बजट किसके लिए है

ऐसा कहा जाता है कि प्रसिद्ध अभिनेत्री सराह बेमहर्ड जब डिक्शनरी भी पढ़ती थीं तो लोगों की आंखों में आंसू ला देती थीं. प्रणव मुखर्जी भी इसके का़फी क़रीब नज़र आए, जब उन्होंने सर्विस टैक्स के लिए नकारात्मक सूची वाले क्षेत्रों को पढ़ना शुरू किया. वित्त मंत्री को यह नकारात्मक सूची क्यों पढ़नी चाहिए, यह एक रहस्य है. कहा जा सकता है कि यह समय गुज़ारने का एक तरीक़ा था, क्योंकि आगे का बजटीय भाषण भी इससे ज़्यादा रुचिकर नहीं था. यदि वह ज़्यादा रुचिकर होता तो वित्त मंत्री नकारात्मक सूची पर इतना समय न देते. बजट को न्यायसंगत साबित करने के लिए इस छोटे मुद्दे को बड़ा करके दिखाना ज़रूरी हो गया था. पिछले साल कहा गया था कि अगले साल विकास दर 8.5 प्रतिशत होगी, लेकिन वास्तव में यह 6.9 प्रतिशत रही. पिछले एक साल से महंगाई दर लगातार दोहरे अंक के आसपास रही है और अभी भी यह 7 प्रतिशत के क़रीब है. इसी तरह बजट घाटा घटाकर 4.6 प्रतिशत करना था, लेकिन यह 5.9 प्रतिशत रहा. 2012-13 के लिए यह 5.1 प्रतिशत तय किया गया है, जबकि बजट इस बात का विश्वास नहीं दिलाता है कि इस स्तर की प्राप्ति के लिए कुछ विशेष किया जाएगा. इसका कारण साफ है कि सरकार इस बात के लिए अधिक चिंतित है कि उसके सहयोगी दल कहीं नाराज़ न हो जाएं.

आम बजट से दो दिन पहले रेल बजट पेश किया गया. इस बजट में यात्री किराए में वृद्धि की गई. दस वर्षों के बाद यात्री किराए में वृद्धि की गई है. रेल मंत्री के इस फैसले ने तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी को दु:खी कर दिया, जो रेल मंत्रालय को अपनी जागीर समझती हैं. उनके चुने हुए रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने कहा कि उन्होंने रेलवे को घाटे से उबारा है. ऐसा कहकर उन्होंने अपनी कुर्सी के लिए खतरा मोल ले लिया. तृणमूल कांग्रेस का उत्तर साफ था. टीएमसी यात्री किराया कम करने के लिए यूपीए सरकार पर दबाव डाल रही है. दिनेश त्रिवेदी का हश्र आपके सामने है. रणनीति सफल हो सकती है. हो सकता है, यूपीए-2 सरकार मई 2014 तक किसी तरह बची रहे, लेकिन यह कहा जा सकता है कि इस नीति से सरकार जीडीपी विकास दर को सात प्रतिशत के स्तर पर भी बनाए रख पाए, ऐसा मुश्किल है. इससे ज़्यादा होने की उम्मीद करना बेमानी होगा. सरकार का अनुमान 7.6 प्रतिशत का है, जिसमें 0.25 प्रतिशत अधिक या कम हो सकता है. सरकार महंगाई पर क़ाबू पाने के लिए भी कोई कारगर नीति नहीं बना पा रही है. घाटे के इस स्तर के बाद कोई कारण नहीं है कि आरबीआई को अपनी ब्याज़ दर क्यों घटानी चाहिए.

देश में जिस बात पर बहस की ज़रूरत है, वह है विभिन्न क्षेत्रों को दी जा रही सब्सिडी. इसकी ज़रूरत है या नहीं, इस पर बहस होनी चाहिए, लेकिन बजट में इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया, क्योंकि सभी दलों का इस पर एक ही रवैया होता है. वे इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं. अगर भारत को खाद्य सुरक्षा योजना सफल बनानी है तो सबसे पहले उसे उर्वरक और डीजल पर सब्सिडी समाप्त करनी होगी. इसके अलावा कर छूट पर भी बहस होनी चाहिए. ग़रीबों पर बोझ बढ़ाकर अमीरों को कर छूट देना किसी तरह न्यायसंगत नहीं है. उदार आर्थिक सुधार पैकेज प्रगतिशील एवं समावेशी हो सकता है और होना भी चाहिए. इस पर कड़ा क़दम उठाना चाहिए, न कि लोकप्रिय फैसले लेने चाहिए. भारतीय राजनीतिक दल लोकप्रिय फैसले लेते हैं, जबकि राष्ट्र हित में हमेशा लोकप्रिय नहीं, बल्कि सही और कड़वे ़फैसले भी लेने पड़ते हैं. भारत में कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है, जो ऐसी आर्थिक नीति बना सके, जिससे देश को आगे बढ़ाया जा सके. जब लोकसभा में कुछ योजनाओं के खर्च में बढ़ोत्तरी की गई तो सभी सांसदों ने मेज़ें थपथपा कर इसका स्वागत किया.

सभी राजनीतिक दल और नेता यह दावा करना चाहते हैं कि वे अपने मतदाताओं को मुफ्त में भोजन दे सकते हैं, लेकिन शायद उन्हें यह पता नहीं कि आम जनता वास्तविक दुनिया में रहती है, न कि उनकी तरह लुटियंस के बंगले में. वह जानती है कि उसे कुछ भी खरीदने के लिए बढ़ती दरों का सामना करना पड़ता है. भारतीय राजनीतिक दल लोगों के साथ छल करते हैं. उन्हें पता है कि रेल भाड़ा कम करके लोगों को खुश किया जा सकता है, जबकि कई छुपे हुए कर लगाकर उनकी जेब से पैसा खींचा जा सकता है जिसका सामान्य लोगों को पता भी नहीं चलता. नेताओं को अपने आपको अर्थव्यवस्था की सच्चाई से रूबरू कराना होगा, ताकि उनके मतदाताओं को जीवित रहने के लिए जिन चीज़ों की आवश्यकता प्रतिदिन होती है, वे सस्ती एवं खरीदने योग्य हो सकें. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत कल्याणकारी राज्य के दायित्वों का निर्वहन तभी कर सकता है, जबकि देश की विकास दर उच्च हो, सब्सिडी कम हो और कम से कम छूट के साथ एक प्रगतिशील कर प्रणाली हो. यूपीए-2 सरकार ने ऐसा नहीं किया है. क्या यूपीए या एनडीए की अगली गठबंधन सरकार ऐसा कर पाएगी? अब इंतज़ार है, अगली गठबंधन सरकार और उसकी नीतियों का.

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