बेवल पंचायतः ईमानदारी की कीमत चुकाता एक सरपंच

संजय ब्रह्मचारी उर्फ संजय स्वामी की आंखों में एक सपना था. वह सपना था, गांधी जी के सपनों को साकार करने का. दिल्ली एवं मुंबई में हमारी सरकार, लेकिन हमारे गांव में हम ही सरकार यानी हमारा गांव हमारी सरकार. 13 सितंबर, 2010 की रात हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले की बेवल पंचायत में इस सपने को साकार करने की एक शुरुआत हुई थी, जब संजय स्वामी ने ग्रामसभा की खुली बैठक में सरपंच पद का प्रभार काफी मशक्कत के बाद संभाला था. मशक्कत इसलिए, क्योंकि न हारा हुआ सरपंच और न प्रशासनिक अधिकारी ग्रामसभा की खुली बैठक में संजय स्वामी को प्रभार देना चाहते थे. उस व़क्त भी चौथी दुनिया ने इस ख़बर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था. लेकिन सरपंच बनने के बाद जब संजय स्वामी ने ग्रामसभा की नियमित बैठक और पंचायत के कामों में पारदर्शिता लाने का काम शुरू किया, तब यह बात कुछ लोगों को रास नहीं आई. इसमें राजनेताओं से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक शामिल थे. नतीजतन, संजय स्वामी को परेशान किए जाने की तैयारी शुरू हो गई. झूठे मुक़दमे किए गए, आरोप लगाए गए. यह सब इसलिए भी हुआ, क्योंकि संजय स्वामी टीम अन्ना के आंदोलन में भी सक्रिय हैं और हिसार उपचुनाव में टीम अन्ना के साथ जोर-शोर से लगे हुए थे. उन्हें हत्या के प्रयास और बिजली चोरी जैसे मामलों में भी फंसाने की कोशिश की गई.

सरपंच बनने के बाद जब संजय स्वामी ने ग्रामसभा की नियमित बैठक और पंचायत के कामों में पारदर्शिता लाने का काम शुरू किया, तब यह बात कुछ लोगों को रास नहीं आई. इसमें राजनेताओं से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक शामिल थे. नतीजतन, संजय स्वामी को परेशान किए जाने की तैयारी शुरू हो गई. झूठे मुक़दमे किए गए, आरोप लगाए गए. यह सब इसलिए भी हुआ, क्योंकि संजय स्वामी टीम अन्ना के आंदोलन में भी सक्रिय हैं और हिसार उपचुनाव में टीम अन्ना के साथ जोर-शोर से लगे हुए थे. उन्हें हत्या के प्रयास और बिजली चोरी जैसे मामलों में भी फंसाने की कोशिश की गई.

चौथी दुनिया से बातचीत में संजय स्वामी कहते हैं कि पुलिस ने मुझे झूठे मामले में फंसा दिया है, 307 के एक मामले में, इसलिए अभी छिपा हुआ हूं, वकीलों से सलाह ले रहा हूं. इस मामले की कहानी बताते हुए वह कहते हैं कि पूरे ज़िले में भैंस लूट का मामला चल रहा था, लोग अपना आक्रोश शांतिपूर्ण ढंग से व्यक्त कर रहे थे. पुलिस ने भीड़ हटाने के लिए वहां लाठीचार्ज कर दिया, जिसमें का़फी लोगों को चोटें आईं. विरोध में लोगों ने पत्थरबाज़ी की, जिससे एक एसएचओ का माथा फूट गया. पुलिस ने यह कहकर कि संजय ब्रह्मचारी थे उसमें और उन्होंने एसएचओ को लाठी से मारा, धारा 307 लगा दी और उसमें यह भी जोड़ दिया कि हमने उनकी कार्बाइन लूट ली है. वह कहते हैं कि  मेरा अधिकतर जीवन आश्रम में बीता है, हिंसा में हम विश्वास नहीं करते. संजय स्वामी आगे बताते हैं कि चुनाव जीतने के बाद शपथ लेने में मुझे तीन महीने लगे, क्योंकि हमने जनता के सामने यह बात रखी थी कि हम जो भी करेंगे, पंचायत की खुली बैठक में करेंगे. चार्ज खुली बैठक में लिया जाएगा और प्रशासन खुली बैठक में चार्ज देने को तैयार नहीं था.

ज़ाहिर है, हरियाणा समेत हर राज्य में एक परंपरा सी है कि जब सरपंच चार्ज लेता है तो उसमें कोई डीटेल्ड बात नहीं होती है. वह एक बस्ता भरकर लाते हैं रिकॉर्डों का, जीता हुआ सरपंच उस पर दस्तखत कर देता है और चार्ज हैंडेड ओवर/टेकेन ओवर हो जाता है. कभी यह जानने की कोशिश नहीं की जाती कि गांव में कितने पैसे कहां लगे. संजय स्वामी ने जब चार्ज लिया, तभी पूर्व सरपंच द्वारा पांच लाख रुपये से ज़्यादा की लूट का पता चल गया. उन्होंने जनता को इस बारे में बताना शुरू किया कि आपके पैसों का इस्तेमाल कहां और कैसे हो रहा है, कौन इसे लूट रहा है, तो इससे प्रशासनिक अधिकारियों को दिक्कत हुई. सरपंच बनते ही संजय स्वामी की मुश्किलें शुरू हो गईं. वह कहते हैं कि क़ानून यह कहता है कि जब चुनाव की घोषणा होती है तो पंचायत के सारे खाते ब्लॉक में जमा हो जाने चाहिए. अब ब्लॉक से कैसे चेकबुक बाहर आई और किस तरह पूर्व सरपंच ने पैसा निकाल लिया. ज़ाहिर है, बीडीओ एवं अन्य अधिकारी जब तक शामिल न हों, तब तक ऐसा नहीं हो सकता. जब मैंने इस मुद्दे को उठाया तो कुछ स्थानीय नेता एवं अधिकारी मेरे दुश्मन बन गए. संजय बताते हैं कि मुझे चार्ज तो दे दिया गया, लेकिन प्रशासन और अन्य लोगों द्वारा हमारे पंचों को भड़का दिया जाता था, ग्राम सचिव कई बार बदल दिए गए.

महेंद्रगढ़ हरियाणा के पिछड़े क्षेत्र में आता है और केंद्र सरकार एक विशेष योजना के तहत विकास के लिए 13 करोड़ रुपये सीधे ज़िले में भेजती है, लेकिन आप आश्चर्य करेंगे कि कैसे उस पैसे की बंदरबांट हो जाती है, जो गांव के विकास के लिए ख़र्च होना चाहिए. संजय कहते हैं कि उस पैसे से कंप्यूटर ख़रीदे जाते हैं, ट्रैक्टर ख़रीदे जाते हैं, जबकि गांव में सड़क नहीं है, नाली नहीं है, बिजली नहीं है. कई गांव तो ऐसे हैं, जिनमें आधारभूत संरचना नहीं है. अधिकारी विकास पर ध्यान देने के बजाय स़िर्फ लूट-खसोट पर ध्यान देते हैं.

संजय बताते हैं, मुझे एक बार पूर्व सरपंच के कार्यकाल के दौरान हुई गड़बड़ी की जांच के संबंध में ब्लॉक में बुलाया गया. षड्‌यंत्र के तहत मेरे साथ मारपीट की गई. उस समय वहां कोई अधिकारी उपस्थित नहीं था. मैं किसी तरह भागकर पुलिस के पास गया और रिपोर्ट दर्ज कराई. मैं जब गांव पहुंचा तो मालूम हुआ कि मेरे ख़िला़फ हरिजन एक्ट के अंतर्गत झूठा मुक़दमा ग्राम सचिव ने दर्ज करा दिया है. उन्होंने गांव की एक महिला को आगे करके उक्त मुक़दमा दर्ज कराया, जो चल रहा है. महिला ने आरोप लगाया कि मैं जब बीपीएल कार्ड के लिए महाराज की कुटिया में गई तो उन्होंने मुझे जातिसूचक शब्द कहे. इस सबके पीछे कौन लोग हो सकते हैं, यह पूछे जाने पर संजय कहते हैं कि जो महिला बीपीएल कार्ड के लिए मेरे पास आई, वह पहले से राजस्थान में एक बड़ी ज़मीन की मालिक है. उसमें एक राजनीतिक दबाव रहा, ये लोग किसी पार्टी के नहीं हैं, प्रशासनिक अधिकारी डीडीपीओ हैं. पांच लाख वाले मामले में कहीं न कहीं उनकी संलिप्तता है, उनके कहने पर ही यह काम हुआ. संजय बताते हैं कि महिला वाले मामले में पुलिस फाइनल रिपोर्ट लगा चुकी है, क्योंकि उसमें दो-दो अधिकारी बदले गए, महेंद्रगढ़ के स्थानीय विधायक का भी दबाव था. दो-दो अधिकारी बदले जाने के बावजूद मामला बनता न देख पुलिस ने एफआर लगा दी.

संजय स्वामी कहते हैं कि तीसरा केस मुझ पर बिजली चोरी का लगाया गया. बिजली चोरी के केस में जिस उपकरण की बात की गई, वह मेरी कुटिया में नहीं है, मेरे यहां पंखा तक नहीं है. उस दिन मैं गांव में था ही नहीं. वह कहते हैं कि मैं उस दिन अपने गांव के कुछ मामलों के सिलसिले में चंडीगढ़ लोकायुक्त के यहां जा रहा था. मैंने एक्जीक्यूटिव इंजीनियर और एसडीओ को रिप्रेजेंटेशन दिया कि मेरे ख़िला़फग़लत मामला बना दिया गया है, लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी और 4000 रुपये का जुर्माना कर दिया. मैंने कहा कि आप विजिलेंस केख़िला़फ कुछ नहीं कर पाएंगे, मगर जांच तो कर सकते हैं. उन्होंने मेरे ख़िला़फ केस दर्ज करा दिया. जब मैं 307 और कार्बाइन वाले केस में कोर्ट में पेश नहीं हुआ तो मेरे ख़िला़फ वारंट आ गया. मैंने अंतरिम जमानत के लिए भी कोशिश की, लेकिन मुझे जमानत नहीं मिली. जब भैंस वाली लड़ाई हुई थी, तब पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया था. आरोप संगीन होने की वजह से हाईकोर्ट ने मेरी अग्रिम जमानत का आवेदन खारिज कर दिया. इसलिए सरकार की नज़र में भगोड़ा हूं. कार्बाइन वाले केस में मेरे पास एक सीडी है, जिसमें कार्बाइन रिकवरी की बात एसएचओ ने स्वीकारी है. यह मामला बनाया हुआ है, ताकि मुझे फंसाया जा सके.

सवाल यह है कि भ्रष्टाचार के ख़िला़फ, चाहे वह राष्ट्रीय स्तर का हो या पंचायत स्तर का, आवाज़ उठाने पर सत्ता और प्रशासन में बैठे लोगों को क्यों परेशानी होती है. पंचायत या किसी भी संस्था में पारदर्शिता हो, पंचायत स्तर पर ग्रामसभा मज़बूत हो, जन भागीदारी सुनिश्चित की जा सके, ऐसा काम अगर कोई सरपंच करता है या करना चाहता है तो इसमें दिक्कत क्या है. आख़िर क्यों ऐसी बातों को सत्ता प्रतिष्ठान स्वीकार नहीं करना चाहता. जहां सरपंच सूचनाओं को दबाते हैं, वहीं कोई ईमानदार सरपंच सूचनाओं को उजागर कर रहा है तो क्यों यह बात प्रशासन के बर्दाश्त से बाहर हो जाती है. संजय बताते हैं, हमारे यहां कोई भी योजना हो, उसके अंदर लुकाछिपी का काम चलता है. कोई ऐसी योजना नहीं है, जिसमें पैसा नहीं खाया जाता. महेंद्रगढ़ हरियाणा के पिछड़े क्षेत्र में आता है और केंद्र सरकार एक विशेष योजना के तहत विकास के लिए 13 करोड़ रुपये सीधे ज़िले में भेजती है, लेकिन आप आश्चर्य करेंगे कि कैसे उस पैसे की बंदरबांट हो जाती है, जो गांव के विकास के लिए ख़र्च होना चाहिए. संजय कहते हैं कि उस पैसे से कंप्यूटर ख़रीदे जाते हैं, ट्रैक्टर ख़रीदे जाते हैं, जबकि गांव में सड़क नहीं है, नाली नहीं है, बिजली नहीं है. कई गांव तो ऐसे हैं, जिनमें आधारभूत संरचना नहीं है. अधिकारी विकास पर ध्यान देने के बजाय स़िर्फ लूट-खसोट पर ध्यान देते हैं.

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