मध्य प्रदेश : नक्सल प्रभावित क्षेत्र घोषित होने का फ़ायदा किसे

राज्य में पूर्व के तीन ज़िलों मंडला, डिंडोरी एवं बालाघाट के मुक़ाबले 5 अन्य नए ज़िलों सीधी, सिंगरौली, उमरिया, शहडोल एवं अनूपपुर में नक्सलियों का प्रभाव बढ़ गया है. राज्य सरकार की लगातार कोशिशों के बाद प्रदेश के इन सभी आठ ज़िलों को नक्सल प्रभावित घोषित कराने में कामयाबी मिल गई और ऐसे प्रत्येक ज़िले के लिए 25 करोड़ रुपये की सालाना केंद्रीय सहायता हाल में शुरू भी हो गई है. उक्त राशि व्यय किए जाने में कहीं कोई अनियमितता अथवा भ्रष्टाचार नहीं है. अब यह केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह इन इलाक़ों के लिए विशेष संसाधन एवं सहायता राशि उपलब्ध कराने में किसी तरह की कोई कोताही न बरते. इस संदर्भ में इससे ज़्यादा चर्चा करना मुझे ज़रूरी नहीं लगता. राज्य के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता पिछले दिनों कटनी ज़िला मुख्यालय में आयोजित प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में इन नए ज़िलों में नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव की परस्पर विरोधाभाषी स्थितियों के संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब में कुछ इसी अंदाज़ में पेश आए.

कटनी में नौ और अनूपपुर, शहडोल एवं ब्यौहारी में 19 ताप विद्युत केंद्र बनाने के लिए 28 बड़ी कंपनियां आ रही हैं. प्रति कंपनी लगभग तीन हज़ार एकड़ के हिसाब से 84 हज़ार एकड़ ज़मीन के अलावा बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता है. इन क्षेत्रों में अभी घोषित तौर पर केवल पांच कंपनियां काम कर रही हैं, शेष आने की तैयारी में हैं, जिसकी प्रक्रिया चल रही है. राज्य मंत्रि परिषद द्वारा मेसर्स वेलस्पन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड की अनूपपुर ताप विद्युत परियोजना के लिए किए गए अधिग्रहण के संबंध में विस्थापितों-प्रभावितों को प्रतिकर के अलावा पुनर्वास नीति के अंतर्गत विशेष सुविधाएं एवं सहायता भी देने का निर्णय लिया गया है.

प्रदेश सरकार की ओर से नक्सलवाद का हौव्वा खड़ा करके यहां के ग्रामीण इलाक़ों में प्रचुर मात्रा में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल, जंगल, ज़मीन एवं बहुमूल्य खनिज संपदा आदि के दोहन पर आधारित विभिन्न संचालित और प्रस्तावित छोटे-बड़े उद्योगों के साथ ही बड़ी संख्या में सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को शासन-प्रशासन विशेषकर पुलिस द्वारा अनुचित लाभ अर्जित कराने के लिए खुलकर मदद की जा रही है. कटनी ज़िले के एक आदिवासी बाहुल्य एवं आरक्षित विधानसभा क्षेत्र बड़वारा के भाजपा विधायक मोती कश्यप के कई परिवारीजन इस क्षेत्र में अवैध उत्खनन जैसे कामों में संलिप्त हैं. उमाशंकर गुप्ता ही नहीं, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह एवं उनकी सरकार की ग़लत बयानियों को उजागर करता एक और मामला पिछले दिनों उस समय सामने आया, जब अनूपपुर ज़िले में निजी पावर कंपनियों की स्थापना के लिए 27 हज़ार एकड़ कृषि भूमि के अधिग्रहण के मामले में हाईकोर्ट ने केंद्र एवं प्रदेश सरकार सहित सात लोगों से जवाब-तलब किया. न्यायमूर्ति के के त्रिवेदी की एकल पीठ ने पीड़ित किसानों की याचिकाओं पर विपक्षियों को 6 सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है. उक्त याचिकाएं अनूपपुर ज़िले की कोतमा तहसील के ग्राम उमरदा और मझटलिया के पीड़ित किसान रामनिवास कंवर, बुधरिया अगरिया, संतोष कुमार, शंकर यादव, सुंदर केवट, मोहन साहू, रामपति साहू, संतोष साहू, जयकिरन साहू, मीराबाई, नंददास केवट, श्यामलाल पनिका, रामसूरत उर्फ पुसुवा एवं बुधवा यादव की ओर से दायर की गई हैं. इन किसानों का कहना है कि मुंबई की वेलस्पन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य कंपनियों की स्थापना के लिए अनूपपुर ज़िले में तक़रीबन 27 हज़ार एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है. इनका आरोप है कि अनूपपुर के ज़िलाधिकारी द्वारा लोकहित एवं लोक प्रयोजन के नाम पर भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई तथ्यों को छिपाकर की जा रही है, जो अवैधानिक है. आरोप है कि शासन के अमले ने धारा 4 एवं 6 के तहत अधिसूचनाएं तो जारी कीं, लेकिन धारा 5-ए के तहत पीड़ित पक्षों से आपत्तियां मांगने के प्रावधानों की पूरी तरह उपेक्षा की जा रही है. सुनवाई के बाद अदालत ने केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव-राजस्व, प्रमुख सचिव-पंचायत विभाग, शहडोल के संभागायुक्त, ज़िलाधिकारी अनूपपुर, भू-अर्जन अधिकारी और वेलस्पन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए हैं.

नक्सल प्रभावित घोषित अनूपपुर में वेलस्पन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड के साथ ही मोजर बियर एवं न्यूजोन नामक कंपनियों के पावर प्रोजेक्टों के लिए भी बड़े पैमाने पर ज़मीन अधिग्रहण का काम आश्चर्यजनक तेजी से निपटाया गया है. जबकि प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की ओर से इन उद्योगों की स्थापना के संदर्भ में प्रारंभिक जन सुनवाइयों के दौर से ही गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई जाती रही हैं. कटनी ज़िले के बड़वारा अंचल के अंतर्गत ग्राम गुढ़ाकला में सांघी कंपनी द्वारा स्थापित उद्योग, जिसे धान की भूसी के माध्यम से संचालित किया जाना था, वहां पिछले दिनों इलाकाई जंगलों से बड़ी मात्रा में अवैध रूप से काटी गई लकड़ी से भरे कई ट्रैक्टर पकड़े गए. नक्सल प्रभावित सिंगरौली, सीधी, उमरिया एवं शहडोल के साथ-साथ सीमावर्ती कटनी जैसे ज़िलों में भी यही स्थिति है. मेसर्स वेलस्पन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड ने अनूपपुर में आदिवासियों की 2700 एकड़ ज़मीन अधिग्रहीत कर ली थी. इन आदिवासियों को रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आवास जैसी सुविधाएं भी नहीं मिलीं. हाल में राज्य सरकार द्वारा यह घोषणा की गई है कि पुनर्वास अनुदान, प्रति एकड़ ढाई लाख रुपये मुआवज़ा एवं पांच हज़ार रुपये परिवहन व्यय दिए जाने के साथ-साथ सामान की ढुलाई मुफ्त में की जाएगी. इसके अलावा नियमित रोज़गार, स्व-रोज़गार, रजिस्ट्री में छूट और बच्चों के लिए छात्रवृत्तियों की भी व्यवस्था की जाएगी.

कटनी में नौ और अनूपपुर, शहडोल एवं ब्यौहारी में 19 ताप विद्युत केंद्र बनाने के लिए 28 बड़ी कंपनियां आ रही हैं. प्रति कंपनी लगभग तीन हज़ार एकड़ के हिसाब से 84 हज़ार एकड़ ज़मीन के अलावा बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता है. इन क्षेत्रों में अभी घोषित तौर पर केवल पांच कंपनियां काम कर रही हैं, शेष आने की तैयारी में हैं, जिसकी प्रक्रिया चल रही है. राज्य मंत्रि परिषद द्वारा मेसर्स वेलस्पन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड की अनूपपुर ताप विद्युत परियोजना के लिए किए गए अधिग्रहण के संबंध में विस्थापितों-प्रभावितों को प्रतिकर के अलावा पुनर्वास नीति के अंतर्गत विशेष सुविधाएं एवं सहायता भी देने का निर्णय लिया गया है. अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के भूमि स्वामी को 22 हज़ार रुपये का एकमुश्त पुनर्वास अनुदान दिया जाएगा. छोटे एवं सीमांत किसानों को एकमुश्त 16 हज़ार रुपये एवं अन्य वर्ग के किसानों को 11 हज़ार रुपये दिए जाएंगे. प्रत्येक किसान को उसकी अधिग्रहीत भूमि के लिए प्रति एकड़ के मान से उतनी अतिरिक्त राशि विशेष पुनर्वास अनुदान के रूप में दी जाएगी कि उसे देय प्रतिकर मिलाकर उक्त भूमि के बदले 2 लाख 50 हज़ार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से प्राप्त हो जाएं. भूमिहीन विस्थापित परिवार को एकमुश्त 22 हज़ार रुपये की राशि विशेष आर्थिक अनुदान के रूप में दी जाएगी. अन्य श्रेणी के ऐसे विस्थापित परिवारों, जो शासकीय भूमि पर विगत तीन वर्षों या उससे अधिक समय से अतिक्रमक के रूप में कृषि कार्य करते रहे हैं, को एक लाख 10 हज़ार रुपये प्रति एकड़ के मान से पुनर्वास अनुदान देय होगा. एक एकड़ से कम के ऐसे किसानों को न्यूनतम एक लाख रुपये दिए जाएंगे. इसके अलावा विस्थापन के परिणामस्वरूप घरेलू सामान अन्यत्र ले जाने के लिए कंपनी द्वारा 25 किलोमीटर की दूरी तक नि:शुल्क परिवहन सुविधा दी जाएगी. विस्थापितों को 5 हज़ार रुपये प्रति परिवार के हिसाब से परिवहन व्यय भी दिया जाएगा. परियोजना के लिए अधिग्रहीत किए जाने वाले आवासीय भवनों के विस्थापितों को भूखंड एवं आवास निर्माण के लिए एक लाख रुपये का एकमुश्त अनुदान देय होगा. विस्थापितों के लिए नियमित रोज़गार, स्व-रोज़गार प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सेवाओं और मुद्रांक एवं पंजीयन शुल्क में छूट संबंधी प्रावधान भी किए गए हैं. कंपनी की ओर से विस्थापित परिवारों के बालक-बालिकाओं को छात्रवृत्तियां भी दी जाएंगी.

यहां यह बताना आवश्यक है कि ये सारे लाभ उन लोगों को दिए जाएंगे, जो अपनी ज़मीनों का जबरिया अधिग्रहण स्वीकार कर लेंगे. उन लोगों का क्या होगा, जो ऐसे तमाम प्रलोभनों के झांसे में न आकर किसी भी क़ीमत पर, यहां तक कि जान देकर भी अपनी ज़मीनें इन कंपनियों को देने के लिए तैयार नहीं होंगे, उनके साथ राज्य सरकार क्या बर्ताव करने जा रही है, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है. ऐसे मामलों से संबंधित ज़्यादातर ज़िले वही हैं, जिन्हें राज्य सरकार ने केंद्र पर लगातार दबाव बनाकर नक्सल प्रभावित घोषित कराया है. इस स्थिति में संबंधित क्षेत्रों के किसानों, आम नागरिकों एवं उनके समर्थन में खड़े हो रहे जन संगठनों के किसी भी आंदोलन को सरकार नक्सलवाद का प्रभाव बताकर कुचलने के लिए तत्पर नहीं होगी, यह भला कैसे माना जा सकता है. ज़ाहिर है, मध्य प्रदेश में आने वाले दिनों के दौरान नक्सलवाद का सरकार द्वारा बढ़ता हुआ बताया जा रहा कथित प्रभाव भी तथाकथित विकास के नाम पर सरकारी लूट के लिए ही इस्तेमाल किया जाएगा.

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