बढ़ती जनसंख्या अभिशाप नहीं

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आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है कि जनसंख्या वृद्धि हानिकारक है. इससे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है. आर्थिक दृष्टिकोण के सभी पैमाने भी इसी की पुष्टि करते हैं. अर्थशास्त्रियों की परिभाषा का निष्कर्ष यही है कि जनसंख्या वृद्धि के कारण ही खाद्यान्न की कमी होती है, क्योंकि जिस अनुपात में आबादी में इज़ा़फा होता, उस अनुपात में पैदावार नहीं हो पाती है. इसलिए जनसंख्या में अत्याधिक वृद्धि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप माना जाता है, चाहे वह विकसित राष्ट्र हो या अर्द्ध विकसित अथवा अल्प विकसित राष्ट्र.

माना जाता है कि दुनिया भर में बढ़ती ग़रीबी की जड़ जनसंख्या वृद्धि में निहित है. इसके कारण एक तऱफ जहां जन सेवाएं चरमरा रही हैं, वहीं बेरोजगारी और भूख भी भयंकर रूप दिखा रही है. खाद्यान्न संकट और यहां तक कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी बढ़ती जनसंख्या को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. भारत समेत समूचा विश्व इस पर चिंता जताता रहा है और नियंत्रण के सभी फार्मूले अपनाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. विश्व के अधिकतर अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि बढ़ती आबादी पर नियंत्रण से ही विकास संभव है. इसके पीछे मज़बूती के साथ यह तर्क दिया जाता है कि कम लोगों में सुविधा का ज़्यादा से ज़्यादा लाभ प्रदान किया जा सकता है, जो अधिक जनसंख्या में मुमकिन नहीं है.

जनसंख्या वृद्धि के इस नकारात्मक पहलू के अतिरिक्त एक पहलू और भी है. वर्तमान परिदृश्य में इसे श्राप की जगह वरदान के रूप में देखा जाना चाहिए. अर्थव्यवस्था की परिभाषा के अनुसार मानव शक्ति ही आर्थिक विकास को गति प्रदान करता है. श्रमिक अर्थात मानव शक्ति को संपत्ति का सृजक माना जाता है. श्रमिक उत्पादन का सक्रिय साधन है, जो प्रकृति प्रदत्त साधनों तथा अन्य निष्क्रिय साधनों जैसे पूंजी को सक्रिय बनाता है और विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है. मनुष्य उत्पादक के साथ-साथ उपभोक्ता भी होता है. अत: जनसंख्या दूसरे उत्पादक कार्यों के विस्तार तथा उद्योगों की बनी चीज़ों के लिए ग़ैर बाज़ार मांग का सृजन करता है. इस तरह मानव शक्ति साधनों के प्रयोग एवं उद्योगों के अलावा ग़ैर कृषि क्षेत्र में बनी वस्तुओं के लिए भी बाज़ार उपलब्ध कराता है और श्रमिकों की आपूर्ति द्वारा देश की विकास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है.

भारत विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है. यहां की तेज़ी से बढ़ती आबादी पर लगातार चिंता जताई जाती रही है. विश्व क्षेत्रफल के 2.7 प्रतिशत भारतीय भू-भाग पर विश्व की 16 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है. 2011 की जनगणना के अनुसार, यह संख्या एक अरब 22 करोड़ से भी अधिक है तथा इसमें 1.5 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही है. तथ्य बताते हैं कि आबादी के बढ़ने की यही रफ्तार रही तो आने वाले कुछ वर्षों में यह चीन को भी पीछे छोड़ देगी, परंतु यही जनसंख्या वृद्धि हमारे विकास के लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं. आंकड़ों के अनुसार, विश्व की क़रीब आधी जनसंख्या 25 वर्ष से कम आयु की है जिसका अधिकांश भाग भारत में निवास करता है, जबकि विकसित देशों में बूढ़ों की संख्या बढ़ रही है और काम करने वाले ऊर्जावान शक्ति की कमी हो रही है. यही कारण है कि भारतीय युवा देश और दुनिया के लिए उत्पादकता की नई मिसाल क़ायम कर रहे हैं और विश्व की सभी कंपनियां इन्हें श्रेष्ठतम मानव संसाधन की संज्ञा दे चुकी हैं. शिक्षा और जन स्वास्थ्य पर आधारित जनसंख्या नीति ने इस पीढ़ी की तैयारी की, जो आर्थिक तरक्क़ी की सूत्रधार साबित हो रही है. भारतीय जनगणना की पश्चिम बंगाल इकाई के निदेशक विक्रम सेन के अनुसार, देश जनसंख्या के लाभदायक चरण में पहुंच रहा है. आज भारत में लगभग आधी आबादी 20 से 30 वर्ष आयु वर्ग की है, जो ऊर्जावान है, जिनकी क्षमता का भरपूर उपयोग किया जा सकता है. यह स्थिति वर्ष 2045 तक बनी रहेगी, वहीं आश्रितों की संख्या में कमी के कारण जनसंख्या का यह चरण अर्थव्यवस्था की वृद्धि में सहायक साबित होगा. खास बात यह है कि बढ़ती जनसंख्या पर चिंता के साथ-साथ सरकार द्वारा लगातार शिक्षा के प्रचार-प्रसार ने भी भारतीय युवाओं की कौशल क्षमता को बढ़ाने में भरपूर मदद की है. इस संदर्भ में विक्रम सेन का तर्क है कि शिक्षा बेहतरीन अर्थव्यवस्था और नियंत्रित आबादी की कुंजी है.

गुणात्मक एवं प्रतिभा संपन्न युवाओं का यह वर्ग भारत को विश्व का सबसे बड़ा मानव संसाधन निर्यातक एवं रोजगार आयातक दोनों ही बना रहा है. यह जल्द ही अंतरराष्ट्रीय सेवा कारोबार के 37 प्रतिशत लक्ष्य को हासिल कर लेगा, जो अर्थव्यवस्था के मामले में भारत को चीन से आगे ले जा सकता है. यही कारण है कि आबादी के लिए भारत को कोसने वाले विश्व को आज इसकी युवा क्षमता से जलन हो रही है. विस्तृत रूप से देखा जाए तो हर सार्वजनिक मंच पर जिसको लेकर सबसे ज़्यादा चिंता जताई जा रही है, वही आबादी संकट की बजाय संकट मोचक साबित होती रही है. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडविड कैनन के अनुसार जो मनुष्य जन्म लेता है, वह अपने मुंह और पेट के साथ-साथ काम करने के लिए दो हाथ भी लाता है, जिससे अधिक श्रमशक्ति के प्रयोग द्वारा कृषि और उद्योग की उत्पत्ति बढ़ाई जा सकती है और इसे भारतीय युवा पीढ़ी सच साबित कर रही है.

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