साहित्य के बहाने सियासी खेल

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ख़त्म हो गया. जब मैं फेस्टिवल के पहले दिन वहां पहुंचा तो सलमान रश्दी के जयपुर आने-न आने को लेकर खासे विवाद और भ्रम की स्थिति थी, लेकिन दोपहर बाद तक यह साफ हो गया था कि अपने उपन्यास सैटेनिक वर्सेस को लेकर विवादास्पद हुए लेखक सलमान रश्दी जयपुर के दिग्गी पैलेस नहीं आ रहे हैं, जहां जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित था, लेकिन उसी दिन आयोजकों की तऱफ से यह जानकारी दी गई कि सलमान वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए दिग्गी पैलेस में बैठे लोगों से रूबरू होंगे. बाद में मुस्लिम संगठनों के विरोध की वजह से सलमान रश्दी की वीडियो कांफ्रेंसिंग भी रद्द कर दी गई. मैं तक़रीबन तीन दिन उस समारोह में मौजूद रहा और वहां मौजूद लेखकों से लगातार मिलता और बात करता रहा. उस बातचीत से हमेशा यह ध्वनि निकलती रही कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सलमान का आना या न आना कोई मुद्दा ही नहीं है, मुद्दा है लिटरेरी डिस्कोर्स, लेकिन पांच दिनों तक चले इस साहित्य उत्सव में सलमान की छाया बरक़रार रही. सवाल यह उठता है कि क्या सलमान रश्दी का आना या न आना इतना बड़ा मुद्दा था कि उसे एक बेहतरीन साहित्य सम्मेलन पर छा जाने की इजाज़त दी जानी चाहिए थी. मेरी समझ से तो बिल्कुल ही नहीं. दरअसल, यह पूरा मुद्दा ही राजनीति से प्रेरित और संचालित था. सलमान रश्दी की आड़ में एक बार फिर मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल खेला गया. शुरुआत से ही इसमें जयपुर पुलिस और राजस्थान सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में रही.

राजस्थान सरकार ने तो यह तय कर रखा था कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सलमान रश्दी की किसी तरह की कोई सहभागिता नहीं होने देनी है. लिहाज़ा इसे रोकने के लिए भी जयपुर पुलिस की मदद से साजिश रची गई. जिस दिन वीडियो कांफ्रेंसिंग होनी थी, उस दिन मिल्ली काउंसिल के चंद कार्यकर्ता समारोह स्थल में घुस गए और विरोध करने लगे.

जैसे ही सलमान रश्दी के भारत आने की ख़बर फैली, उसकी ख़िला़फत शुरू हो गई, जैसे सलमान की किताब के साथ-साथ उन पर भी पाबंदी हो. जब कुछ मुस्लिम संगठनों की तऱफ से यह मांग उठी कि सलमान रश्दी को भारत नहीं आने दिया जाना चाहिए तो उसमें कांग्रेस और राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार को संभावना नज़र आने लगी. कांग्रेस को लगा कि इस मुद्दे को वह उत्तर प्रदेश चुनाव में भुना सकेगी और अशोक गहलोत को लगा कि गोपालगढ़ दंगे में राज्य सरकार की काहिली से ख़़फा मुसलमानों के जख्मों पर मरहम लगेगा. इसके बाद ही खालिस सियासत शुरू हो गई. पहले तो आयोजकों को बैकरूम चैनल से यह कहा गया कि रश्दी को जयपुर आने से रोका जाए, लेकिन आयोजकों के इंकार के बाद जयपुर पुलिस और राजस्थान सरकार ने ख़ु़िफया एजेंसियों की आड़ में सलमान रश्दी की भारत यात्रा में रोड़े अटकाने की कोशिश की. मुंबई पुलिस के हवाले से यह ख़बर फैलाई गई कि अंडरवर्ल्ड के शूटर सलमान को मारने के लिए जयपुर रवाना हो चुके हैं. अंडरवर्ल्ड के शूटरों का भय दिखाकर सलमान की यात्रा रद्द कराई गई. जयपुर पुलिस इस बात को लेकर निश्चिंत ही होने लगी थी कि मुंबई पुलिस ने यह कहकर कि उसने सलमान को लेकर कोई ख़ुफिया जानकारी साझा नहीं की है, उसके झूठ का पर्दाफाश कर दिया. यह सब कुछ चल रहा था, लेकिन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सार्वजनिक रूप से यह कह रहे थे कि वह सलमान रश्दी को पूरी सुरक्षा मुहैया कराने के लिए तैयार हैं. अंतत: सलमान की यात्रा रद्द हुई फिर उनकी वीडियो कांफ्रेंसिंग को लेकर हाई वोल्टेज ड्रामा शुरू हुआ.

राजस्थान सरकार ने तो यह तय कर रखा था कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सलमान रश्दी की किसी तरह की कोई सहभागिता नहीं होने देनी है. लिहाज़ा इसे रोकने के लिए भी जयपुर पुलिस की मदद से साजिश रची गई. जिस दिन वीडियो कांफ्रेंसिंग होनी थी, उस दिन मिल्ली काउंसिल के चंद कार्यकर्ता समारोह स्थल में घुस गए और विरोध करने लगे. मिल्ली काउंसिल के कार्यकर्ता सुरक्षा घेरे को धता बताकर समारोह स्थल में घुस गए, जबकि समारोह स्थल पर इतनी तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी कि केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल को भी लाइन में लगकर इंतज़ार करने के बाद वहां प्रवेश मिल पाया था. दो जगहों पर मेटल डिटेक्टर लगे थे और बग़ैर कार्ड की स्कैनिंग के प्रवेश नामुमकिन था, लेकिन मिल्ली काउंसिल के कार्यकर्ताओं को बग़ैर किसी दिक्कत के  समारोह स्थल पर प्रवेश मिल गया. पुलिस तब तक हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, जब तक कि वे फ्रंट लॉन के पास तक पहुंच कर नारेबाज़ी नहीं करने लगे. इसमें पुलिस की मिलीभगत को साफ तौर पर लक्षित किया जा सकता है. ऐसा नहीं है कि जयपुर पुलिस उन्हें रोक नहीं सकती थी, लेकिन वह रोकना नहीं चाहती थी. इसके ठीक एक दिन पहले जब ओपरा विनफ्रे का कार्यक्रम था तो जयपुर पुलिस ने अदम्य वीरता का परिचय देते हुए तक़रीबन पांच हज़ार लोगों को दिग्गी पैलेस के बाहर ही घंटों तक रोके रखा था.

इस मुद्दे को जिस तरह कांग्रेस और गहलोत सरकार ने एक अवसर के तौर पर लिया, उसी तरह सलमान रश्दी ने भी इसे प्रचार पाने के एक मौक़े के तौर पर इस्तेमाल किया. सलमान रश्दी की कोई उल्लेखनीय कृति सालों से नहीं आई है और वह लेखन की वजह से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत जीवन और महिला मित्रों की वजह से चर्चा में थे. उन्हें लगा कि इस मुद्दे का इस्तेमाल अपने आपको एक बार फिर से साहित्य के केंद्र में लाने में किया जा सकता है और यह भांपते ही उन्होंने लगातार ट्‌वीट करके इस मुद्दे को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी और वह कामयाब भी हुए. कुछ लोगों का कहना है कि आयोजकों ने फेस्टिवल के प्रचार के लिए इस विवाद को जिंदा रखा. उनके तर्कों में भी दम है. उन तर्कों के मुताबिक़, आयोजक चाहते तो पहले ही दिन इस विवाद को ख़त्म करके साहित्य पर गंभीर चिंतन करते, लेकिन उन्होंने भी लगातार सस्पेंस बनाए रखा और जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को सलमान फेस्टिवल में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अगर आयोजक चाहते तो सलमान की वीडियो कांफ्रेंसिंग उसी व़क्त आयोजित करते, जिस व़क्त सलमान रश्दी का सेशन था, लेकिन उन्होंने उसे आख़िरी दिन तक के  लिए टाल दिया. हो सकता है कि आयोजकों को इसमें सफलता नज़र आ रही हो, लेकिन अगर इस आयोजन का उद्देश्य गंभीर साहित्य चिंतन था तो उसमें सलमान रश्दी के मुद्दे ने खलल ही डाला और अगर इस लिटरेचर फेस्टिवल का उद्देश्य पैसा कमाना या कारोबार करना था तो सलमान रश्दी के मुद्दे को अंत तक जिंदा रखकर आयोजकों ने उसमें ज़बरदस्त सफलता हासिल की. तक़रीबन पांच दिनों तक हिंदी-अंग्रेजी मीडिया में सलमान रश्दी का मुद्दा छाया रहा. किसी अख़बार ने तो हेडिंग भी लगाई कि बिन आए सलमान छाए.

मैंने इस फेस्टिवल के दौरान कई देशी-विदेशी लेखकों से बात की, उनके सेशंस सुने, कई लेखकों से सलमान रश्दी के मुद्दे पर भी बात की, लेकिन सबसे अच्छी बात डेनमार्क से आए उपन्यासकार एवं लेखक ताबिश खैर ने कही. उन्होंने कहा कि कुछ साहित्यकार मज़हब को नहीं समझते और कुछ मज़हबी लोग साहित्य को नहीं समझते. सलमान रश्दी का विवाद इसी नासमझी का नतीजा है. ताबिश खैर की बात में वज़न है. दरअसल, सलमान रश्दी का भारत आना तो कोई मुद्दा था ही नहीं, क्योंकि वह सैटेनिक वर्सेस पर पाबंदी के बाद कई बार भारत आ चुके हैं, सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा ले चुके हैं, लेकिन कभी कोई विरोध नहीं हुआ. मुद्दा तो था उनके बहाने चुनाव के व़क्त मुस्लिमों की भावनाओं को भुनाना. अब इसमें कितनी कामयाबी मिलती है, यह तो चुनाव के नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन राजीव गांधी को सलमान की किताब पर पाबंदी और शाहबानो मामले में संविधान में संशोधन का बाद के चुनावों में कोई खास ़फायदा हुआ नहीं था, बल्कि वह सत्ता से बाहर हो गए थे. लगता है कि कांग्रेस ने अतीत से कोई सबक लिया नहीं है.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)

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