मध्य प्रदेश : अवैध खनन का काला कारोबार

कटनी और जबलपुर देश के उस केंद्रीय भू-भाग में स्थित हैं, जिसे राष्ट्र की हृदयस्थली कहा जाता है. इस इलाक़े को आज रौंदा, नोचा, खसोटा और लूटा जा रहा है. करोड़ों-अरबों की प्राकृतिक संपदा का मुना़फा मुट्ठी भर हाथों में क़ैद हो रहा है. कंपनियां, सरकार, प्रशासन एवं दलाल इस सीमा तक सक्रिय हैं कि शासकीय नियम-क़ानून तो दूर, मानवीय मूल्यों का भी मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है. इन ज़िलों में संचालित हो रही खदानों से निकलने वाला स़फेद और रंग-बिरंगा मार्बल महानगरों में लाखों रुपये में बिककर बड़े-बड़े भवनों की शोभा तो ज़रूर बढ़ा रहा है, मगर जहां से उनका खनन हो रहा है, वहां के ज़मीनी हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. शर्मनाक स्थिति यह है कि शासन-प्रशासन इस कार्य में बराबर का सहभागी है. अकेले कटनी ज़िले में ही वित्तीय वर्ष 2011-12 के दौरान 1 करोड़ 6 लाख 70 हज़ार 9 सौ 92 रुपये की रिकॉर्ड राजस्व वसूली का श्रेय लूटकर ज़िले का खनिज विभाग अपनी पीठ ठोंकने में लगा हुआ है. यहां देश के समस्त राज्यों से श्रेष्ठ कोटि का बहुरंगी एवं कलात्मक मार्बल निकलता है, जिसकी मांग विदेशों तक है, लेकिन उसका बाज़ार जबलपुर, कटनी या मध्य प्रदेश न होकर केवल राजस्थान स्थित किशनगढ़, रणथंभौर और चित्तौड़ है, जहां यह मार्बल नहीं पाया जाता. मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश शासन कोइस उद्योग-व्यवसाय के अंतर्गत चल रही विभिन्न अनियमितताओं की सूचना दी गई थी, लेकिन किसी प्रकार की कोई पहल नहीं हुई.

राज्य की जनता मध्य प्रदेश सरकार से जानना चाहती है कि आ़खिर खनिज मैनुअल की धारा 2 (1) के अनुसार जिन्हें मार्बल खनिज पट्टा या लीज स्वीकृत है, उनके लिए एक वर्ष की अवधि के भीतर मार्बल काटने एवं तराशने की इकाइयां (गेंगसा एवं ग्राइंडर) राज्य में स्थापित करना अनिवार्य क्यों नहीं किया जा रहा है. तय समय सीमा के भीतर मार्बल काटने एवं तराशने की इकाइयां स्थापित न किए जाने पर पट्टे अथवा लीज को निरस्त क्यों नहीं किया जा रहा है, क़ानून का पालन क्यों नहीं कराया जा रहा है? खनिज मैनुअल से संबंधित क़ानून की धारा 2 (2) के अनुसार, खदान से उत्खनित अपरिष्कृत ब्लॉकों (मार्बल खंडों) का राज्य से बाहर परिवहन या निर्यात राज्य सरकार से मात्रा स्वीकृत कराने के उपरांत ही किया जा सकता है. राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत मात्रा से अधिक मार्बल ब्लॉकों का परिवहन या निर्यात राज्य के बाहर नहीं किया जा सकता, लेकिन इस नियम का पालन नहीं किया जा रहा है.

ग़ौरतलब है कि 148 स्वीकृत खनिज लीजों और अनुबंधों में से अनेक की अवधि समाप्त होने के कारण उनके नवीनीकरण हेतु आवेदन शासन के समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं. ज़ाहिर है, सरकार को उनका नवीनीकरण करते व़क्त कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर भी ध्यान देना होगा. मसलन, किन-किन लीज होल्डरों द्वारा अनुबंध निष्पादन दिनांक से एक वर्ष के भीतर खनिज मैनुअल की धारा 2 (1) के अनुसार मार्बल ब्लॉकों को काटने एवं तराशने (गेंगसा एवं ग्राइंडर) की इकाइयां स्थापित नहीं की हैं? जिन्होंने खनिज मैनुअल की धारा 2 एवं अनुबंध के प्रावधानों का उल्लंघन किया है, क्या उनकी लीजें स्वयंमेव निरस्त हो गई हैं? यदि उनकी लीजें स्वयंमेव निरस्त हो चुकी हैं, तो उनके द्वारा किया गया खनन अवैध नहीं बन जाता? यदि उनका खनन अवैध है तो क्या वे अपराधी और दंड के भागीदार नहीं बन जाते? ऐसी स्थिति में क्या उनकी लीज का नवीनीकरण किया जाना भी नियम विरुद्ध नहीं माना जाएगा?

इस कारोबार से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जबलपुर एवं कटनी ज़िलों की बड़ी-बड़ी एवं उच्च कोटि की दरार विहीन मार्बल खदान के लीज होल्डर प्राय: राज्य के बाहर और अधिकांशत: राजस्थान के हैं, जिनके द्वारा बड़ी-बड़ी ब्लाक कटिंग मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्खनन किया जा रहा है. छोटी खदानें प्राय: जबलपुर एवं कटनी के स्थानीय लोगों की हैं. इन छोटी खदानों के अपरिष्कृत मार्बल ब्लॉक प्राय: दरारयुक्त होते हैं, जिनका मूल्य बहुत कम हो जाता है. बड़ी खदानों के कुछ लीज होल्डरों द्वारा यद्यपि काटने एवं तराशने की इकाइयां स्थापित की गई हैं, लेकिन उनके द्वारा दरार विहीन ब्लॉक की स्लेब कटिंग नहीं की जाती है, अपितु छोटे मार्बल लीज होल्डरों के दरारयुक्त मार्बल ब्लॉक मिट्टी के मोल खरीद कर उनकी कटिंग अपनी इकाई में करके जबलपुर-कटनी एवं समीपवर्ती ज़िलों में बेचा जाता है और अपने दरार विहीन ब्लॉकों को राजस्थान के किशनगढ़, चित्तौड़ एवं रणथंभौर आदि के व्यापारियों को ऊंचे मूल्य पर बेचा जाता है, जिन्हें वहां राजस्थानी मार्बल, इंडो-इटालियन मार्बल, पाकिस्तानी एवं ब्राजील मार्बल आदि नामों से उससे भी ऊंची क़ीमत पर बेचा जाता है. जबलपुर, कटनी एवं मध्य प्रदेश के मार्बल को दरारयुक्त और घटिया मार्बल कहकर प्रचारित किया जाता है.

समाधान क्या है

सरकार द्वारा खनिज मैनुअल का सख्ती से पालन न कराने और मार्बल उद्योग एवं बाज़ार की स्थापना की उपेक्षा करने के कारण राज्य को क्षति उठानी पड़ी है. इसलिए ज़रूरी है कि जबलपुर, कटनी एवं राज्य के अन्य क्षेत्रों में पाई जाने वाली मार्बल संपदा और उसकी गुणवत्ता का परीक्षण कराया जाए. राज्य की मार्बल खदानों हेतु किए गए आवेदनों, लीजों की स्वीकृतियों, अनुबंधों के निष्पादन एवं शर्तों के परिपालन का प्रकरणवार अध्ययन कराया जाए. यह अध्ययन कराया जाए कि किन-किन मार्बल खदानों की लीज की अवधि किन तिथियों में समाप्त हुई और किन तिथियों में उनके नवीनीकरण हेतु आवेदन किया गया. यदि आवेदक द्वारा लीज दिनांक से एक वर्ष की अवधि के भीतर मैनुअल के अनुसार काटने एवं तराशने की इकाई स्थापित नहीं की गई है तो उसे काली सूची में डाल दिया जाए. जिन आवेदकों ने शासन द्वारा निर्धारित सीमा से ज़्यादा शिलाखंड (घनमीटर) का राज्य के बाहर परिवहन या निर्यात किया, अनुमति के विरुद्ध राज्य के बाहर के उद्योगपतियों या व्यापारियों को विक्रय किया, उन्हें काली सूची में डाल दिया जाए. जिन मार्बल खदानों द्वारा लीज अवधि समाप्त होने के बावजूद उत्खनन जारी है, उनके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए. लीज अवधि समाप्त होने और निर्धारित गहराई तक उत्खनन पूरा हो जाने की स्थिति में मार्बल कचरे को खदान में पाटना सुनिश्चित किया जाए. खनिज मैनुअल की धारा 2 (1) के अनुसार, जिन्होंने लीज स्वीकृति अथवा निष्पादित अनुबंध, जो व्यवहार योग्य हो, की एक वर्ष की अवधि के भीतर मार्बल काटने एवं तराशने की इकाई स्थापित नहीं की है, उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया जाए. कटनी एवं जबलपुर ज़िलों के मार्बल को काटने और तराशने के लिए राजस्थान के किशनगढ़, चित्तौड़ एवं रणथंभौर आदि ज़िलों में स्थापित हज़ारों इकाइयां कटनी, जबलपुर और राज्य के अन्य इलाक़ों में स्थानांतरित की जाएं. स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के अवसर बढ़ाए जाएं.

इन बिंदुओं पर जांच हो

मार्बल उद्योग से राज्य को प्रति वर्ष करोड़ों रुपये विक्रय कर मिल सकता है. शासन-प्रशासन ने खनिज मैनुअल और निष्पादित अनुबंध के प्रावधानों की नियमित समीक्षा करके उसका क्रियान्वन कराया होता तो जबलपुर एवं कटनी में मार्बल उद्योग का जाल बिछ गया होता, देश का लोकप्रिय-प्रसिद्ध मार्बल बाज़ार विकसित हो गया होता और कुशल एवं अकुशल श्रमिकों को रोज़गार मिल गया होता. दूसरी ओर शासन को विक्रय कर एवं अन्य करों के रूप में हज़ारों करोड़ रुपये का राजस्व मिल जाता. अभी भी समय है कि शासन अपने खनिज मैनुअल एवं अनुबंध के प्रावधानों का कठोरता से पालन कराए. जांच करे कि किस लीज होल्डर कंपनी ने कुल उत्खनन के विरुद्ध कितने घनमीटर मार्बल की रायल्टी चुकाई है, भुगतान की गई रायल्टी के उपरांत कितने घनमीटर की रायल्टी देय है जो कि रायल्टी चोरी की श्रेणी में आती है. किन खदानों की लीज अवधि समाप्त हो गई है, लीज अवधि समाप्त होने के बावजूद मार्बल ब्लॉकों का उत्खनन क्यों किया गया. अनियमितता और रायल्टी चोरी सिद्ध होने की दिशा में समयावधि शेष रहते अनुबंध की स्थिति क्या होगी और समयावधि पूर्ण हो जाने पर ऐसी लीज का नवीनीकरण कहां तक औचित्यपूर्ण होगा.