जीवनी नहीं, घटनाओं का कोलाज

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मुझे प्रेम कथाओं के अलावा जीवनियां और आत्मकथाएं पढ़ने का बेहद शौक है. मेरे मित्र भी अगर कोई नई बॉयोग्राफी पढ़ते हैं तो उसकी जानकारी मुझे देते हैं, साथ ही देश-विदेश के प्रकाशकों के ई-मेल से भी जानकारियां मिलती रहती हैं. जब भी जानकारी मिलती है, उस किताब को ख़रीद लेता हूं. पढ़ता हूं अपनी मर्जी और सहूलियत के हिसाब से. कुछ दिनों पहले अचानक से देखा तो मेरी रैक पर एक साथ एक परिवार की तीन पीढ़ियों की जीवनियां इकट्ठी रखी थीं. लंबे समय तक न्यूयॉर्क टाइम्स के अफ्रीका, मध्य पूर्व और भारत में संवाददाता रहे प्रणय गुप्ते की पेंग्विन से प्रकाशित इंदिरा गांधी की राजनीतिक जीवनी-मदर इंडिया, अ पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ इंदिरा गांधी. दूसरी किताब है लंदन में रह रहीं ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट रानी सिंह की, जो सोनिया गांधी को केंद्र में रखकर लिखी गई है. नाम है-सोनिया गांधी, एन एक्सट्रा ऑर्डिनरी लाइफ, एन इंडियन डेस्टिनी, जिसे मैक्मिलन ने छापा है. इस किताब की प्रस्तावना रूस के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल गोर्वाचोव ने लिखी है. तीसरी किताब है-राहुल, जिसे लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे जतिन गांधी और वीनू संधू ने मिलकर लिखा है. राहुल और सोनिया पर लिखी किताबों को तो मैं पढ़ गया हूं, लेकिन इंदिरा गांधी की पॉलिटिकल बॉयोग्राफी अभी पढ़ नहीं पाया हूं. है भी काफी मोटी किताब, लेकिन मुझे लगता है कि चौथी दुनिया के अपने इस स्तंभ में तीनों के जीवन पर लिखी गई किताबों पर समीक्षात्मक टिप्पणी ज़रूर करूंगा. इसकी शुरुआत राहुल पर लिखी जतिन गांधी और वीनू संधू की किताब से, जिसे पेंग्विन बुक्स नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है. यह किताब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों के पहले प्रकाशित हो चुकी थी.

राहुल गांधी स़िर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरी बीट हैं, जिसे एक रिपोर्टर को उसी तरह कवर करना चाहिए, जैसे वह अपनी बीट कवर करता है. दो हज़ार पांच में स्टार न्यूज़ के  न्यूज़ डायरेक्टर उदय शंकर ने यह बात राहुल गांधी पर किताब लिखने वाले जतिन गांधी से कही थी. इसका जिक्र जतिन गांधी और वीनू संधू की नई किताब-राहुल में है. हो सकता है कि उस व़क्त उदय शंकर की बात सही नहीं लगी हो, लेकिन कालांतर में यह बात सच साबित होती नज़र आ रही है. कई ख़बरिया चैनलों में स़िर्फ राहुल गांधी को कवर करने की ज़िम्मेदारी संवाददाताओं की है. जतिन गांधी और वीनू संधू दोनों पेशे से पत्रकार हैं और उन्होंने संयुक्त रूप से राहुल गांधी को केंद्र में रखकर यह किताब लिखी है. दावा किया गया है कि यह राहुल गांधी की पहली प्रामाणिक जीवनी है. ध्यान रहे अधिकृत नहीं. लेखकों का दावा है कि यह राहुल गांधी की योजनाओं और उनकी उम्मीदों का विश्लेषण नहीं है, लेकिन कई जगह इस बात को परखने की कोशिश की गई है कि राहुल गांधी भारतीय राजनीति में किन वजहों से हैं और एक आम भारतीय नागरिक पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा. यह बात जुदा है कि इस परख में कई जगह असफलताएं भी हाथ लगी हैं. जतिन और वीनू की इस किताब को पढ़ने के बाद लगता है कि यह समग्रता में राहुल गांधी की प्रामाणिक जीवनी नहीं है. इसमें दो हज़ार चार से लेकर अब तक के उनके कामों और भाषणों को आधार बनाकर उसे ऐतिहासिक हालात के मद्देनज़र देखा गया है. इस पूरी किताब को लेखकों ने दस अध्यायों में बांटा है.

तक़रीबन बत्तीस पृष्ठों के इंट्रोडक्शन में इस बात को स्थापित करने की कोशिश की गई है कि राहुल गांधी भले ही भारतीय राजनीति में वंशवाद के प्रतीक हैं, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से एक मुक़ाम हासिल किया है. लेखकद्वय ने इसके लिए काफी जगहों पर इंदिरा गांधी का सहारा लिया है. जैसे एक जगह वे प्रसंगवश लिखते हैं कि 1966 में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं तो समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने उन्हें गूंगी गुड़िया कहा था, जिसे बाद में इंदिरा गांधी ने ग़लत साबित किया और भारतीय राजनीति की आयरन लेडी के नाम से मशहूर हुईं. इस तरह के कई प्रसंग इस किताब में हैं, जहां बहुत ही स्मार्ट तरीक़े से लेखकद्वय ने ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर राहुल गांधी का गुणगान किया है, बग़ैर अपनी तऱफ से कोई बात कहे. होता यह है कि जब आपको अपनी बात कहनी हो और उससे ख़ुद को बचाना भी तो आप दूसरों के सहारे अपनी बात कहते हैं और निर्णय पाठकों पर छोड़ते चलते हैं. जतिन की इस किताब में इस तकनीक का ख़ूब इस्तेमाल हुआ है. पहले अध्याय में लेखकद्वय ने गांधी परिवार में हुई मौत और उसके संदर्भ में परिवार के राजनीति में आने को परखा है. उस अध्याय में स़िर्फ उपलब्ध दस्तावेजों और साक्षात्कारों के आधार पर अब तक ज्ञात बातों को इकट्ठा किया है. दरअसल यह बात पूरी किताब पर लागू होती है. सोनिया टू राहुल वाया प्रियंका में भी यही हुआ है. यहां भी तारीख़ दर तारीख़ घटनाओं का उल्लेख है और जहां भी लेखकद्वय को लगता है कि विवरण ज़्यादा हो रहा है, वहीं पर विवरणों से हटकर वे कोई प्रसंग डालकर एकरसता ख़त्म करने का प्रयास करते हैं, लेकिन वापस उसी रास्ते पर चल निकलते हैं, जिससे एकरसता बोझिलता में तब्दील हो जाती है. राहुल के बाद प्रियंका गांधी के  राजनीति में आने की बहुत बातें होती थीं, होती हैं और जब तक प्रियंका सक्रिय राजनीति में नहीं आ जाती हैं, तब तक ये बातें होती रहेंगी. सोनिया टू राहुल वाया प्रियंका नामक अध्याय में लेखकद्वय ने इस बात को पारिवारिक संदर्भों में भी परखा है.

राजीव गांधी से जब किसी ने यह पूछा था कि आपके दोनों बच्चों में राजनीति के लिए कौन ज़्यादा बेहतर है तो उन्होंने कहा था, हर भाई-बहन की तरह दोनों में कई समानताएं हैं, लेकिन प्रियंका में ज़बरदस्त इच्छाशक्ति है, जबकि राहुल गांधी ज़्यादा संवेदनशील हैं. अब इस बात के कई मायने निकाले जा सकते हैं, लेकिन लेखक यहां सिर्फ राजीव गांधी के हवाले से अपनी बात कहकर निकल लेते हैं. यह पूरी किताब कमोबेश इस दोष का शिकार है, जहां कि सारी स्थितियां सामने रख दी जाती हैं और निर्णय पाठकों पर छोड़ दिया जाता है. पत्रकारिता में तो यह शैली ठीक कही जा सकती है, लेकिन जब आप किताब लिखने बैठेंगे और उसके प्रामाणिक होने का दावा भी करेंगे तो आपको उसमें अपनी राय रखने का ख़तरा उठाना पड़ता है, नहीं तो गंभीरता नहीं बन पाती है. जहां भी लेखकद्वय ने अपनी राय रखी है, वह राहुल की प्रशंसा में ही रखी है, जैसे बिल्डिंग ब्रांड राहुल में उन्होंने लिखा है कि समय के साथ राहुल गांधी का कांफिडेंस बढ़ा है और अपनी बात को वजन देने के लिए मैल्कम ग्लैडवेल की मशहूर उक्ति का सहारा लिया है कि अगर आप चमकना चाहते हैं तो दस हज़ार घंटे अपनी कुशाग्रता को मांजने में ख़र्च करें. लेखकद्वय का मानना है कि राहुल गांधी ने ऐसा किया और वह उसमें सफल भी रहे और ब्रांड राहुल की अब एक ऐसी गंभीर छवि बनी है, जो भारत को आगे बढ़ाने के लिए कटिबद्ध है. यहां लेखक अगर देश को आगे ले जाने के राहुल गांधी के विजन का जिक्र कर देते तो उनकी राय में वजन आ जाता. इस किताब में कई जगह राहुल गांधी की योजनाओं का विस्तार से जिक्र किया गया है, जैसे युवा कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करने के राहुल गांधी के प्रयासों को तफसील से तवज्जो दी गई है. कुल मिलाकर अगर हम देखें तो यह राहुल गांधी की प्रामाणिक जीवनी न होकर, घटनाओं का एक ऐसा कोलाज है, जिसके केंद्र में राहुल तो हैं, लेकिन परिधि पर की घटनाएं कई बार केंद्र को दबा देती हैं. नतीजा यह होता है कि परिधि की परिस्थितियों के सामने केंद्र का व्यक्ति गौण हो जाता है.

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