धर्म के नाम पर राजनीति के शिकार मुसलमान

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अगर कहीं चुनाव हों और वहां मुस्लिम मतदाताओं की तादाद अच्छी हो तो संविधान के तमाम प्रावधानों को धत्ता बताते हुए उनकी असल समस्याएं न उठाकर सुरक्षा और अन्य ऐसे ही मुद्दे उठाने को कोई बड़ी बात नहीं कहा जा सकता. इस तरह के अनुमान न लगाना हास्यास्पद है. दारुल उलूम ने कुछ समय पहले ही एक आधुनिक उदारवादी मुस्लिम विद्वान को पहले नियुक्त किया और फिर उन्हें हटा दिया. इस घटना को अभी अधिक दिन नहीं हुए थे कि उसने सलमान रुश्दी और सैटेनिक वर्सेस का मुद्दा छेड़ दिया. उसने कहा कि सलमान रुश्दी को वीज़ा न देकर भारत आने से रोक दिया जाए. तस्लीमा नसरीन को भी धमकी दी जाती है. वह बांग्लादेश की हैं और एक महिला भी हैं. यहां तक कि वामदल भी तस्लीमा नसरीन और उनकी मानवाधिकार की लड़ाई में उनके साथ नहीं है, बल्कि वे उन्हीं लोगों का साथ दे रहे हैं, जो तस्लीमा का विरोध कर रहे हैं. वह मुस्लिम हो सकती हैं, लेकिन वह हमारे देश की तरह की मुसलमान नहीं हैं. यह समझने की बात है कि पंथनिरपेक्ष समाजवादी गणतंत्र होने के बावजूद हमें इस बात का प्रमाणपत्र मुल्लाओं से लेना पड़ता है कि किसे हम सही मुसलमान मानें और किसे ग़लत.

दारुल उलूम ने कुछ समय पहले ही एक आधुनिक उदारवादी मुस्लिम विद्वान को पहले नियुक्त किया और फिर उन्हें हटा दिया. इस घटना को अभी अधिक दिन नहीं हुए थे कि उसने सलमान रुश्दी और सैटेनिक वर्सेस का मुद्दा छेड़ दिया. उसने कहा कि सलमान रुश्दी को वीज़ा न देकर भारत आने से रोक दिया जाए. तस्लीमा नसरीन को भी धमकी दी जाती है. वह बांग्लादेश की हैं और एक महिला भी हैं.

इन लोगों ने रुश्दी के ख़िला़फ मोर्चा खोल दिया, लेकिन रुश्दी इनसे कहीं ज़्यादा बुद्धिमान साबित हुए. उनका जन्म भारत में हुआ है और उनके पास पीआईओ कार्ड है. इसका मतलब है कि सलमान रुश्दी को वीजा की आवश्यकता ही नहीं है. क्या हमें भाजपा या आरएसएस से यह जानने की आवश्यकता है कि पीआईओ के तौर पर किन मुस्लिमों को अधिकार है और किन्हें नहीं. दारुल उलूम और आरएएस यह फैसला नहीं ले सकते कि सलमान रुश्दी को पीआईओ कहा जाए या नहीं. ध्यान रहे कि केवल भारतीय पासपोर्ट होना ही भारत में रहने के लिए काफी नहीं है और मुसलमानों के लिए तो और भी नहीं. यह इस बात पर निर्भर करता है कि राजनीतिक दल आपको सही समझते हैं या नहीं. एक व्यक्ति के लिए जो नियम हमारे यहां होते हैं, वही नियम दूसरे के लिए भी हों, यह ज़रूरी नहीं है. किसी को ग़लत मुसलमान होने का दंड भुगतना पड़ता है तो किसी को ग़लत भारतीय होने का. मकबूल फिदा हुसैन के अधिकारों की रक्षा धर्मनिरपेक्ष यूपीए सरकार भी नहीं कर सकी, क्योंकि बजरंग दल के कुछ लोगों ने उनके ख़िला़फ हंगामा खड़ा कर दिया था. यूपीए सरकार मकबूल फिदा हुसैन के मुद्दे पर पीछे हट गई और उन्हें देश के बाहर ही मरना पड़ा. अगर आप भारत के मुसलमान हैं तो आपको अपनी सच्चरित्रता का प्रमाणपत्र सभी हिस्सों के कट्टरपंथी संगठनों से लेना होगा.

अभी जबकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नज़दीक आ गया है, मुस्लिम वोट पाने की राजनीति चरम पर है. दारुल उलूम की तऱफ से रुश्दी पर उठाया गया सवाल अभी ख़त्म भी नहीं हुआ था कि कांग्रेस ने बाटला हाउस का मुद्दा उछाल दिया. इस पर हंगामा शुरू हो गया है. यह मुस्लिम वोट हासिल करने की एक नई राजनीति है. इस मुक़दमे पर बहस की गई और फैसला भी हो गया. न्यायपालिका ने उस पीआईएल को भी ख़ारिज कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि इस मामले की सुनवाई फिर से की जाए, जिसमें पुलिस ने षड्यंत्र के तहत अपने ही एक अधिकारी की हत्या कर दी थी, ताकि मुस्लिमों को बदनाम किया जा सके. दिग्विजय सिंह ने इस मुद्दे को फिर से उठा दिया. इसका कारण मुसलमानों का वोट लेना ही कहा जा सकता है. आख़िरकार मुस्लिमों के जीवन स्तर, शैक्षणिक स्थिति, मुस्लिम महिलाओं के अधिकार, अधिक वेतन वाले निजी क्षेत्रों में उन्हें प्रतिनिधित्व देने जैसे मुद्दों की ओर मुसलमानों के इन हमदर्दों का ध्यान क्यों नहीं जाता. मुसलमानों को आरक्षण देने की बात की जा रही है, वह भी इतने सालों के बाद! आरक्षण की बात तब की गई, जबकि उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाला है. वहां कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है और इसी कारण कांग्रेस को वहां मुसलमानों के वोटों की अत्यधिक आवश्यकता महसूस हुई. बेशक चुनाव आयोग ने मुस्लिम आरक्षण देने के सरकार के निर्णय को चुनाव परिणाम आने तक स्थगित कर दिया है, लेकिन आख़िरकार मुद्दा तो उछाल ही दिया गया. आरक्षण पर फैसला तो अब चुनाव के बाद आएगा, लेकिन इसका लाभ चुनाव के समय लेने की कोशिश की जा रही है. कांग्रेस सहित अन्य धर्मनिरपेक्ष संगठनों का मुस्लिम प्रेम महज़ दिखावा है. वे केवल इसे हथियार बनाना चाहते हैं, ताकि भाजपा को पराजित किया जा सके. मुसलमानों को इस पर ग़ौर करना चाहिए और आम भारतीय नागरिकों की तरह अपना अस्तित्व बनाना चाहिए, ताकि उनका इस्तेमाल केवल वोट बैंक के तौर पर न किया जा सके. चुनाव के समय उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति सुधारने की बात की जाती है. यहां तक की सच्चर समिति की रिपोर्ट पर चर्चा भी चुनाव के समय ही की जाती है. इस स्थिति से मुसलमानों को निकलना चाहिए, ताकि वे अपने विकास के लिए सोचने पर राजनीतिक दलों को मजबूर कर सकें. उनकी धार्मिक भावनाओं को भड़का कर कोई उनका वोट न ले, बल्कि उनका वोट उनके विकास की बात करने वालों को मिल सके.

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