ट्रेड यूनियन की आवश्यकता और इतिवृत्त

किस तरह मज़दूर पूंजीवादी उद्योगपतियों का मुक़ाबला कर सका, इसका इतिवृत्त है. यह ज़ाहिर था कि कोई स्त्री या पुरुष, जो काम करता हो, नौकरी करता हो, अकेले जाकर मालिक के साथ न बहस कर सकता है, न मुक़ाबला. मालिकों का नपा-तुला यही जवाब होता है कि अगर इस मज़दूरी और स्थिति में तुम काम नहीं करोगे तो तुम्हारे भाई दूसरे सैकड़ों करने वाले तैयार हैं. यह उत्तर लगभग सभी श्रमिकों के, अकेले बात करने पर, मुंह पर ताला लगा देता था. इसलिए मालिकों के सामने मज़दूरों की अपनी फरियाद का कुछ असर हो, उसकी कुछ सुनवाई हो, इसके लिए आवश्यक था कि किसी प्रकार का संगठन हो, क्योंकि एकता की आवाज़ ही मालिकों पर असर कर सकती है.

जब-जब व्यापार में मंदी आती है, तब-तब तालेबंदियां होती हैं और वे भी अधिकतर सफल ही होती हैं. व्यापार की स्थिति बदलती रहती है. प्रथम विश्व युद्ध के 5-7 वर्ष के बाद काफी बड़ी व्यापारिक मंदी आई और फलस्वरूप इतनी ज़्यादा बेकारी और दरिद्रता बढ़ी, जिसका असर बाद में कई वर्षों तक देश को भुगतना पड़ा. द्वितीय महायुद्ध के समय और उसके बाद जोर-शोर से व्यापार में तेजी आई. फलस्वरूप काफी ज़्यादा मजदूरी बढ़ी. मज़दूरों के सब आंदोलन सफल रहे. ये हड़ताल या तालेबंदियां एक तरह का वर्ग संघर्ष हैं.

सब तरह के मज़दूरों के लिए किसी तरह से भी एकता का संगठन कर सकना संभव ही नहीं था. उदाहरण स्वरूप घरेलू नौकरों को ही लीजिए, एक घर में झाड़ू-बुहारी, पानी भरना, कपड़े धोना इत्यादि काम करता है. रसोइया या रसोइन रसोई बनाती है. सब क़रीब-क़रीब अपने-अपने दायरे में सीमित हैं. वे अकेले काम करते हैं. कहीं भी समुदाय या झुंडों में काम नहीं करते. एक-दूसरे से मिलने या विचार-विमर्श करने के मौक़े भी उन्हें कदाचित ही मिलते हैं. ऐसे श्रमिकों का संघ या संगठन होना नितांत मुश्किल है. या लीजिए खेतों में काम करने वाले मज़दूरों को, वहां भी अलग-अलग खेतों में जुताई-बुआई, बटाई-छंटाई इत्यादि अनेक कामों में सैकड़ों मज़दूर काम करते हैं, पर उनका आपस में मिलना और विचार-विमर्श कर सकना शक्य ही नहीं है. अतएव उनमें भी किसी प्रकार का संघ स्थापित होना मुश्किल है. अगर संघ क़ायम कर भी लिया जाए तो उसे सुसंगठित रख सकना बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि वे एक-दूसरे से इतनी दूर-दूर रहते हैं कि उनका मिलना ही नहीं होता. ऐसी ही हालत इस तरह के सभी श्रमिकों की है. स़िर्फ फैक्टरी, कारखाने, खानें, रेलवे, ट्राम, बसें इत्यादि कामों में श्रमिकों का संगठन हो सकता है. ऐसे मज़दूरों का संगठित स्वरूप चलता भी है.

कई ऐसे धंधे भी हैं, जहां सब साथ-साथ काम करते हैं, तो भी उनमें संघ या संगठन नहीं हो सकता. उदाहरण के लिए किसी फिल्म कंपनी के कलाकारों को ले लीजिए. एक प्रसिद्ध सिने तारिका को लाखों रुपये मिलते हैं, वहीं सैकड़ों दूसरी एक्सट्रा तारिकाओं को पेट भर खाने जितना भी वेतन नहीं मिलता. उनमें संगठन न हो सकने का कारण स्पष्ट है. समान कक्षा, समान शील, समान व्यवहार, समान श्रम वाले श्रमिकों का ही संगठन हो सकता है. जहां आमदनी में या सामाजिक प्रतिष्ठा में एक-दूसरे में भयंकर अंतर हो, वहां वे आपस में संघ क़ायम कर ही नहीं सकते. फैक्टरी, कारखाने, रेलवे इत्यादि में काम करने वाले श्रमिकों का संघ क़ायम हो सकता है. मकान बनाने वाले राजमिस्त्री, गारा-चूना ढोने वाले, बढ़ई, लोहार इत्यादि श्रमिकों के भी संघ बनाने के प्रयत्न किए गए और आंशिक रूप से वे सफल भी हुए. कोई भी असहनीय दमन, जो मालिक लोग कर बैठते हैं, उसके विद्रोह स्वरूप ही तो संघ क़ायम होते हैं. एकबद्ध होकर श्रमिक लोग अपनी बात को अमुक दृष्टिकोण से देखने के लिए मालिकों को बाध्य कर सकते हैं. जब उनका ध्येय सिद्ध हो जाता है अथवा वे अपने ध्येय की प्राप्ति में असफल हो जाते हैं, तब वह संघ टूट जाता है. फिर जब कभी आपत्ति-विपत्ति आती है तो फिर उसी तरह संघ खड़ा होता है. इसके बाद उस संघ को अस्थायी रूप से क़ायम रखने के लिए वे कुछ चंदा इकट्ठा करते हैं. नौकरी छूटने पर विपत्ति आती है, तब उस जमा की हुई पूंजी में से कुछ लेकर, कुछ समय तक योग क्षेम का काम चलाया जाता है. क्षणिक विद्रोह के लिए खड़े हुए संगठित श्रमिक संघ आगे चलकर स्थायी श्रमिक संघ बन गए. यही इतिहास है श्रमिक संघ का. ऐसे मजदूरों के संघ पूंजीवादियों के अनाधिकार हस्तक्षेपों को मिटाने के लिए क्या कर सकते हैं, यह सोचना है. जब एक श्रमिक संघ पूर्ण रूप से क़ायम हो जाता है, तब वे मालिक के सामने उसके मुंह पर कह सकते हैं कि हम अमुक मज़दूरी में काम नहीं करेंगे. यह जोखिम तो हमेशा रहता था कि तुम नहीं, तो तुम्हारे दूसरे भाई काम करेंगे. अब नहीं रहा.

अगर शहर के तमाम जुलाहे एक स्थायी संगठन बना लें तो मालिक के मज़दूरी कम करने पर कह सकते हैं कि हम इस कम मज़दूरी पर काम नहीं करेंगे, क्योंकि उनके गुजारे के लिए तो वह एकत्रित फंड उपलब्ध होगा ही. इस तरह इंकार कर देने से उनके मालिकों के उद्योग महीनों के लिए बंद हो जाएंगे. साथ ही संगठित मज़दूरों द्वारा हड़ताल कर देने पर इनके स्थान पर काम करने के लिए मालिकों को तत्काल मज़दूर नहीं मिल सकेंगे. एकाध आदमी को तो नौकरी से निकालने की धमकी दी जा सकती है और अकेले होने के कारण उसका डरना भी स्वाभाविक है, मगर तमाम मज़दूरों के काम छोड़ देने पर स्थिति संभालना किसी भी मालिक के लिए कठिन हो सकता है. इस तरह संगठित होकर, काम न करने का निश्चय करके मालिक को बाध्य करने की स्थिति को हड़ताल कहते हैं. मज़दूर लोग इस तरह से हड़ताल न केवल मज़दूरी कम करने के विरोध में ही करते हैं, बल्कि मज़दूरी बढ़ाने के लिए, काम के घंटे घटवाने के लिए या अन्य किसी भी हेतु से, जो वे मालिकों से करवाना चाहते हों, कर देते हैं. उनकी सफलता या विफलता बहुधा उस समय की व्यापारिक स्थिति पर ही निर्भर रहती है. अगर व्यापार की स्थिति सामान्य हो तो मालिक लोग मांग स्वीकार न करके कारखाने को बंद कर देते हैं. जब तक कि मज़दूरों का चंदे से इकट्ठा किया हुआ धन व्यय न हो जाए और बेकारी से भूखों मरने की नौबत न आ जाए, तब तक वे फैक्टरियां या कारखाने बंद ही रखते हैं. अंत में जब हड़तालियों को विवश होकर, हार स्वीकार कर, शरणागत होना पड़ता है, तब मालिक लोग अपनी शर्तों पर ही फैक्टरी या कारखाने चलाने को राजी होते हैं. लेकिन, अगर उस समय व्यापार में काफी उन्नति हो रही हो और कारखाने का एक दिन भी बंद रहना या उत्पादन न होना, मालिकों के मुना़फे में भारी फर्क़ डाल रहा हो तो वे येन-केन-प्रकारेण हड़तालियों की शर्तों के साथ समझौता करके कारखाने और फैक्टरियां चालू रखते हैं.

वे अपना हिसाब लगा लेते हैं कि मज़दूरों की मांगों को कबूल करने में उनको अपेक्षाकृत अच्छा लाभ है. समय निकलने के बाद मालिक लोग फिर अपने मौक़े की फिराक में रहते हैं. जब भी व्यापार की स्थिति मंदी या सामान्य होती है तो वे हिसाब लगा लेते हैं कि अगर फैक्टरी या कारखाना बंद रहे तो उनके लिए कोई विशेष फर्क़ नहीं पड़ेगा, ख़ास मुना़फे की हानि नहीं होगी या बहुत ही कम हानि होगी, तो वे मज़दूरी कम करने के लिए प्रयत्न करते हैं. मज़दूर न मानें तो वे तमाम कामों को बंद कर डालते हैं. ऐसी परिस्थितियों को मालिकों की हड़ताल या तालाबंदी कहा जाता है. व्यापार में जब भी उन्नति होती है तो मज़दूरों की हड़तालें हुआ करती हैं और अधिकतर वे सफल ही होती हैं. जब-जब व्यापार में मंदी आती है, तब-तब तालेबंदियां होती हैं और वे भी अधिकतर सफल ही होती हैं. व्यापार की स्थिति बदलती रहती है. प्रथम विश्व युद्ध के 5-7 वर्ष के बाद काफी बड़ी व्यापारिक मंदी आई और फलस्वरूप इतनी ज़्यादा बेकारी और दरिद्रता बढ़ी, जिसका असर बाद में कई वर्षों तक देश को भुगतना पड़ा. द्वितीय महायुद्ध के समय और उसके बाद जोर-शोर से व्यापार में तेजी आई. फलस्वरूप काफी ज़्यादा मजदूरी बढ़ी. मज़दूरों के सब आंदोलन सफल रहे. ये हड़ताल या तालेबंदियां एक तरह का वर्ग संघर्ष हैं.

महावीर प्रसाद आर मोरारका

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

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महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.