बेहतर चुनाव के लिए बेहतरीन प्रयास


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जिला निर्वाचन अधिकारी के तौर पर पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में चुनाव कराना संतोषप्रद रहा. अभी तक हुए चुनाव के इतिहास में इस ज़िले में हुआ 2011 का चुनाव सबसे शांतिपूर्ण रहा. राजनीतिक दल, मीडिया तथा आम लोगों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की. इस चुनाव से जुड़े सभी लोगों ने अपनी तऱफ से भरपूर समर्थन और सहयोग दिया. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के मानविकी विषय के छात्र होने के नाते तथा जो भी लोग पंचायत, लोकसभा, विधानसभा आदि चुनावों से संबंधित रहे हैं, उन्हें यह पता है कि चुनाव की सफलता के लिए मतदाताओं की जागरूकता तथा पूरी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता बहुत ही ज़रूरी है. कई चरणों में हुए चुनाव में हमारी प्राथमिकता मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचाना रही. इस काम के लिए हम लोगों ने एक महत्वपूर्ण योजना बनाई तथा एक सही रणनीति के तहत इस पर काम किया. बीरभूम ज़िले में इस्तेमाल की गई पद्धतियों की भारतीय चुनाव आयोग तथा मुख्य चुनाव अधिकारी ने बैठकों के दौरान तारी़फ की तथा अन्य ज़िलों में हुए चुनाव में इन पद्धतियों का अनुसरण भी किया गया. हम लोगों ने काम शुरू करने से पहले आपस में बैठकें कीं तथा इस बात का ध्यान रखा कि जो लोग इस चुनाव प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं, उनकी योग्यता, अनुभव तथा रूचि के अनुसार ही उन्हें काम दिया जाए, ताकि काम करने में उनकी रूचि बनी रहे और ईमानदारी एवं लगन से वे अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर सकें. यह इसलिए भी आवश्यक था, क्योंकि हमें अपनी तैयारियों के प्रति आश्वस्त होना था. बैठकों के दौरान न केवल रिटर्निंग ऑफिसर, बीडीओ, एसडीओ, डिप्टी मजिट्रेट तथा एडीएम जैसे उच्च अधिकारियों से बात की गई, बल्कि मतदान केंद्र अधिकारी तथा अन्य सी और डी ग्रेड के अधिकारियों जिनका योगदान मतदान के समय महत्वपूर्ण होता है, के साथ भी सभी मुद्दों पर बात की गई. ग़ौरतलब है कि इन अधिकारियों के सहयोग के बिना शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीक़े से मतदान कराना क़तई संभव नहीं है. इसलिए उनकी बातों पर ग़ौर करना अत्यावश्यक था. इन बैठकों ने चुनाव से जुड़े सभी कर्मचारियों की भूमिका तय करने में का़फी सहयोग प्रदान किया. इसके बाद सभी कर्मचारियों को सावधानीपूर्वक प्रशिक्षण देने की बारी थी. इसके लिए एक मानदंड तय किया गया तथा चुनाव से जुड़े सभी कर्मचारियों को कब और कैसे प्रशिक्षण दिया जाएगा, इसके लिए समय तालिका बनाई गई. इन अधिकारियों का प्रशिक्षण, शिक्षा और जागरूकता भी आवश्यक थी, क्योंकि मतदाताओं की जागरूकता और मतदान में उनकी भागीदारी उन्हीं अधिकारियों की योग्यता पर निर्भर करती है. इसके लिए कई उपाय किए गए. वीडियो कांफे्रंसिंग, पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन तथा जानकार प्रशिक्षकों द्वारा मतदान का प्रदर्शन किया गया. मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए एक और बात ज़रूरी है. इसके लिए मतदाताओं की सूची स्पष्ट और सही होनी चाहिए. हम लोगों ने इस पर विशेष ध्यान दिया, जिसके कारण मतदाता पहचान पत्र का प्रतिशत 99 हो गया, जो मेरे इस ज़िले में आने के समय 94 प्रतिशत था. इसे मतदाताओं की जागरूकता के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है. इसके बाद हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की थी. इसके लिए सभी बड़े अधिकारियों ने कई दौरे किए. ग्रेड ए के अधिकारियों ने लगभग 900 दौरे किए. इन दौरों के फोटोग्राफ्स लिए गए तथा उनकी वीडियो फिल्म भी तैयार की गई. इस तरह के दौरे से लोगों के साथ मेल मिलाप हुआ तथा सुरक्षा संबंधी व्यवस्था करने में का़फी सहायता मिली. इसके साथ-साथ राजनीतिक दलों के साथ भी बैठकें की गईं. इसके कारण नक्सलवाद प्रभावित इस ज़िले के चुनाव के संबंध में कुछ विशेष जानकारी प्राप्त हुई, जिससे सुरक्षा प्रबंध करने में आसानी हो गई. पुलिस की भूमिका भी महत्पूर्ण होती है, इसलिए इसका सहयोग भी लिया गया जिससे लोगों का आत्मविश्वास ब़ढा. इसके अलावा मतदाताओं के विश्वास को बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी था कि क़ानून व्यवस्था को ठीक किया जाए तथा लोगों को यह लगे कि प्रशासन उनकी मदद के लिए तत्पर है. इसके लिए क़ानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया गया. इसके लिए चुनाव को ग़लत तरीक़े से प्रभावित करने वाले 11000 लोगों पर म़ुकदमा चलाया गया, जिनकी संख्या 2006 के चुनाव में 1408 तथा 2009 के संसदीय चुनाव के समय 1818 थी. इसके अलावा 2788 लाइसेंसधारी हथियार जमा किए गए, जो 2006 के विधानसभा चुनाव में मात्र 52 और 2009 के संसदीय चुनाव में 966 थे. इसके साथ ही 7205 ग़ैर ज़मानती वारंट निकाले गए, जो 2006 में 1594 तथा 2009 में 1641 थे. लगभग 42000 लीटर अवैध शराब ज़ब्त की गई, जो पिछली बार के चुनाव में हुई ज़ब्ती की तुलना में अधिक थी. इस तरह के कार्यों से शांतिपूर्ण तरीक़े से चुनाव कराने में का़फी सहयोग मिला.

मतदान केंद्रों की व्यवस्था भी इस तरह से की गई, ताकि लोगों को मतदान करने के लिए ज़्यादा दूर तक नहीं जाना पड़े जैसा कि इससे पहले होने वाले चुनाव के समय करना पड़ता था. हम लोग लगातार मीडिया के संपर्क में रहे, ताकि सही समय पर सही तरीक़े से सही जानकारी लोगों को मिल सके. यातायात व्यवस्था को भी दुरुस्त किया गया तथा मतदान केंद्रों पर प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था भी की गई. इस प्रकार के प्रयासों का ही परिणाम था कि बंगाल के इस नक्सल प्रभावित ज़िले में शांतिपूर्ण तरीक़े से मतदान हुआ.

इस ज़िले में चुनाव के दौरान किए जाने वाले सुरक्षा प्रबंध में नक्सलवाद को ध्यान में रखना बहुत ज़रूरी था, क्योंकि यह ज़िला नक्सलवाद से बुरी तरह से प्रभावित है. इसके लिए राजनीतिक दलों, मीडिया के लोगों, चुनाव में भाग लेने वाले प्रत्याशियों तथा ज़िले के आम लोगों से बात की गई और उनके सुझावों पर अमल करने का प्रयास किया गया. इसके साथ-साथ पड़ोसी ज़िले के अधिकारियों से भी मुलाक़ात की गई तथा खुफिया विभाग से मिली जानकारी का भी उपयोग चुनाव को शांतिपूर्ण ढंग से कराने के लिए किया गया. इसके अलावा पड़ोसी राज्य झारखंड से भी सहायता ली गई, क्योंकि नक्सलवादियों का संपर्क इस राज्य से भी है. प्रतिदिन की खुफिया रिपोर्ट पर नज़र रखी गई. झारखंड से सटे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया तथा सीमा पर नाकेबंदी की गई. इसका बहुत फायदा हुआ और का़फी हथियार, विस्फोटक सामग्री तथा रुपये पकड़े गए, जिनका इस्तेमाल चुनाव को ग़लत तरीक़े से प्रभावित करने के लिए किया जा सकता था. झारखंड सरकार से मिले सहयोग का लाभ भी इस चुनाव को संपन्न कराने में हुआ. इसका लाभ यह हुआ कि पहले नक्सलवादी पोस्टर लगाकर या चिट्ठियों के माध्यम से धमकी देकर मतदाताओं को मतदान से रोकते थे, लेकिन इस बार इस तरह की धमकियों का प्रभाव नहीं पड़ा.

इस क्षेत्र में चुनाव को प्रभावित करने में यहां होने वाली पोश्त की खेती की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसकी अवैध खेती से हुई आमदनी का इस्तेमाल चुनाव में किया जाता रहा है. नक्सलवादी भी इसकी अवैध खेती में लगे हुए हैं. उन्हें भी इससे धन मिलता है. इस बात की जानकारी होने के बाद हम लोगों ने इसकी अवैध खेती पर रोक लगाने के लिए प्रयास करना शुरू किया. इसके लिए पोश्त की खेती होने से तीन महीने पहले से हम लोगों ने इस पर ध्यान देना प्रारंभ कर दिया. सबसे पहले किसानों से मिले तथा उन्हें इसकी अवैध खेती के सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों से अवगत कराया. किसानों को जागरूक किया. इसके साथ-साथ नारकोटिक्स विभाग के अधिकारियों, मजिस्ट्रेट, आबकारी अधिकारियों, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों तथा एनजीओ के लोगों के साथ बैठकें कीं और उन्हें पोश्त की अवैध खेती से होने वाली परेशानियों के बारे में बताया. साथ ही इसकी अवैध खेती से यहां के किसानों पर पड़ने वाले प्रभाव की भी जानकारी दी गई. इस तरह के प्रयासों से पोश्त कीअवैध खेती को रोका जा सका तथा चुनाव में इससे प्राप्त धन के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई जा सकी. इसका लाभ चुनाव कराने में मिला. इसके साथ जो काम चुनाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, वह है मतदाताओं को जागरूक करना. इसके लिए हम लोगों ने ऐसी भाषा में सामग्री तैयार करवाई, जो लोगों को समझ में आ सके. इसके साथ-साथ लोगों तक इसे पहुंचाया गया तथा ईवीएम मशीन से मतदान करने में आने वाली परेशानियों से भी लोगों को परिचित कराया. ईवीएम मशीन से मतदान करने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए मतदान की वीडियो फिल्म भी तैयार करवाई गई तथा इसे लोगों को दिखाया गया. महिलाओं को मतदान के लिए प्रोत्साहित करने के लिए उनके लिए विशेष सहायता केंद्र की व्यवस्था की गई. इन व्यवस्थाओं के अलावा मतदाता स्लिप का प्रभावी तरीक़े से वितरण किया गया. इसके लिए राजनीतिक दलों का भी सहयोग लिया गया. इन पर्चियों को बांटने के बाद मतदाताओं को यह भी बताया गया कि अगर किसी कारण से उनके पास स्लिप नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह मतदान नहीं कर पाएगा. उन्हें बताया गया कि अगर आपके पास स्लिप नहीं है, लेकिन आपके पास कोई परिचय पत्र है जिसे चुनाव आयोग ने प्रमाण माना है तो आप मतदान कर सकते हैं. ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि कुछ लोगों ने यह अ़फवाह उड़ा दी थी कि जिसके पास मतदाता स्लिप नहीं है, वह मतदान नहीं कर पाएगा, चाहे उसके पास मतदाता पहचान पत्र ही क्यों न हो. इसके अलावा स्थानीय गानों तथा नुक्कड़ नाटक आदि का उपयोग मतदाताओं को जागरूक करने के लिए किया गया. मतदाताओं को जागरूक करने के लिए कई कैंप लगाए गए तथा प्रश्न प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया गया. मोबाइल वैन का उपयोग भी किया गया तथा मतदाताओं की समस्याओं को सुनने तथा उनके समाधान के लिए हेल्पलाइन की भी व्यवस्था की गई. शिक्षित मतदाताओं के लिए एक ब्लॉग भी बनाया गया, जिसमें चुनाव से संबंधित जानकारी दी गई थी. मतदान केंद्रों की व्यवस्था भी इस तरह से की गई, ताकि लोगों को मतदान करने के लिए ज़्यादा दूर तक नहीं जाना पड़े जैसा कि इससे पहले होने वाले चुनाव के समय करना पड़ता था. हम लोग लगातार मीडिया के संपर्क में रहे, ताकि सही समय पर सही तरीक़े से सही जानकारी लोगों को मिल सके. यातायात व्यवस्था को भी दुरुस्त किया गया तथा मतदान केंद्रों पर प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था भी की गई. इस प्रकार के प्रयासों का ही परिणाम था कि बंगाल के इस नक्सल प्रभावित ज़िले में शांतिपूर्ण तरीक़े से मतदान हुआ. इस ज़िले में मतदान 87 फीसदी रहा, जो 2009 के संसदीय चुनाव में 82.7 फीसदी था. न केवल चुनाव शांतिपूर्ण रहा, बल्कि चुनाव के बाद जीतने वाले नेता ने भी शांतिपूर्ण तरीक़े से ही अपनी खुशी ज़ाहिर की. इसके लिए भी हम लोगों ने वहां के लोगों से कहा था कि अपने नेता की जीत की खुशी इस तरह न मनाएं कि दूसरे लोगों को इससे तकली़फ हो. इसका फायदा भी देखने को मिला. एक तऱफ जहां दूसरे ज़िलों में चुनाव जीतने के बाद थोड़ी गड़बड़ी देखने को मिली, लेकिन इस ज़िले में किसी प्रकार की कोई गड़बड़ी नहीं देखी गई. इस ज़िले में जिस प्रकार से शांतिपूर्ण तरीक़े से चुनाव संपन्न हुआ, उसके लिए न केवल अधिकारियों, बल्कि वहां के लोगों ने जो सहयोग दिया उसे भी ध्यान में रखना ज़रूरी है. आजकल चुनाव में जिस तरीक़े की धांधली हो रही है उसके लिए यह चुनाव एक उदाहरण पेश कर सकता है. अगर सही प्रयास हो तो पूरे देश का चुनाव इसी प्रकार शांतिपूर्ण तरीक़े से करवाया जा सकता है.

(लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं. आलेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं और उनका सरकार से कोई संबंध नहीं है.)


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