मालदीव में सत्ता परिवर्तन : भारत के सामने चुनौती

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मालदीव में शांतिपूर्ण तरीक़े से सत्ता परिवर्तन हो गया है. मोहम्मद नशीद ने राष्ट्रपति पद से इस्ती़फा दे दिया तथा उपराष्ट्रपति मोहम्मद वाहिद हसन को राष्ट्रपति बना दिया गया. कुछ दिनों से चल रहा राजनीतिक संकट समाप्त होता दिखाई दे रहा है. लेकिन मोहम्मद नशीद का इस्ती़फा देना, सत्ता परिवर्तन को राष्ट्र हित में घोषित किया जाना, वर्तमान राष्ट्रपति का यह बयान कि उसे पुलिस और सेना का समर्थन हासिल है, भारत द्वारा वहां की परिस्थितियों पर नज़र रखने के लिए अपना विशेष दूत का भेजा जाना, अमेरिका का बयान कि मालदीव अभी भी अस्थिर है, पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद का यह कहना कि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से सत्ता का त्याग नहीं किया है, बल्कि बंद़ूक की नोंक पर उन्हें इस्ती़फा देने के लिए बाध्य किया गया है. साथ ही मोहम्मद नशीद का चुनाव की मांग करना इस ओर इशारा करता है कि मालदीव में सब कुछ ठीक नहीं है. वहां की स्थिति बाहरी तौर पर जितनी शांत और स्थिर दिखाई दे रही है, वह आंतरिक तौर पर उतनी ही अस्थिर है. यह तू़फान आने से पहले की शांति जैसी है. चूंकि भारत मालदीव का निकटतम पड़ोसी है, इसलिए वहां की स्थिति पर पैनी निगाह रखना का़फी महत्वपूर्ण होगा. मालदीव में लगभग तीस हज़ार भारतीय नागरिक काम कर रहे हैं. मालदीव का न केवल भारत के लिए आर्थिक महत्व है, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी यह भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण देश है. इसलिए यह ज़रूरी है कि इस सत्ता परिवर्तन की परिस्थितियों को समझा जाए तथा मालदीव में भारत को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, इस पर भी ग़ौर किया जाए. ग़ौरतलब है कि मोहम्मद नशीद लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनकर आए थे. उन्होंने चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी ममून अब्दुल ग़यूम को पराजित किया था. 2008 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में मोहम्मद नशीद को 54 फीसदी मत मिले थे, जबकि ममून अब्दुल ग़यूम को 46 फीसदी मत प्राप्त हुए थे. अब्दुल ग़यूम 1978 से मालदीव के राष्ट्रपति थे. 1978 के बाद 6 बार राष्ट्रपति का चुनाव हुआ, लेकिन कोई भी ग़यूम के खिला़फ चुनाव में खड़ा नहीं हुआ. इसके कारण तीस सालों तक अब्दुल ग़यूम ही मालदीव के राष्ट्रपति बने रहे. उन पर अपने विपक्षियों को दबाने का आरोप लगता रहा. मानवाधिकार कार्यकर्ता मोहम्मद नशीद को भी ग़यूम का विरोध करने के कारण जेल जाना पड़ा था, लेकिन आ़खिरकार नशीद ने ग़यूम को लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनौती दी तथा उन्हें चुनाव में हरा भी दिया. मगर पूर्व राष्ट्रपति ग़यूम की स्थिति बहुत कमज़ोर नहीं रही है. सरकार में अभी तक उनके समर्थक मज़बूत स्थिति में हैं. मोहम्मद नशीद लोकतंत्र के समर्थक रहे हैं तथा मालदीव के सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक ढांचे में अनेक सुधार किए, जिसके कारण उनके दुश्मनों की संख्या बढ़ गई. चूंकि मालदीव एक इस्लामिक राष्ट्र है और नशीद एक उदारवादी लोकतांत्रिक राष्ट्रपति थे. इस कारण वहां के कट्टरपंथियों ने कभी उन्हें पसंद नहीं किया. मौजूदा विवाद का कारण न्यायपालिका में सुधार की कोशिश ही है. न्यायपालिका ने कट्टरता तथा आतंकवाद से जुड़े कतिपय मामलों में धार्मिक आग्रहों के प्रति सहानुभूति दिखाई थी. जब नशीद ने एक वरिष्ठ न्यायाधीश को भ्रष्टाचार, विपक्ष से सहानुभूति रखने के कारण पद से हटाने तथा गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया. इसके बाद पहले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने और बाद में अन्य लोगों ने प्रदर्शन किया. लेकिन मुख्य वजह कोई और ही थी. ग़यूम समर्थक नशीद को पदच्युत करना चाहते थे. हालांकि राष्ट्रपति वाहिद हसन ने राष्ट्रीय सरकार बनाने की बात कही है और सैन्य तख्तापलट से इंकार किया है. लेकिन आगे उनकी रणनीति क्या होगी, इस पर नज़र रखना भारत के लिए ज़रूरी है. अगर मालदीव कट्टरपंथियों के नज़दीक जाता है तो हमारे पड़ोसी मुल्क इसका फायदा उठा सकते हैं. भारत ने वहां की घटनाओं पर नज़र न रखकर पहले ही ग़लती कर दी है, अब आगे भी ग़लती करता रहा तो एक और पड़ोसी देश में इसके विरुद्ध आवाज़ उठने लगेगी. मालदीव की राजनीतिक स्थिरता और सत्ता का उदारवादी दृष्टिकोण भारत के लिए ज़रूरी है. भारत के समक्ष एक चुनौती आ गई है, इससे निपटना ही होगा.

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