देश का लोकतंत्र और नौजवान

हमारा देश भूलने की विधा का महारथी है. किसी भी चीज़ को हम बहुत जल्दी और बहुत आसानी से भूल जाते हैं. इनमें भुलाने वाले विषय होते हैं, लेकिन वे विषय भी होते जिन्हें कभी भुलाना नहीं चाहिए, याद रखना चाहिए. यह भी कह सकते हैं कि हम अपने पुरुषार्थ को ही भूल जाते हैं. अन्ना हजारे की पूरी कहानी में कुछ ऐसा ही हुआ. अन्ना हजारे का साथ देश भर के लोगों ने दिया. वह रामलीला मैदान में अनशन कर रहे थे. उनके ऊपर राजनीतिज्ञों के हमले हो रहे थे. इसके बावजूद सारे देश ने राजनीतिज्ञों की बात न सुनकर अन्ना हजारे की बात सुनी और उनके समर्थन में कुछ ने उपवास किया, कुछ ने जुलूस निकाले, कुछ ने पैसे देकर मदद की और कुछ ने अपने साधनों से आंदोलनकारियों को जगह-जगह खाना खिलाया. बहुत सारी जगहों से लोग पैदल चलकर दिल्ली पहुंचे. रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का अनशन अपने समर्थन में सारे देश के लोगों को अनशन करने के लिए तैयार नहीं कर सका, लेकिन उसने देश के लोगों को खड़ा ज़रूर कर दिया. वे, जो उनके यहां नहीं जा सकते थे, खासकर औरतें, उन्होंने अपने-अपने मोहल्ले में प्रभात फेरियां निकालीं, शाम को मोमबत्तियों का जुलूस निकाला.

अब तक हम यही मानते थे कि नौजवान राजनीति से अछूता है, राजनीति को गंदी बात कहता है, राजनीति में जाना नहीं चाहता, नौजवान सपने नहीं देखता, सपने देखने वाला व़क्त समाप्त हो चुका है और नौजवान काहिल हो गया है. लेकिन, इस आंदोलन के दौरान नौजवानों ने ही यह दिखा दिया कि ये सारी बातें ग़लत हैं. नौजवान अगर चाहे तो वह खड़ा हो सकता है, नौजवान अगर चाहे तो वह लोगों को खड़ा कर सकता है, लोगों में चेतना पैदा कर सकता है. तो क्या ये सारी बातें स़िर्फ उन पंद्रह दिनों के लिए थीं, जब अन्ना हजारे अनशन कर रहे थे?

ऐसा लगा, सारे देश में नई चेतना पैदा हो गई है. एक बार रैली की घोषणा हुई और दिल्ली का इंडिया गेट और इंडिया गेट जाने वाले सारे रास्ते लोगों से भर गए. कोई संगठन नहीं था, कोई साधन नहीं थे, कोई नेता नहीं था, लेकिन इंडिया गेट लोगों से भर गया था. आज हिंदुस्तान के लोग अपनी उस क्षमता और अपनी उस ताक़त को भूल गए हैं. अन्ना हजारे को भूल जाएं, कोई बात नहीं, लेकिन अपनी ताक़त को भूल जाएं, यह खतरनाक चीज़ है. इस ताक़त को कैसे संजोकर रखा जाए और कैसे यह ताक़त बुनियादी परिवर्तन के काम में परिलक्षित हो, यह सबसे बड़ी चुनौती न केवल आम जनता के सामने है, बल्कि मुल्क के नौजवानों के सामने है. अब तक हम यही मानते थे कि नौजवान राजनीति से अछूता है, राजनीति को गंदी बात कहता है, राजनीति में जाना नहीं चाहता, नौजवान सपने नहीं देखता, सपने देखने वाला व़क्त समाप्त हो चुका है और नौजवान काहिल हो गया है. लेकिन, इस आंदोलन के दौरान नौजवानों ने ही यह दिखा दिया कि ये सारी बातें ग़लत हैं. नौजवान अगर चाहे तो वह खड़ा हो सकता है, नौजवान अगर चाहे तो वह लोगों को खड़ा कर सकता है, लोगों में चेतना पैदा कर सकता है. तो क्या ये सारी बातें स़िर्फ उन पंद्रह दिनों के लिए थीं, जब अन्ना हजारे अनशन कर रहे थे? अनशन के बाद ऐसा लगा कि संसद को पहली बार देश की जनता की आवाज़ सुननी पड़ेगी. क्या वह दौर इतिहास की चीज़ बन गया है? मेरा मानना है कि वह दौर इतिहास की चीज़ नहीं बना है. नौजवान आज भी स्वप्नदर्शी है, नौजवान आज भी आदर्शवादी है, नौजवान आज भी स्थिति बदलना चाहता है, लेकिन जिस तरह सारी दुनिया में नेतृत्व के बिना कुछ नहीं होता, वही स्थिति हमारे हिंदुस्तान में है. राजनीतिक दलों ने जानबूझ कर नौजवानों को नेतृत्व देने की प्रक्रिया से अलग कर रखा है. उन्होंने अपनी-अपनी युवा और छात्र शाखा को निष्प्रभावी बना दिया है. उन्होंने युवा और छात्र संगठनों के पदाधिकारियों के नाम पर अपने चापलूसों को भर दिया है.

यही वजह है कि सन्‌ 1977 से पहले छात्र संगठन या युवा संगठन जीवंत हुआ करते थे, अपने दल के भीतर सवाल उठाते थे कि आप देश के हित में यह काम क्यों नहीं कर रहे हैं. सन्‌ 1977 के बाद योजनापूर्वक इस मानसिकता की हत्या कर दी गई. आज कहने को छात्र और युवा संगठन हर राजनीतिक दल के पास हैं, लेकिन शायद हम में से कोई नहीं जानता कि किस संगठन का कौन अध्यक्ष है और कौन महामंत्री, बाक़ी पदाधिकारियों की तो बात ही छोड़ दीजिए. उनका स़िर्फ एक धंधा रह गया है. जब कॉलेज या विश्वविद्यालय के चुनाव हों तो वे अपना एक उम्मीदवार खड़ा कर देते हैं. उसमें भी राजनीतिक दलों के नेताओं की धांधली चलती है. उम्मीदवार चुनने की चूंकि राजनीतिक दलों में कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, उसी तरह अब छात्र संगठनों में कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं बची है. युवा संगठनों में लोकतंत्र खत्म हो चुका है, क्योंकि पार्टी में ही ़खत्म हो चुका है. पहले छात्र संगठनों, युवा संगठनों का एक पार्लियामेंट्री बोर्ड हुआ करता था. छात्र संगठन एवं युवा संगठन के चुनाव या खासकर विश्वविद्यालय या कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्षों के चुनाव में पूरी प्रक्रिया अपनाई जाती थी. नाम आते थे, पार्लियामेंट्री बोर्ड बैठता था, कुछ नाम छांटे जाते थे, फिर हाई पॉवर कमेटी उनमें से एक नाम को चुनने योग्य मानती थी और वही चुनाव लड़ता था. उसमें यह नहीं होता था कि आपने अगर टिकट नहीं दिया तो हम दूसरी जगह भाग गए.

इन सब स्थितियों के खिला़फ एक विद्रोह अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान देश में देखने को मिला. नौजवान खड़ा हो गया, उसने सवाल उठाए और अन्ना हजारे के आंदोलन के रूप में उसने अपनी बेकारी, बेबसी, कुंठा, हताशा, देश में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं महंगाई, इन सबके खिला़फ एक रास्ता देखा. उसे लगा कि अन्ना हजारे का आंदोलन इन सबका एक सामूहिक जवाब है. देश के लाखों लोग खड़े हो गए, जिनमें नब्बे प्रतिशत नौजवान थे और जो अपने जीवन की अंतिम पारी खेल रहे थे, वे बुज़ुर्ग भी उनके साथ जुड़ गए. वह अद्भुत मेल था, पर अन्ना हजारे और उनके साथियों के ग़लत आकलन ने नौजवानों की आशाओं को तोड़ दिया. नौजवान देश के निर्माण में विधायी भूमिका चाहता है, वह अपनी समस्याओं का हल तलाशना चाहता है, पर ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है, क्योंकि कोई नेतृत्व नहीं है. राजनीतिक दलों से तो यह आशा नहीं है कि वे कोर्ई समझदारी भरा काम करेंगे और हिंदुस्तान के लोकतंत्र को मज़बूत करेंगे. लेकिन, उनसे तो आशा है, जो लोगों के बीच काम कर रहे हैं. हालांकि यहां पर भी पेंच है. स्वयंसेवी संगठन बनाकर काम करने वाले लोगों में, संगठनों में परस्पर द्वेष है, जलन है. मैं उससे छोटा न रह जाऊं, मेरी कमीज़ उससे कम चमकदार न रह जाए. नतीजे में अपने साथी संगठनों के काम को ही नकारना आज के स्वयंसेवी संगठनों का बुनियादी स्वभाव बन गया है. ये मिलकर काम कर ही नहीं सकते. अलग-अलग काम करेंगे तो अपने साथी संगठनों का चरित्र हनन ज़रूर करेंगे.

मनमोहन सिंह ने एक बयान दिया. उन्होंने कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के खिला़फ आम जनता के ग़ुस्से को स्वयंसेवी संगठनों द्वारा उपजाया ग़ुस्सा बताया. उन्होंने यह भी कहा कि जो संगठन वहां काम कर रहे हैं, वे अमेरिका से प्रभावित हैं. अमेरिका की हर नीति को भारत में लागू करने वाली सरकार का मुखिया जब यह कहे कि कुछ स्वयंसेवी संगठन अमेरिका से प्रेरणा लेकर इस न्यूक्लियर प्लांट के खिला़फ लोगों को भड़का रहे हैं तो हंसी आ जाती है. पर इसे समझने की ज़रूरत है कि मनमोहन सिंह ने ऐसा क्यों कहा और उन्होंने जो कहा, उसे हिंदुस्तान के एक टीवी चैनल ने का़फी लंबी रिपोर्ट के रूप में दिखाया. अमेरिकी साइंस पत्रिका के इंटरव्यू में यह सब एक टीवी चैनल ने इसलिए उद्धृत करते हुए दिखाया, क्योंकि उस टीवी चैनल का एक एंकर अभी प्रधानमंत्री का सलाहकार है. प्रधानमंत्री का पब्लिक रिलेशन का काम एक टीवी चैनल कर रहा है और वह लोगों में अमेरिकी नीतियों के प्रति पैदा हुए ग़ुस्से को डायवर्ट करने की कोशिश कर रहा है. हिंदुस्तान के नौजवान इन सारी चीज़ों को समझें और समझ कर अपने हक़ के लिए खड़े हों, यह ज़रूरी है. इससे भी ज़्यादा ज़रूरी यह है कि अन्ना हजारे और उनके लोग देश में जगह-जगह जाएं और आम जनता को बदलाव की प्रक्रिया से जोड़ने का महत्वपूर्ण काम करें. अगर लोग देश को बदलने की प्रक्रिया से सीधे न जुड़े तो यहां लोकतंत्र कहीं न कहीं अपने रास्ते से भटकेगा और देश में लोकतंत्र के नाम पर पुलिस स्टेट बन जाएगा. खोटा सिक्का अच्छे सिक्के के नाम पर चलता है, उसी तरह लोकतंत्र के नाम पर यह देश पुलिस स्टेट न बन जाए, इसके लिए आज समझदारी विकसित होनी चाहिए और लोगों को खड़ा भी होना चाहिए. यह नौजवानों की सबसे बड़ी ज़रूरत है, क्योंकि अगर इस देश में लोकतंत्र खत्म हुआ तो उनके सामने आने वाले सुनहरे अवसर काली अंधेरी गु़फा के रूप में बदल जाएंगे. उन्हें उस रास्ते पर चलना पड़ेगा, जिसका कहीं कोई अंत नहीं है. इसलिए ज़रूरी है कि देश में लोकतंत्र रहे और लोकतंत्र को बनाए रखने में जितनी अन्ना हजारे और उनके साथियों की ज़िम्मेदारी है, उससे ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी नौजवानों की है कि वे इस लोकतंत्र को हाईजैक न होने दें.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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