़ हो सकती है, लेकिन कुछ पहचानों, विशेषकर धार्मिक पहचान को विशेषाधिकृत किया जा रहा है. यह एक विरोधाभास है, क्योंकि भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है. भारत की धर्म निरपेक्षता का मतलब है कि यहां के सभी नागरिक अपनी धार्मिक पहचान के साथ रहें और कोई किसी के धार्मिक विश्वास को ठेस न पहुंचाएं अथवा कह सकते हैं कि दूसरे धर्मों की इज़्ज़त करें, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका फैसला कौन करेगा कि कौन-सी बात किसी धर्म के लिए ज़्यादा संवेदनशील है और कौन-सी बात कम. किसे अधिक इज़्ज़त मिलनी चाहिए और किसे कम. कई महत्वपूर्ण मुद्दों को विवाद में ले आना एक बड़ा उद्योग बन गया है. आप किसी हिंदी फिल्म के गाने या किसी समुदाय द्वारा पहने जाने वाले कपड़े या फिर किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की जीवनी को उदाहरण के रूप में देख सकते हैं. जनहित याचिका का उपयोग ब्लैकमेल करने के लिए किया जाता है. भीड़ द्वारा हिंसा की धमकी देना या फिर राजनीतिक दलों द्वारा किसी मुद्दे को भड़का देना आज के समय में सरकार की अपनी ज़िम्मेदारी त्यागने का आधार बन गया है.

सरकार इस तरह अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती है. यह किसी भी देश के लिए शर्म की बात होनी चाहिए. इसका प्रभाव धार्मिक और जातीय समूहों द्वारा किए जा रहे कट्टरपंथी कार्यों के रूप में देखा जा सकता है. ये लोग सरकार की लचीली स्थिति का फायदा उठाते हैं और मनमानी करते हैं. अगर आप किसी धार्मिक या जातीय समूह में पैदा होते हैं और उसके नियम-क़ानून को अस्वीकार करना चाहते हैं तो आपको सरकार सुरक्षा नहीं दे सकती है. देखा जाए तो गांधी जी को पूरी ज़िंदगी उनके धार्मिक विश्वासों के कारण कट्टर हिंदू संगठनों की आलोचना झेलनी पड़ी. उनकी हत्या भी एक हिंदू द्वारा की गई, जिसे फांसी की सज़ा दी गई. अगर सलमान रुश्दी जयपुर आते और उनकी हत्या कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा कर दी जाती तो क्या पकड़े जाने पर उनके हत्यारों पर मुक़दमा चलाया जाता और अगर उनका अपराध साबित हो जाता तो क्या उन्हें फांसी दी जाती? क्या यह कहने की आवश्यकता है, लोग खुद ही समझदार हैं.

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