जयपुर में रोक, कोलकाता में निर्बासन

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी को वहां आने से रोकने और वीडियो कांफ्रेंसिंग को रुकवाने में सफलता हासिल करने के बाद कट्टरपंथियों के  हौसले बुलंद हैं. राजस्थान की कांग्रेस सरकार के घुटने टेकने के बाद अब बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भी चंद कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए. कोलकाता पुस्तक मेले में तस्लीमा नसरीन की विवादास्पद किताब निर्बासन के सातवें खंड का लोकार्पण करने की इजाज़त नहीं दी गई. तस्लीमा के कोलकाता जाने पर प्रगतिशील वामपंथी सरकार ने पाबंदी लगाई थी, जिसे क्रांतिकारी नेता ममता बनर्जी ने भी जारी रहने दिया. तस्लीमा की अनुपस्थिति में कोलकाता पुस्तक मेले में विमोचन को रोकना हैरान करने वाला है. दरअसल यह एक ऐसा वायरस है जो हमारे देश में फैलता जा रहा है और समय रहते अगर बौद्धिक समाज ने इस पर लगाम लगाने की कोशिश नहीं की तो इसके बेहद गंभीर परिणाम होंगे. प्रगतिशील लेखकों की बिरादरी हुसैन की प्रदर्शनी पर हमले को लेकर तो खूब ज़ोर-शोर से गरजती हैं, लेकिन जब तस्लीमा या फिर सलमान का मुद्दा आता है तो रस्मी तौर पर विरोध जताकर या फिर चुप रह कर पूरे मसले से कन्नी काट लेते हैं. मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि भारत में यह प्रवृत्ति अब ज़ोर पकड़ने लगी है. हुसैन की पेंटिंग के विरोध को लेकर खूब हो हल्ला मचा था, विरोध जायज़ भी था, लेकिन सलमान के जयपुर न आने पर विरोध का स्वर का़फी धीमा था. लेखकों की आड़ में जो राजनीति होती है उनका जमकर विरोध किया जाना चाहिए. जयपुर में सलमान रुश्दी को अपने ही देश में आने से रोककर राजस्थान की गहलोत सरकार ने जिस खतरनाक परंपरा की शुरुआत की, उसका परिणाम कोलकाता पुस्तक मेले में दिखा. दरअसल इस देश में पहले तो कांग्रेस के नेताओं ने संस्थाओं, परंपराओं और मान्यताओं की परवाह करना बंद कर दिया है. बाद में भारतीय जनता पार्टी और तमाम छोटे-छोटे दलों ने भी यही काम करना शुरू कर दिया. जवाहरलाल नेहरू का यह मानना था कि भारत में लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए हर तरह की संस्थाओं को मज़बूत करना होगा और नेहरू ने ताउम्र इसको अपनाया और संस्थाओं को मज़बूत किया. बाद में इंदिरा गांधी ने तो संस्थाओं और मान्यताओं की परवाह ही नहीं की और एक तानाशाह की तरह जो मन में आया वह किया, जिसकी परिणति देश में इमरजेंसी के तौर पर हुई. राजीव गांधी से भी शुरुआत में लोगों को उम्मीद थी, लेकिन वह भी अपनी मां के पदचिन्हों पर ही चले और अंतत: अपनी सुधारवादी छवि को पीछे छोड़कर कट्टरपंथियों के  आगे झुकने वाले नेता बनकर रहगए थे.

सलमान रुश्दी को जयपुर आने से रोकने और तस्लीमा की किताब के लोकार्पण को रोकना स़िर्फ अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदी का मसला नहीं है. दरअसल यह पूरा मामला जुड़ा है उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को रिझाने से. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के लिए बेहद अहम है, और अहम है उत्तर प्रदेश में मुसलमान मतदाताओं की भूमिका भी. सूबे की तक़रीबन 114 सीटों पर मुसलमान मतदाता ही उम्मीदवारों की क़िस्मत का फैसला करते हैं. लिहाज़ा कांग्रेस ने उनको रिझाने और अपने पक्ष में करने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है. कांग्रेस पार्टी मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रही है. उत्तर प्रदेश में चुनावों के ऐलान से ठीक पहले मुसलमानों के लिए साढ़े चार फीसदी आरक्षण का फैसला कैबिनेट से हो जाता है. उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर जारी किए गए अपने विजन डॉक्यूमेंट में कांग्रेस ने आगे भी आबादी के हिसाब से अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की वकालत की है. उसी दस्तावेज़ में मुस्लिम अध्यापकों की भर्ती के विशेष अभियान से लेकर अल्पसंख्यक सशक्तीकरण के लिए पार्टी की प्राथमिकता पर बल दिया गया है. दरअसल यह सब कुछ एक सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है. कांग्रेस चाहती है कि किसी भी तरह से उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के वोट उसकी झोली में आए और दशकों से खोई राजनीतिक ज़मीन हासिल की जाए. यूपीए-1 के शासन काल के  दौरान 30 नवंबर, 2006 को मुसलमानों की हालत पर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई थी, लेकिन तक़रीबन पांच साल के बाद कांग्रेस उस रिपोर्ट पर जागी. रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट की सुध लेने वाला कोई है या नहीं, इसका पता अब तक नहीं चल पाया है. बटला हाउस एनकाउंटर को जिस तरह से दिग्विजय ने हवा दी और उसे एक बार फिर से ज़िंदा करने की कोशिश की, उसके पीछे भी अल्पसंख्यकों को एकजुट करने की राजनीति है.

मुसलमानों के वोट के लिए जिस तरह से कांग्रेस काम कर रही है, वह हमें अस्सी के  दशक के राजीव गांधी के दौर की याद दिलाता है. अपनी मां की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर पर सवार होकर राजीव गांधी ने आज़ाद भारत के इतिहास में सबसे ब़डा बहुमत हासिल किया था. लेकिन चौरासी में सत्ता संभालने के बाद जिस तरह से राजीव गांधी ने फैसले लिए वे बेहद चौंकाने वाले और हैरान करने वाले थे. राजीव गांधी ने अपने शासन काल में मुसलमानों को रिझाने के लिए जो क़दम उठाए, वे बाद में पार्टी के  लिए आत्मघाती ही साबित हुए. बोफोर्स खरीद सौदे में दलाली के आरोपों और राम जन्मभूमि आंदोलन के भंवर में फंसे राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए संविधान में संशोधन कर दिया, वह एक स्वप्नदर्शी नेता का प्रतिगामी क़दम था. राजीव गांधी ने उस व़क्त के अपने प्रगतिशील मुस्लिम साथियों की राय को दरकिनार कर यह क़दम उठाया था. राजीव गांधी ने ही सबसे पहले सलमान रुश्दी की किताब पर पाबंदी लगाई थी. भारत विश्व का पहला देश था, जिसने इस किताब पर बैन लगाया था तब सैटेनिक वर्सेस को छपे चंद ही दिन हुए थे. भारत में किताब बैन होने के बाद ईरान के खुमैनी ने सलमान के खिला़फ फतवा जारी किया था. उस दौर में राजीव गांधी ने जो ग़लतियां कीं उसका खामियाज़ा उन्हें 1989 के आम चुनाव में उठाना पड़ा और प्रचंड बहुमत से सरकार में आने वाले राजीव को विपक्ष में बैठने के लिए मजबूर होना पड़ा. लेकिन कांग्रेस के अब के नेता राजीव के  उस व़क्त के फैसलों पर ध्यान देकर फैसले कर रहे हैं, लेकिन नतीजों पर उनका ध्यान नहीं है. अगर नतीजों का विश्लेषण करते तो शायद इस तरह के क़दम उठाने से परहेज़ करते. अब जो काम कांग्रेस सलमान रुश्दी के बहाने से या फिर मुसलमानों को आरक्षण देने जैसे क़दमों से कर रही है उसकी जड़ें हम राजीव गांधी के दौर में देख सकते हैं. जो काम उस व़क्त राजीव गांधी की सरकार ने किया था, वही काम राजस्थान की गहलोत सरकार ने किया. गोपालगढ़ दंगे में सूबे की पुलिस की भूमिका को लेकर मुसलमानों का आक्रोश झेल रहे अशोक गहलोत को रुश्दी में एक संभावना नज़र आई और उन्होंने उसे एक अवसर की तरह झटकते हुए इस बात के पुख्ता इंतज़ाम कर दिए कि रुश्दी किसी भी सूरत में भारत नहीं आ पाए. कांग्रेस को लग रहा है कि सलमान रुश्दी को भारत आने से रोककर वह उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का वोट पा जाएगी. ऐसा हो पाता है या नहीं, यह तो 6 मार्च को पता चलेगा, लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए जो खतरनाक खेल कांग्रेस खेल रही है, उससे न तो अल्पसंख्यकों का भला होने वाला है और न ही कांग्रेस पार्टी का.

कोलकाता में ममता बनर्जी ने भी यही खेल खेला. वह भी नहीं चाहतीं कि उनके  सूबे में मुस्लिम नाराज़ हों. लिहाज़ा तस्लीमा जिसे अपना दूसरा घर कहती हैं, वहां जाने की उनको इजाज़त नहीं है. क़ानून व्यवस्था की आड़ में उनके  कोलकाता जाने पर पाबंदी है. अपनी किताब के विमोचन पर रोक लगाने के बाद तस्लीमा ने ट्‌वीट कर सवाल खड़ा किया कि कोलकाता खुद को बौद्धिक शहर कहता है, लेकिन एक लेखक को प्रतिबंधित किया जा रहा है. मेरी अनुपस्थिति में भी किताब जारी होना क़तई म़ंजूर नहीं है. कोई पार्टी कोई संगठन कुछ नहीं कहता. आ़खिर यह कब तक होगा. तस्लीमा के ट्‌वीट में जो दर्द है, उसको समझते हुए भी लेखक बिरादरी की खामोशी हैरान करने वाली है.

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