यमन : सालेह का जाना ही काफी नहीं है

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अली अब्दुल्ला सालेह ने उप राष्ट्रपति रहे अब्दरब्बो मंसूर हादी को औपचारिक तौर पर सत्ता सौंप दी. सालेह के खिला़फ पिछले साल से ही विरोध प्रदर्शन हो रहा है. यमन में गृह युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी. अरब के कई देशों एवं अमेरिका ने सालेह को सत्ता छोड़ने की सलाह दी थी. सालेह पर हमला भी हो चुका है, जिसमें वह घायल हो गए थे. वह अमेरिका से अपना इलाज कराकर वापस लौटे हैं. अमेरिका से वापस लौटने के बाद उन्होंने सत्ता हस्तांतरित करने का फैसला लिया. स्पष्ट है कि अमेरिका में वह केवल अपना इलाज नहीं करा रहे थे, बल्कि इस बात पर भी चर्चा कर रहे थे कि उनका राष्ट्रपति पद पर बने रहना अब संभव है या नहीं. ज़ाहिर है, अमेरिका ने साफ तौर पर कह दिया होगा कि वर्तमान स्थिति को देखते हुए उनका राष्ट्रपति बने रहना सही नहीं है, क्योंकि विद्रोह धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है. उम्मीद तो यही जताई जा सकती है कि हादी को राष्ट्रपति बनाने का फैसला भी अमेरिका के इशारे पर लिया गया. कहने के लिए तो हादी के पक्ष में 99 फीसदी वोट पड़े, लेकिन इसे चुनाव तो नहीं कहा जा सकता है. हादी राष्ट्रपति पद के एकमात्र प्रत्याशी थे यानी उन्हें निर्विरोध राष्ट्रपति बनाया गया.

अब गेंद हादी के हाथों में है. अगर वह सालेह के हाथों की कठपुतली बने रहे और अमेरिका के इशारों पर काम करते रहे तो फिर यमन में शांति क़ायम नहीं हो सकेगी. अगर हादी अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं तो उन्हें सेना के नेतृत्व में परिवर्तन करके निष्पक्ष चुनाव कराने होंगे और इसके लिए उन्हें ख़ुद को सालेह की गिरफ्त से आज़ादी पानी होगी. देखना यह है कि सालेह अपनी चाल में कामयाब होते हैं या हादी अपना भविष्य सुरक्षित कर पाते हैं.

प्रथम दृष्टया इसे यमन की जनता की जीत कहा जा सकता है, लेकिन क्या वास्तविक तौर पर इसे क्रांति की सफलता कहना उचित होगा? सालेह की सरकार में हादी उप राष्ट्रपति रहे हैं. वह सालेह के नज़दीकी लोगों में से एक हैं. सालेह ने उन्हें राष्ट्रपति बनाया है. फिर इसे क्रांति की जीत कैसे कहा जा सकता है. क्रांति तो व्यवस्था परिवर्तन के लिए की जाती है. यमन में जिन लोगों ने सालेह का विरोध किया था, उनका मतलब केवल सालेह को हटाए जाने से नहीं रहा है. सालेह के विरोध का मतलब उस व्यवस्था का विरोध था, जिसका नेतृत्व वह कर रहे थे. तैंतीस सालों के शासन में उन्होंने यमन के साथ जो किया, लोगों ने उसका विरोध करने के लिए प्रदर्शन किए. इसलिए नहीं कि सालेह अपना उत्तराधिकारी चुनकर चले जाएं, जो उनकी नीतियों को कार्यान्वित करता रहे. यमन की जनता भी इस सत्ता हस्तांतरण को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है. जब हादी शपथ ले रहे थे तो यमन की जनता प्रदर्शन कर रही थी. उसका कहना था कि अमेरिकी राजदूत जेरल्ड फीशर को देश से बाहर निकाला जाए. जनता अपने आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप के ख़िला़फ है. वह इस बात से वाक़ि़फ है कि सालेह का कोई हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है.

सालेह ने अमेरिका से वापस आने के बाद ही राष्ट्रपति पद त्यागने का निर्णय लिया. उन्होंने ख़ुद हादी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया और एक छद्म चुनाव कराकर यह साबित करने की कोशिश की कि हादी को जनता का समर्थन प्राप्त है, जबकि बहुत सारे लोगों ने इस चुनाव का बहिष्कार किया. यमन की राजधानी सना में सालेह का विरोध कर रहे लोग भी वहां से जाने के पक्ष में नहीं हैं. वे व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं. उनका कहना है कि सत्ता का इस तरह से हस्तांतरण निवर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन की गारंटी नहीं देता है. यमन में भ्रष्टाचार चरम पर है. यह सही है कि इस भ्रष्टाचार का मुखिया चला गया, लेकिन उनके सिपहसालार तो अभी भी अपने पदों पर बने हुए हैं. हादी को राष्ट्रपति बनाया गया है, लेकिन जब तक सालेह के समर्थक और रिश्तेदार फौज में ऊंचे पदों पर बने रहेंगे, तब तक यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि वह शासन सही तरीक़े से चला पाएंगे. सत्ता हस्तांतरण के बाद सना के चेंज स्न्वायर पर डटे युवाओं से पत्रकारों ने बात की तो उनका कहना था कि इसे उनकी जीत की शुरुआत कहा जा सकता है, पूरी जीत नहीं. पूरी जीत तो तब कही जाएगी, जबकि यमन में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव हो. छात्र ओसामा सुल्तान का कहना था कि महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हादी सेना के साथ क्या करते हैं. अगर उन्होंने सेना में परिवर्तन नहीं किया तो फिर उनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है.

हालांकि हादी को अरब लीग और अमेरिका से समर्थन मिल रहा है. उन्होंने अरब लीग के जनरल सेक्रेटरी नबी-अल अरबी से मुलाकात की, जो उन्हें बधाई देने के लिए यमन आए हुए थे. यूरोपीय संघ ने भी हादी को बधाई दी. बगदाद में होने वाली अरब सम्मिट में शामिल होने के लिए यमन के राष्ट्रपति हादी को आमंत्रित किया गया है. देखा जाए तो हादी को वैश्विक समर्थन मिल रहा है, लेकिन अभी हादी को अपने देश की जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि वह उसकी अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे. अगर वह स्वामिभक्ति के बदले देशभक्ति को ज़्यादा तवज्जो देंगे, तभी वह देश की जनता को विश्वास में ले सकेंगे. जनता व्यवस्था में परिवर्तन की इच्छा रखती है. लोग सालेह से परेशान थे, क्योंकि वह तानाशाह थे. उन्होंने अपने सगे संबंधियों को उच्च पदों पर बैठा रखा था. भ्रष्टाचार देश को खोखला करता जा रहा था, युवा वर्ग परेशान था, लेकिन यमन के लोगों को मौक़ा नहीं मिल रहा था कि वे सालेह के ख़िला़फ मोर्चा खोल सकें, लेकिन जैसे ही अरब के अन्य देशों में तानाशाही के ख़िला़फ विद्रोह भड़का, यमन की जनता को भी संबल मिल गया. उसने भी सालेह की तानाशाही का विरोध करना शुरू कर दिया. सालेह को अमेरिका का समर्थन हासिल था, इसलिए वह ज़्यादा दिनों तक विद्रोहियों को उलझाए रखने में सफल रहे, लेकिन जब सालेह और उनके आका को लगा कि बिना सत्ता हस्तांतरण के इसे रोका नहीं जा सकता तो उन्होंने एक चाल चल दी और अपने उप राष्ट्रपति को सत्ता सौंपकर अपनी परोक्ष सत्ता बनाए रखने की साजिश की. अब गेंद हादी के हाथों में है. अगर वह सालेह के हाथों की कठपुतली बने रहे और अमेरिका के इशारों पर काम करते रहे तो फिर यमन में शांति क़ायम नहीं हो सकेगी. अगर हादी अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं तो उन्हें सेना के नेतृत्व में परिवर्तन करके निष्पक्ष चुनाव कराने होंगे और इसके लिए उन्हें ख़ुद को सालेह की गिरफ्त से आज़ादी पानी होगी. देखना यह है कि सालेह अपनी चाल में कामयाब होते हैं या हादी अपना भविष्य सुरक्षित कर पाते हैं.

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