जल संसाधन मंत्रालयः एनपीसीसी में यह क्‍या हो रहा है

जल, थल और नभ, भ्रष्टाचार के कैंसर ने किसी को नहीं छोड़ा. जहां उंगली रख दीजिए, वहीं भ्रष्टाचार का जिन्न निकल आता है. बड़े घोटालों की बात अलग है. ऐसे सरकारी संगठन भी हैं, जिनके बारे में अमूमन आम आदमी नहीं जानता और इसी का फायदा उठाकर वहां के बड़े अधिकारी वह सब कुछ कर रहे हैं, जिसे संस्थागत भ्रष्टाचार की श्रेणी में आसानी से रखा जा सकता है. ऐसा ही एक मामला है एनपीसीसी का. पेश है चौथी दुनिया की ख़ास रिपोर्ट :-

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वर्ष 1957 में नेशनल प्रोजेक्ट कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनपीसीसी) की स्थापना की थी. इसे स्थापित करने का मुख्य लक्ष्य था देश के सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों में जहां निजी कंपनियां नहीं जाती हैं, वहां निर्माण कार्य करना. एनपीसीसी ने अपने स्थापना काल से मौजूदा समय तक देश में कई बड़ी योजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा किया, लेकिन सच्चाई यह भी है कि एनपीसीसी का विवादों से भी पुराना नाता रहा है. मामला चाहे ताज कॉरिडोर के निर्माण का हो या किसी अन्य परियोजना का. देश में जब पंचम वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हुईं तो केंद्रीय कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु 58 साल से बढ़ाकर 60 साल करने का प्रस्ताव दिया गया था. 12 मई, 1998 को डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक इंटरप्राइजेज ने कैबिनेट मीटिंग में यह निर्णय लिया कि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को भी इसका लाभ मिले. इस फैसले के बाद एनपीसीसी ने अपने सभी वर्गों के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु 58 साल से 60 साल कर दी. हालांकि सरकार को यह महसूस हुआ कि इस निर्णय से देश की कमज़ोर कंपनियों के ऊपर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा. इसलिए उसने निर्णय लिया कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां इस निर्णय की पुन: समीक्षा करें. चौथी दुनिया की तहक़ीकात में यह पता चला कि 19 जनवरी, 2007 को पीएसईबी (पब्लिक इंटरप्राइजेज सेलेक्शन बोर्ड) ने एनपीसीसी में डायरेक्टर इंजीनियरिंग पद के लिए एक विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसके जॉब डिस्क्रिप्शन में यह लिखा गया था कि सेवानिवृत्ति की आयु 60 साल होगी. उसके बाद 23 मार्च, 2007 को जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार ने पीईएसबी को सूचित किया कि एनपीसीसी में डायरेक्टर के लिए रिटायरमेंट की उम्र 58 साल है. लिहाज़ा उसने इसमें आवश्यक सुधार करने का अनुरोध किया. यह सूचना प्राप्त होने के बाद पीईएसबी ने इंटरनल नोट अग्रसारित किया, जिसमें उसने बताया कि मंत्रालय ने यह सूचना दी है कि सेवानिवृत्ति की आयु 60 साल की जगह 58 साल की जाए. 26 मार्च, 2007 को जल संसाधन मंत्रालय ने एक ओ एम (ऑफिस मेमोरेंडम) 9/4/2006-पीएसयू/277 पीईएसबी को भेजा, जिसमें बताया गया कि जॉब डिस्क्रिप्शन में सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष की जगह 58 वर्ष की जाए. 30 मार्च, 2007 को पीईएसबी ने जल संसाधन मंत्रालय की बात मानते हुए एक रिवाइज्ड (पुनरीक्षित) विज्ञापन निकाला, जिसमें 19 जनवरी, 2007 का विज्ञापन निरस्त कर दिया गया. इस नए विज्ञापन, संख्या 7/5/2007-पीईएसबी, 30 मार्च, 2007 में सेवानिवृत्ति की आयु 58 साल निर्धारित की गई. उसके बाद 29 और 30 मई 2007 को पीईएसबी ने डायरेक्टर इंजीनियरिंग पद का साक्षात्कार आयोजित किया, जिसमें ए के झांब का नाम शॉर्टलिस्ट कर जॉब डिस्क्रिप्शन के साथ सचिव जल संसाधन मंत्रालय और अतिरिक्त सचिव एवं इस्टेवलिपमेंट ऑफीसर डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) को एसीसी एप्रूवल हासिल करने के लिए भेजा. उसके बाद 19 अगस्त, 2010 को चीफ मैनेजर (एच आर) ने एक प्रपोजल झांब के टेन्योर को एक्सटेंड करने के संबंध में अवर सचिव (जल संसाधन मंत्रालय) को 58 साल के बाद 2 साल सेवा विस्तार हेतु भेजा. ग़ौरतलब है कि इस पत्र को ए के झांब ने ही एप्रूव किया. उसके बाद जल संसाधन मंत्रालय ने अपनी सिफारिश पीईएसबी को भेज दी. उसके बाद  9 दिसंबर, 2010 और 5 जनवरी, 2011 को मंत्रालय ने पीईएसबी से ए के झांब का सेवा विस्तार करने हेतु पत्र भेजा, जिसका पत्रांक-9/1/2005/पीएसयू-1473, दिनांक 19.12.2010 और 9.1.2005-पीएसयू/18, दिनांक 5.1.2011 है. उसके बाद पीईएसबी ने इस विषय पर 19 जनवरी, 2011 को विमर्श किया, जिसमें सचिव, जल संसाधन मंत्रालय ने ए के झांब का पक्ष रखा, लेकिन पीईएसबी ने स्पेशल परफॉर्मेंस रिपोर्ट (एसपीआर) देखने के बाद पाया कि ए के झांब का प्रदर्शन उसके मानदंडों के अनुसार सेवा विस्तार के लिए कम है. इसके अलावा पीईएसबी ने यह भी लिखा कि उनकी सेवा अवधि स़िर्फ एक साल बाक़ी है. ग़ौरतलब है कि ए के झांब की जन्मतिथि 11 मार्च, 1953 है. बहरहाल, पीईएसबी बोर्ड ने यह पाया कि उनके सेवा विस्तार के प्रस्ताव की संस्तुति न की जाए, क्योंकि एनपीसीसी में उनकी कोई ख़ास उपलब्धियां नहीं हैं, जिस वजह से उनका सेवा विस्तार किया जाए. इसलिए पीईएसबी बोर्ड ने 31 मार्च, 2011 के बाद से उनके सेवा विस्तार की सिफारिश नहीं की. उसके बाद पीईएसबी ने 20 जनवरी, 2011 को इस विषय की जानकारी सेक्रेट्री जल संसाधन मंत्रालय को पीईएसबी यू ओ नं.-9/48/2010-पीईएसबी, दिनांक 20.1.2011 को भेज दिया. जब ए के झांब को यह ज्ञात हुआ कि पीईएसबी ने उनके सेवा विस्तार के मामले को अग्रसारित नहीं किया है, तब उन्होंने पुन: 28 जनवरी, 2011 को एक पत्र सचिव जल संसाधन विभाग को भेजा, जिसमें उन्होंने यह कहा कि एनपीसीसी में बोर्ड स्तर के अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की आयु 60 साल है, न कि 58 साल.

उल्लेखनीय है कि ए के झांब ने अपने सेवा विस्तार का प्रस्ताव 19 अगस्त, 2010 को अवर सचिव, जल संसाधन मंत्रालय को भिजवाया था, जिसे उन्होंने ख़ुद एप्रूव किया था. ख़ैर, 28 जनवरी, 2011 को झांब द्वारा लिखे गए पत्र पर जल संसाधन मंत्रालय ने पुन: ग़ौर किया. जबकि पीईएसबी ने जल संसाधन मंत्रालय की सिफारिश 20 जनवरी, 2011 को नामंजूर कर दी थी. 14 फरवरी, 2011 को यह तय पाया गया कि ए के झांब का यह पत्र डीपीई को भेजा जाए और 17 फरवरी, 2011 को इस आशय का ड्राफ्ट भी बनाया गया. हालांकि ज्वाइंट सेक्रेट्री वॉटर रिसोर्स ने कहा, एडिशनल सेक्रेट्री हेड डिजायर टू गिव सम रिवाइज्ड इंस्ट्रक्शन, द फाइल इज अकार्डिंगली पुट अप. उसके बाद एडिशनल सेक्रेट्री वॉटर रिसोर्स ने लिखा कि सचिव जल संसाधन मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श हुआ और यह पाया गया कि इस मामले का जल संसाधन मंत्रालय में ही पुनरीक्षण किया जाए, क्योंकि इस मामले से जुड़े दस्तावेज़ मंत्रालय में ही उपलब्ध हैं. हालांकि उनकी यह दलील समझ से परे है और कई संदेह पैदा करने वाली है. इस तरह का मामला डीपीई के पास ज़रूर भेजना चाहिए था. बहरहाल, 10 मार्च, 2011 को एडिशनल सेक्रेट्री मिनिस्ट्री ऑफ वॉटर रिसोर्स ने एक नोट बनाया, जिसमें लिखा कि रिकॉर्ड के अनुसार यह निष्कर्ष निकलता है कि एनपीसीसी बोर्ड स्तर में सेवानिवृत्ति की आयु कभी नहीं बदली गई. इस नोट को तत्कालीन जल संसाधन मंत्री ने भी अपनी सहमति दी थी. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एडिशनल सेक्रेट्री, सेक्रेट्री और जल संसाधन मंत्री ने 10 मार्च, 2011 को इस नोट पर हस्ताक्षर किए थे. उल्लेखनीय है कि जल संसाधन मंत्रालय ने ए के झांब (डायरेक्टर इंजीनियरिंग) को सीएमडी (एनपीसीसी) का अतिरिक्त प्रभार 2 दिसंबर, 2011 को तीन महीने के लिए दिया, जबकि इस बारे में विजिलेंस क्लीयरेंस भी सीवीसी से नहीं लिया गया और न ही डीओपीटी (एसीसी) से इस बारे में एप्रूवल लिया गया. इतना ही नहीं, ए के झांब को पुन: तीन महीने का अतिरिक्त कार्यभार 2 मार्च, 2012 को मिला. ऐसे में सवाल यह है कि किस वजह से उनका सेवा विस्तार किया जा रहा है, उसके बारे में पूरी तरह पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जा रही है.

अल्पसंख्यक होने का एहसास कराया : एस आर हुसैन

सैयद रज़ा हुसैन, उम्र लगभग 50 साल, जो एनपीसीसी में असिस्टेंट इंजीनियर (सिविल) के पद पर वर्ष 1983 से कार्यरत थे, ने चौथी दुनिया को अपनी आपबीती सुनाते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने एनपीसीसी में चल रहे गोरखधंधे और भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आवाज़ उठाई, जिस वजह से उन्हें 8 अगस्त, 2011 को बर्खास्त कर दिया गया. बर्खास्तगी के शिकार हुए सैयद रज़ा हुसैन एनपीसीसी स्टॉफ एसोसिएशन के जनरल सेक्रेट्री भी हैं. उनका कहना है कि यूनियन में वह अभी तक बने हुए हैं. बतौर महासचिव हुसैन ने एनपीसीसी में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने का प्रयास किया. हुसैन का कहना है कि विभाग ने मेरे ख़िला़फ जो चार्जशीट जारी की है, उसमें कहा गया है कि मैंने स्टॉफ यूनियन की आड़ में एनपीसीसी का नाम बदनाम किया है. हुसैन का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लिहाज़ा यहां के नागरिकों को अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी है. क्या सच कहना और भ्रष्टाचार के ख़िला़फ अपनी आवाज़ बुलंद करना गुनाह है. महीनों से वेतन से वंचित हुसैन का पूरा परिवार परेशान है. उनके तीन बच्चे हैं, जो पढ़ाई कर रहे हैं, बग़ैर पैसों के उनका गुजारा होना मुश्किल हो रहा है. ऐसी हालत में भी हुसैन ने अपनी हिम्मत नहीं हारी है. उनका कहना है कि वह एनपीसीसी की सच्चाई देश की जनता के सामने लाएंगे. उनके मुताबिक़, उन्होंने पूर्व में भी प्रधानमंत्री को इस बारे में कई पत्र लिखे और आगे भी उन्हें पत्र लिखकर जानकारी  देंगे. एनपीसीसी में वरीय अधिकारियों की मानवीय संवेदना किस तरह ख़त्म हो गई है, उसे विभाग में सहायक (कार्मिक व प्रशासनिक) के पद पर कार्यरत ख़ान ज़ियाउल्लाह ख़ान की आपबीती सुनकर समझा जा सकता है. वर्ष 2006 में उनका तबादला कॉरपोरेट ऑफिस नार्दन जोन में हुआ और अगस्त 2006 में उनका तबादला पुन: लखनऊ कर दिया गया. चार महीने के भीतर दोबारा तबादले का ऐसा प्रावधान समझ से परे है. ख़ान की मां और बहन मानसिक रोग से पीड़ित हैं. उनकी मां तो वर्षों से बिस्तर पर पड़ी हैं. नियमानुसार इस तरह के  रोगियों की देखभाल के दृष्टिकोण से उनके परिवारजनों, जो सरकारी सेवा में हैं, को मानवीय आधार पर परिवार से दूर नहीं भेजा जाता है. मां और बहन की उचित देखभाल हो, इसके लिए उन्होंने अपने वरीय अधिकारियों से विनती की, लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया गया. सबसे ज़्यादा तकली़फ विभाग के कार्यकारी निदेशक की उस बात से हुई, जिसमें उन्होंने ख़ान से कहा कि आप अल्पसंख्यक समुदाय से हैं, आपको मेरे पास नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक आयोग से विनती करनी चाहिए. उनकी बात सुनकर ऐसा लगा कि जैसे वह भारत में रहने वाले अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक होने का एहसास करा रहे हैं. हुसैन के अनुसार, वर्ष 2006 में ख़ान को डेंगू हो गया. उसके बाद उन्हें कई तरह की बीमारियों ने भी अपना शिकार बनाया. इतना ही नहीं, फरवरी 2007 में उनके छोटे भाई की मौत एक हादसे में हो गई, बावजूद इसके विभाग ने उनका बकाया भुगतान नहीं किया. ख़ान जियाउल ख़ान ने इस बाबत कंपनसेशन के लिए एक रिट-7298/2008 दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की है.

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

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