एक सीमावर्ती गांव की असली तस्वीर

भारत को गांवों का देश कहा जाता है, क्योंकि यहां की अधिकतर आबादी आज भी गांव में ही निवास करती है, प्रकृति की गोद में जीवन बसर करती है और प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से जीवन के साधन जुटाती है. शहरी सुख-सुविधाओं से दूर ज़िंदगी कितनी कठिनाइयों से गुज़रती है, इसका अंदाज़ा लगाना बड़े शहरों में रहने वालों के लिए मुश्किल है. शहरों की चमक-धमक गांवों में भी पहुंच रही है, परंतु बुनियादी सुविधाओं की कमी अब भी बरक़रार है. ग्रामीणों का जीवन स्तर सुधारने के लिए बेशुमार सरकारी योजनाएं तो बना दी जाती हैं, जिन्हें विभिन्न नामों से काग़ज़ों और सरकारी वेबसाइटों पर देखा जा सकता है, परंतु उनका लाभ कितने लोगों तक पहुंचता है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक वर्ष मार्च समाप्त होते ही करोड़ों रुपये यह कहते हुए लौटा दिए जाते हैं कि खर्च नहीं हो पाए. जब कभी आप गांव का दौरा करेंगे तो यही देखने को मिलेगा कि इन सारी योजनाओं की कितनी आवश्यकता थी. यह एक कड़वी सच्चाई है कि गांव के अधिकतर लोग अशिक्षित होते हैं, उन्हें योजनाओं की कोई विशेष जानकारी नहीं होती है. स्थानीय अधिकारियों द्वारा उन्हें जो भी सिखा-पढ़ा दिया जाता है, वे आंख मूंदकर उस पर विश्वास कर लेते हैं. सरकारी अधिकारी किसी पचड़े में पड़ने से ज़्यादा इस बात की कोशिश में लगे रहते हैं कि किसी तरह मार्च आए कि वे योजनाओं का पैसा लौटा कर फुर्सत पा जाएं.

जम्मू-कश्मीर देश का सीमावर्ती राज्य है जिसकी क़रीब अस्सी प्रतिशत आबादी गांव में निवास करती है. जहां केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों द्वारा विभिन्न विकास योजनाओं के तहत अरबों रुपये खर्च करने का दावा किया जाता है और प्रत्येक वर्ष उनके बजट में वृद्धि की जाती है, परंतु सारे पैसे जाते कहां हैं, किन विकास योजनाओं में खर्च होते हैं, समझ में नहीं आता. पिछले दिनों मैंने कश्मीर के कई गांवों का दौरा किया, जहां न पीने का सा़फ पानी मुहैया है, न अस्पताल की सुविधा है और न परिवहन की. विजन-2020 मिशन के तहत देश में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों की यहां कोई झलक तक नज़र नहीं आती. कश्मीर के इन गांवों में बच्चों के लिए प्राथमिक विद्यालय तक नहीं है. ऐसा ही एक गांव है शे़ख मुहल्ला, जो कश्मीर के सीमावर्ती ज़िले कुपवाड़ा से तक़रीबन 30 किलोमीटर दूर स्थित वारसन इलाक़े का एक हिस्सा है. यूं तो समूचा वारसन बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, परंतु जो हालत शे़ख मुहल्ला गांव की है, वह आदिम युग की याद दिलाती है. क़रीब दो सौ से अधिक की आबादी वाला यह गांव 21वीं सदी में भी सड़क संपर्क से पूरी तरह कटा हुआ है. गांव में प्रवेश के लिए कोई सड़क मार्ग नहीं है, बल्कि खेतों की पगडंडियों अथवा पहाड़ों के पथरीले खतरनाक रास्तों से होकर गुज़रना पड़ता है. राज्य में ब़र्फबारी तीन-चार महीने तक जारी रहती है, ऐसे में इन रास्तों से गुज़रना किस हद तक खतरनाक हो सकता है, इसका सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

वार्ड सदस्य ग़ुलाम हसन ने बताया कि जब गांव में कोई बीमार होता है तो हम उसे चारपाई पर डालकर अस्पताल ले जाते हैं, जो क़रीब पांच-सात किलोमीटर दूर है. कभी-कभी मरीज़ की हालत रास्ते में इतनी बिगड़ जाती है कि उसकी मौत हो जाती है और हमें बाद में पता चलता है कि हमारे कंधों पर मरीज़ नहीं, लाश है. आज तक किसी सरकारी अधिकारी अथवा जनप्रतिनिधि ने इस गांव का दौरा नहीं किया, ऐसे में सरकारी योजनाओं की जानकारी हम तक पहुंचने का प्रश्न ही नहीं उठता. यह गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है. गांव में एक भी प्राथमिक चिकित्सा केंद्र न होना सरकारी दावों की वास्तविकता बयां कर रहा है. गांव वाले अपने अधिकारों से अनजान हैं. उन्हें यह नहीं मालूम कि सरकार उनके उत्थान के लिए क्या कर रही है, क्या करना चाहती है और उन्हें किस प्रकार फायदा उठाना चाहिए. ये भोले भाले ग्रामीण पंचायत से लेकर लोकसभा तक के चुनाव में इस आशा के साथ वोट डालते हैं कि शायद इस बार शासन उन पर मेहरबान हो जाए.

गांव के लोग अशिक्षित ज़रूर हैं, लेकिन वे नई पीढ़ी को शिक्षा से वंचित नहीं रखना चाहते. अब इसे गांव की नई पीढ़ी की बदक़िस्मती कहिए कि क्षेत्र में एक भी प्राथमिक विद्यालय नहीं है. प्रश्न उठता है कि शिक्षा से वंचित यहां की नई पीढ़ी को जब कोई नौकरी नहीं मिलेगी तो अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए क्या वह कोई ऐसा क़दम नहीं उठा लेगी, जो आगे चलकर नुक़सानदेह साबित होगी. आ़खिर पैसों की ज़रूरत सबको होती है. जब शहरी युवा पैसों के लिए अपराध के रास्ते पर चल पड़ते हैं तो क्या यह संभव नहीं है कि रोज़गार से वंचित इन युवाओं को पैसों का लालच देकर देश के दुश्मन अपने जाल में न फंसा लें? सरकार सीमा की रक्षा के लिए अरबों रुपये खर्च कर रही है. क्या वह सीमावर्ती लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कुछ नहीं कर सकती? सीमा तब तक सुरक्षित नहीं हो सकती, जब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वालों का समर्थन नहीं मिलता है और यह समर्थन उसी वक़्त हासिल हो सकता है, जब उन्हें भी शासन में भागीदारी का एहसास हो. यदि हम कश्मीरियों को शासन में भागीदारी का एहसास नहीं करा सके तो यह हमारे तंत्र की कमज़ोरी है. हम तन-मन-धन से यह कहने पर ज़ोर लगा देते हैं कि कश्मीर हमारा है, परंतु क्या हमने कभी यह सोचा है कि कश्मीरी भी हमारे हैं? (चरखा)