भाजपा की हार शर्मनाक है

फुटबॉल के खेल में कभी-कभी ऐसे मौके आते हैं, जब किसी खिलाड़ी के पास बॉल होती है और सामने न तो कोई विरोधी होता है और न ही गोलपोस्ट की रक्षा करने वाला गोलकीपर. उस खिलाड़ी के सामने खाली गोलपोस्ट होता है और सामने बॉल होती है. इसके बावजूद अगर वह खिलाड़ी बॉल को गोलपोस्ट के बाहर मार दे तो ऐसे खिलाड़ी को क्या कहेंगे. भारतीय जनता पार्टी की स्थिति ऐसे खिलाड़ी से भी बदतर है. क्योंकि भारतीय जनता पार्टी गोलपोस्ट के बाहर बॉल मारने में एक्सपर्ट हो गई है. उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलित हैं. मज़दूरों की हालत खराब है. कामगारों के व्यवसाय बंद होने की कगार पर हैं. देश में महंगाई है. बेरोज़गारी है. बिजली की कमी है. केंद्र और राज्य सरकार में भ्रष्टाचार का बोलबाला है. एक के बाद एक घोटाले का पर्दा़फाश हो रहा है. हर क्षेत्र में सरकार फेल रही है और सरकार की नीतियों और सुस्ती के खिला़फ ज़बरदस्त नाराज़गी है. अन्ना हजारे और रामदेव लोगों को कांग्रेस और भ्रष्टाचार के खिला़फ लामबंद कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के सामने चुनाव जीतने का सुनहरा मौका था. लेकिन एक देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का स़फाया हो गया. चुनाव के नतीजे से यही समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश की जनता मायावती से मुक्ति पाना चाहती थी, इसलिए भारी संख्या में लोग घर से बाहर निकले, वोट डाले. समाजवादी पार्टी की जगह भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव को जीत सकती थी, अगर भारतीय जनता पार्टी लोगों को यह विश्वास दिला पाती कि वह एक बेहतर सरकार देने में सक्षम है.

भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी ग़लती यह रही कि चुनाव के दौरान पार्टी ने एनआरएचएम घोटाले के दाग़ी बाबू सिंह कुशवाहा को गले लगाया. इससे न स़िर्फ पार्टी की साख खराब हो गई, बल्कि उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ता भी नाराज़ हो गए. इसका सबसे बड़ा नुक़सान यह हुआ कि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन का फायदा नहीं उठा सकी, जबकि यह दिन के उजाले की तरह सा़फ था कि इन आंदोलनों का फायदा सीधे भारतीय जनता पार्टी को होगा.

भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के चुनाव के महत्व को जानती थी, लेकिन इसके बावजूद तैयारी में देरी हुई. इसकी वजह यह रही कि पार्टी तय ही नहीं कर पाई कि इसका नेतृत्व कौन करेगा. संगठन कौन चलाएगा. व्यवस्था कौन करेगा. उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के पास नेता की जगह मठाधीशों की भरमार थी, इसलिए नितिन गडकरी ने एक सही फैसला लिया. उन्होंने पूर्व संगठन मंत्री संजय भाई जोशी को चुनाव की कमान सौंप दी. संजय जोशी का बैकग्राउंड राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है. वह भाजपा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रह चुके हैं. नितिन गडकरी का यह फैसला सही इसलिए था, क्योंकि संजय जोशी की वजह से ही भारतीय जनता पार्टी तीसरे स्थान पर आई है. अगर वह नहीं होते तो पार्टी को कांग्रेस से कम सीटें आतीं, क्योंकि जितने भी बड़े-बड़े नेता थे, वे खुद ही चुनाव हार गए या फिर अपने रिश्तेदारों को भी अपने इलाक़े में चुनाव नहीं जितवा सके. संजय जोशी के इंचार्ज बनते ही पार्टी में उन्हें विफल करने की कोशिशें भी शुरू हो गईं. टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी में बहुत घमासान हुआ. इस वजह से पार्टी आ़खिरी समय पर उम्मीदवारों के टिकट तय कर सकी. प्रचार का समय जाता रहा. भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार कौन होंगे. प्रचार का प्रारूप कैसा होगा. कौन-कौन राष्ट्रीय स्तर के  नेता उत्तर प्रदेश में प्रचार करने जाएंगे, यह भी तय नहीं हो सका, जबकि दूसरे दलों का प्रचार शबाब पर था.

अगला विवाद उमा भारती को लेकर शुरू हुआ. मुस्लिम रिजर्वेशन के खिला़फ जैसे ही उन्होंने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस की. बीजेपी के कई नेता दुश्मन बन गए. पार्टी में स्थानीय और बाहरी का विवाद शुरू हो गया. गडकरी जिसे मुख्यमंत्री के उम्मीदवार में पेश करना चाहते थे, उसे बीजेपी के ही लोग बाहरी बताकर खारिज करने लगे. पार्टी की अनुशासनहीनता और गुटबाज़ी सामने आ गई. भारतीय जनता पार्टी को जो लोग मायावती के विकल्प के रूप में देख रहे थे, वे भ्रमित हो गए. इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने एक आत्मघाती काम किया. भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे एवं मायावती के मंत्रिमंडल से निकाले गए बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कर लिया गया. एक तऱफ पार्टी मायावती के भ्रष्टाचार के खिला़फ रिपोर्ट निकाल रही थी, जिसमें कुशवाहा का नाम भी शामिल था और दूसरी तऱफ भारतीय जनता पार्टी के नेता उनके गले में माला डालकर स्वागत कर रहे थे. इससे एक बात साबित हुई कि पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन में कोई तालमेल नहीं था. दिल्ली के नेताओं ने बताया कि कुशवाहा को एक रणनीति के तहत पार्टी में शामिल किया गया है. रणनीति यह थी कि भारतीय जनता पार्टी में शामिल होते ही उन पर प्रशासन का शिकंजा कसा जाएगा और उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा और तब कुशवाहा यह कहेंगे कि छापे के दौरान मिले पैसे मायावती के हैं और तब कांग्रेस के गृहमंत्री पी चिदंबरम के सामने मायावती के खिला़फ एक्शन लेने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा. कांग्रेस ने शायद इसे भांप लिया था इसलिए चुनाव तक कोई एक्शन नहीं लिया. एक तो यह रणनीति फेल हुई, साथ ही पार्टी के लिए मुसीबत ब़ढ गई. गडकरी के फैसले से नाराज़ नेता मीडिया में इस फैसले के खिला़फ बयान देने लग गए. दिल्ली में कई नेताओं ने गडकरी के खिला़फ शिकायत भी की. पार्टी के अंदर ऐसा माहौल बन गया कि लोग चुनाव प्रचार करने से बचने लगे. इन सबसे भी अगर कुछ न हुआ तो नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार से दूर रहकर न स़िर्फ पार्टी की फज़ीहत की, साथ ही पार्टी के अंदर गुटबाज़ी की खबरों पर मुहर लगा दी.

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की हार शर्मनाक है, क्योंकि पार्टी के सारे बड़े लीडर चुनाव में हार गए. खुद को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनने का दावा करने वाले नेता अपने लोकसभा क्षेत्र में किसी भी उम्मीदवार को नहीं जिता सके. भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने चुनाव के दौरान यह ऐलान किया था कि पार्टी में एक नहीं, बल्कि पचपन मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. जब नतीजे आए तो भारतीय जनता पार्टी को स़िर्फ 47 सीटें मिलीं. पार्टी बुरी तरह से हार गई.

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की हार शर्मनाक है, क्योंकि पार्टी के सारे बड़े लीडर चुनाव में हार गए. खुद को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनने का दावा करने वाले नेता अपने लोकसभा क्षेत्र में किसी भी उम्मीदवार को नहीं जिता सके. भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने चुनाव के दौरान यह ऐलान किया था कि पार्टी में एक नहीं, बल्कि पचपन मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. जब नतीजे आए तो भारतीय जनता पार्टी को स़िर्फ 47 सीटें मिलीं. पार्टी बुरी तरह से हार गई. पार्टी में जिन लोगों को बड़ा नेता माना जाता है, उनमें से कई हार गए. मतलब यह कि पार्टी में जिन लोगों को बड़ा नेता माना जाता है, जिनके दबाव में पार्टी उल्टे-सीधे फैसले लेने को मजबूर हो जाती है, वे जनता के बीच लोकप्रिय नहीं हैं. दिल्ली में बैठे भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को यह पता ही नहीं है कि उत्तर प्रदेश में उनका नेता कौन है और कौन नेता होने का दावा करके पार्टी को कमज़ोर कर रहा है. यही वजह है कि हारने वालों में भारतीय जनता पार्टी के तीन भूतपूर्व प्रदेशाध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी, रमापति राम त्रिपाठी और ओमप्रकाश सिंह शामिल हैं. पुराने तो पुराने भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही भी चुनाव हार गए. राजनाथ सिंह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं. उन्होंने चुनाव से पहले आडवाणी की रथ यात्रा से अलग खुद एक रथ यात्रा भी निकाली थी. वह ग़ाज़ियाबाद से सांसद हैं. यह आश्चर्य की बात है कि भारतीय जनता पार्टी उनके क्षेत्र की छह की छह सीटें हार गई. लखनऊ, अटल बिहारी वाजपेयी का चुनाव क्षेत्र है. भारतीय जनता पार्टी वहां भी हार गई. भारतीय जनता पार्टी न स़िर्फ चुनाव हारी है, बल्कि उसे वोट भी पिछले चुनाव से कम मिले.

जब किसी पार्टी को यह पता न चले कि ज़मीन पर उनका नेता कौन है. जब किसी पार्टी को यह पता न चले कि कार्यकर्ता क्या चाहते हैं. जब किसी पार्टी में कार्यकर्ताओं से नेताओं की संख्या ज़्यादा हो जाए. जिस पार्टी में भंयकर गुटबाज़ी हो. जो पार्टी जनता के मूड से ब़ेखबर हो. जिस पार्टी के पास कोई लोकप्रिय नारा न हो. जो पार्टी ग़लतियों को रणनीति समझने लगे. जिस पार्टी को उसके नेता ही हराने में जुट जाएं. जिस पार्टी को यह पता नहीं हो कि मुद्दे क्या होने चाहिए. ऐसी पार्टी को कोई चुनाव नहीं जिता सकता है. भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में ऐसी ही पार्टी बनकर उभरी है.

भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष ही हार जाए तो इसका मतलब यही है कि पार्टी के साथ कुछ गंभीर समस्याएं हैं. भारतीय जनता पार्टी स़िर्फ 47 सीटें जीत सकी, जबकि पिछली बार विधानसभा में भाजपा के 55 विधायक थे. पार्टी 55 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही है. 18 उम्मीदवार स़िर्फ 500 वोट से हारे, जबकि 15 उम्मीदवार ऐसे थे जो 500-5000 के अंतर से चुनाव हारे हैं. इन आंकड़ों से पता चलता है कि अगर चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी कुछ ग़लतियां न करती तो वह इन सीटों को जीत सकती थी. भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी ग़लती यह रही कि चुनाव के दौरान पार्टी ने एनआरएचएम घोटाले के दाग़ी बाबू सिंह कुशवाहा को गले लगाया. इससे न स़िर्फ पार्टी की साख खराब हो गई, बल्कि उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ता भी नाराज़ हो गए. इसका सबसे बड़ा नुक़सान यह हुआ कि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन का फायदा नहीं उठा सकी, जबकि यह दिन के उजाले की तरह सा़फ था कि इन आंदोलनों का फायदा सीधे भारतीय जनता पार्टी को होगा. इन आंदोलनों से फायदा उठाने के लिए ही आडवाणी ने देशभर में जनचेतना यात्रा निकाली थी, लेकिन जैसे ही बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल किया गया तो लोगों का विश्वास भाजपा से उठ गया. इससे दूसरा नुक़सान यह हुआ कि पार्टी ने अपने हाथ से भ्रष्टाचार के मुद्दे को गंवा दिया.

भारतीय जनता पार्टी ने इस ग़लती को उत्तराखंड में नहीं दोहराया. उत्तराखंड में मेजर जनरल बीसी खंडूरी ने लोकपाल को लागू कर अन्ना और रामदेव के आंदोलन से फायदा उठाया, जिसकी वजह से पार्टी चुनाव हार के भी जीत गई. उत्तराखंड में राजनीतिक स्थिति और जनता का मूड भारतीय जनता पार्टी के खिला़फ था. यह निश्चित था कि पार्टी चुनाव हार जाएगी. पार्टी ने एक अच्छा फैसला लिया. मेजर जनरल खंडूरी को फिर से मुख्यमंत्री बना दिया. एक सा़फ-सुथरा नेतृत्व और भ्रष्टाचार के खिला़फ एक सा़फ रु़ख जनता के सामने रखकर भारतीय जनता पार्टी हारे हुए चुनाव में कांग्रेस के बराबर खड़ी हो गई. लेकिन आपसी फूट की वजह से मेजर जनरल बीसी खंडूरी खुद ही चुनाव हार गए. भारतीय जनता पार्टी सामाजिक समीकरण को समझने में भी विफल रही. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की वजह से उत्तर प्रदेश में न कोई पिछड़ा और न ही कोई दलित लीडर पार्टी में उभर सका है. पार्टी संगठन इतना बिखर चुका है कि लोगों को पार्टी के फैसले पर ही विश्वास नहीं होता. यही वजह है कि गडकरी ने जो फैसले लिए उत्तर प्रदेश के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उसका विरोध किया. पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कल्याण सिंह की कमी को पूरा करने के लिए उमा भारती के हाथ कमान दे दी. उमा भारती मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं. उन्हें उत्तर प्रदेश में लाने का मतलब तो यही निकलता है नितिन गडकरी को यूपी के किसी भी लीडर पर न तो भरोसा है और न ही यह उम्मीद थी कि कोई इस चुनाव को जिता सकता है. दूसरे प्रदेश से नेता को लाने का मतलब सा़फ है कि यूपी में पार्टी का लीडर कौन है, इस पर पार्टी की कोई राय नहीं थी. भाजपा नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश के स्थापित नेतृत्व की बजाय मध्य प्रदेश से लाई गईं उमा भारती पर ज़्यादा विश्वास जताया. यह बात राज्य के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को पच नहीं पाई है. चुनाव के अंतिम चरण में उमा भारती को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बता देने से भी यह नाराज़गी और बढ़ गई. उत्तर प्रदेश में सवर्ण मतदाता पार्टी का मुख्य जनाधार रहा है. इस बार ओबीसी को ज़्यादा तवज्जो देने एवं इसी वर्ग की उमा भारती को आगे करने से सवर्ण जनाधार भी खिसक गया.

भाजपा को स़िर्फ इस बात से राहत हो सकती है कि वह यूपी में कांग्रेस से आगे रही है, लेकिन उत्तर प्रदेश की हार से नितिन गडकरी की मुश्किलें बढ़ गई हैं. नितिन गडकरी के खिला़फ अब लोग खुलकर बोलने लगे हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गडकरी को संगठन को मज़बूत करने और पार्टी में विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया था. संघ ने इसे एक प्रयोग बताया था. उत्तर प्रदेश के चुनाव में गडकरी का प्रयोग फेल हो गया. पार्टी न तो संगठन को मज़बूत कर सकी और न ही विचारधारा को सामने रखकर चुनाव लड़ी. यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी के वोट प्रतिशत में गिरावट आई है. गडकरी न तो अनुशासनहीनता को रोक सके और न ही कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा कर सके. इसके अलावा गडकरी ने पार्टी में युवा नेतृत्व को न तो अवसर दिया और न ही युवा नेता बनाए. पार्टी पहले से और कमज़ोर नज़र आ रही है. लेकिन भाजपा यह दलील दे रही है कि उत्तर प्रदेश में चतुष्कोणीय मुक़ाबला था और इसका लाभ सपा को मिल गया, क्योंकि लोग बसपा को हराने के मूड में थे. अगर यही लोकसभा चुनाव में हुआ तो भारतीय जनता पार्टी के नेता क्या जवाब देंगे. भारतीय जनता पार्टी को यह समझना होगा कि लोगों ने उन्हें मायावती का विकल्प क्यों नहीं बनाया. विपक्ष अगर मज़बूत होता है तो लोगों में आशा जगती है. भारतीय जनता पार्टी लोगों की आशाओं को तोड़ने का काम कर रही है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎