मुझे आपकी तऱफ से श्री राजनीति प्रसाद एवं प्रोफेसर रामकृपाल यादव द्वारा प्रेषित नोटिस प्राप्त हुए हैं, जिनमें मुझ पर यह आरोप लगाया गया है कि मैंने संसद का अपमान किया है. मैं इस बात का पूरी तरह से खंडन करता हूं कि मैंने अपने शब्दों या किसी कार्य से संसद का अपमान किया है. मैं संसद की बहुत इज़्ज़त करता हूं, संसद का बहुत सम्मान करता हूं, मैं संसद को जनतंत्र के मंदिर की तरह मानता हूं. इसीलिए मुझे अत्यधिक चिंता और दर्द है कि जनतंत्र के इस मंदिर को आएदिन अपने कृत्यों से अथवा अपने शब्दों से संसद के अंदर बैठे कुछ लोग अपमानित करते हैं. विभिन्न तथ्य और घटनाएं यह दर्शाती हैं कि संसद का अपमान संसद के बाहर के लोगों की बजाय संसद के अंदर बैठे कुछ लोग कर रहे हैं. मैं संसद का सम्मान करता हूं, कई अच्छे सांसदों का सम्मान भी करता हूं, पर कुछ सांसदों का सम्मान करने में असमर्थ हूं.
अभी हाल ही में एक फिल्म रिलीज़ हुई, जिसका नाम है पान सिंह तोमर. इस फिल्म में एक डायलॉग है-बीहड़ में बागी रहते हैं, डाकू तो संसद में रहते हैं. मैंने यह फिल्म तीन बार देखी. जब-जब हीरो यह डायलॉग बोलता है तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठता है. हर बार तालियां सुनकर बहुत पीड़ा हुई. ऐसा क्यों हुआ कि जब हीरो ने संसद में डाकुओं के होने की बात कही तो ऐसा लगा, मानो उसने इस देश की जनता के मन की बात कही हो. यह सोचने की बात है कि आख़िर ऐसा कैसे हुआ कि देश की जनता के मन में संसद में बैठे लोगों के लिए इतना गुस्सा और तिरस्कार है? संसद की ऐसी छवि बनाने के लिए कौन ज़िम्मेदार है-इस देश की जनता या संसद में बैठे लोग? सांसदों का सम्मान इस बात से नहीं घटता-बढ़ता कि उनके बारे में क्या कहा जाता है. उनका सम्मान उनके आचरण और व्यवहार से होता है.
आज लोकसभा के अंदर 162 ऐसे सांसद हैं, जिनके ऊपर 522 आपराधिक मामले दर्ज हैं. इनमें से 76 के ख़िला़फ संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं, 14 के ख़िला़फ हत्या के मामले दर्ज हैं, 20 के ख़िला़फ हत्या करने की कोशिश के मामले दर्ज हैं, 11 के ख़िला़फ ठगी के मामले दर्ज हैं और 13 के ख़िला़फ अपहरण के मामले दर्ज हैं. इसके अलावा कई सांसद ऐसे हैं, जिन पर समय- समय पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे हैं. जैसे-श्री सुरेश कलमाडी, श्री ए राजा, श्रीमती कनिमोझी, श्री लालू प्रसाद यादव, श्री मुलायम सिंह यादव इत्यादि. यदि जन लोकपाल क़ानून होता तो कुछ और सांसदों पर भी आरोप तय हो सकता था. अब आप ही बताइए, क्या ऐसे लोगों की मौजूदगी से संसद की गरिमा बढ़ती है या घटती है? इनमें कुछ लोग तो ऐसे हैं, जिन्हें आप शादी-विवाह, त्योहार में अपने घर बुलाने से भी कतराएं. क्या ऐसे लोगों के संसद में बैठने से संसद का अपमान नहीं होता?
लोकसभा में 162 ऐसे सांसद हैं, जिनके ख़िला़फ विभिन्न आपराधिक मामले लंबित हैं. अरविंद केजरीवाल द्वारा यह बयान दिए जाने के बाद लोकसभा एवं राज्यसभा के कुछ सदस्यों की ओर से उन्हें विशेषाधिकार हनन का नोटिस भेजा गया. अरविंद केजरीवाल ने 30 मार्च को इस नोटिस का जवाब संसद को भेजा. चौथी दुनिया के पास अरविंद केजरीवाल द्वारा भेजे गए जवाब की कॉपी है, जिसे यहां हू-ब-हू प्रकाशित किया जा रहा है.
आख़िर ऐसे लोगों को टिकट क्यों दी गई? सभी पार्टियां बढ़-चढ़कर आपराधिक पृष्ठभूमि वालों को टिकट दे रही हैं और हर आने वाले चुनाव में ऐसे लोगों की संख्या पिछले चुनावों से अधिक होती है. जैसे 2004 में हुए चुनाव में 128 लोग लोकसभा में आपराधिक पृष्ठभूमि के थे, 2009 के चुनाव में यह संख्या बढ़ कर 162 हो गई. इस गति से वह दिन दूर नहीं, जब संसद में आपराधिक छवि के लोगों की संख्या बहुमत में होगी. तो जब किसी फिल्म के हीरो के यह कहने पर कि डाकू तो संसद में रहते हैं, लोग तालियां बजाते हैं, तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
संसद को इस हालत में पहुंचाने के लिए सभी पार्टियां ज़िम्मेदार हैं. 2009 में कांग्रेस ने आपराधिक छवि के 117 लोगों को टिकट दिया, जिनमें 44 लोग चुनकर आ गए. अन्य सभी पार्टियों ने भी बढ़-चढ़कर दागियों को टिकट दिया. इनमें कई लोग ऐसे हैं, जिन पर कोर्ट ने संगीन अपराधों के आरोप तय किए हैं. आख़िर इन पार्टियों ने ऐसे लोगों को टिकट क्यों दिया? इन पार्टियों की ऐसी क्या मजबूरी थी? क्या इन पार्टियों ने ऐसे लोगों को टिकट देकर संसद का घोर अपमान नहीं किया? क्या इन पार्टियों को संसद का अपमान करने के लिए दंड नहीं दिया जाना चाहिए?
कहा जा रहा है कि अभी तो इन सब पर आरोप हैं. कोर्ट में सभी आरोप सिद्ध नहीं हुए. अभी मामले चल रहे हैं. इस पर मेरा कहना है कि ये मामले तो कभी ख़त्म होंगे ही नहीं. एक मामला निपटने में इस देश में तीस साल से ज़्यादा समय लग जाता है. हमारे देश की न्याय व्यवस्था इतनी सुस्त और ढीली क्यों है? इसे दुरुस्त करने का काम भी तो सांसदों का ही था. सांसदों ने 65 साल में इसे दुरुस्त क्यों नहीं किया? क्या जानबूझ कर नहीं किया? क्योंकि अगर न्याय व्यवस्था को दुरुस्त कर देते और ये सभी मामले जल्द निपट जाते तो क्या यह सच नहीं कि इनमें से कई लोग जेल चले जाते? ऐसे में क्या इस शक को बल नहीं मिलता कि जब तक ऐसे लोग संसद में बैठे हैं, तब तक हमारे देश की न्याय व्यवस्था दुरुस्त होगी ही नहीं? क्या इस शक को बल नहीं मिलता कि जब तक ऐसे लोग संसद में बैठे हैं, तब तक इस देश से अपराध कम नहीं होगा? आप ही बताइए कि ऐसे सांसदों का मैं सम्मान कैसे करूं? यह कहना ठीक है कि इन लोगों पर अभी आरोप हैं. आरोप अभी सिद्ध नहीं हुए. मामले अभी लंबित हैं. ऐसा हो सकता है कि बीस साल बाद जब कोर्ट का निर्णय आए तो ये सभी निर्दोष पाए जाएं. लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि बीस साल के बाद जब कोर्ट का आदेश आए तो इनमें से कई लोग दोषी पाए जाएं. अगर ऐसा होता है तो क्या यह अत्यंत चिंता का विषय नहीं है कि इतने वर्षों तक हमारी संसद में ऐसे हत्यारे, ठग और अपहरणकर्ता देश के क़ानून बनाते रहे? आप कहते हैं कि मैंने संसद का अपमान किया है. मैं संसद का बहुत सम्मान करता हूं, पर आप ही बताइए कि ऐसे सांसदों का सम्मान कैसे करूं?
एक वह संसद भी थी, जिसमें श्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक ट्रेन दुर्घटना होने पर अपना इस्ती़फा दे दिया था. ऐसी संसद के लिए सब कुछ क़ुर्बान करने को मन करता है. लेकिन जो संसद आज है, उसका सम्मान कैसे करूं?
29 दिसंबर, 2011 को संसद में लोकपाल बिल की चर्चा के दौरान राष्ट्रीय जनता दल के सांसद श्री राजनीति प्रसाद जी ने मंत्री महोदय के हाथ से लोकपाल बिल छीनकर फाड़कर फेंक दिया. क्या इससे संसद अपमानित नहीं हुई? हम यदि संसद को जनतंत्र का मंदिर मानते हैं तो क्या मंदिर में गीता फाड़ने से भगवान का अपमान नहीं होता? हद तो तब हुई, जब एक भी सांसद ने खड़े होकर बिल को फाड़ने का विरोध नहीं किया. सभी सांसद मौन थे. संसद अध्यक्ष भी मौन थे. संसद के सम्मान की दुहाई देने वाले आख़िर मौन क्यों थे? ऐसा पहली बार नहीं हुआ. इस जनतंत्र के मंदिर में कई बार पहले भी बिल फाड़े जा चुके हैं, लेकिन कभी किसी को सज़ा नहीं दी गई.
क्या आपको नहीं लगता कि श्री राजनीति प्रसाद जी को संसद के अंदर बिल फाड़ने के लिए सख्त से सख्त सज़ा दी जाए. ऐसी सज़ा दी जाए कि भविष्य में कोई सांसद संसद के अंदर बिल फाड़ने की हिम्मत न कर सके. राज्यसभा में ऐसे कई उद्योगपति सांसद हैं, जिनका जनता या जनसेवा से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. कई ऐसे उद्योगपति पैसे के बल पर विभिन्न पार्टियों से टिकट लेकर संसद में आते हैं. ऐसे लोग अपने उद्योग को बढ़ावा देने के लिए संसद का दुरुपयोग करते हैं. जैसे श्री विजय माल्या जी किंगफिशर के मालिक हैं. उन्होंने जनसेवा का कोई कार्य किया हो, ऐसा सुनने में नहीं आया. वह संसद की नागरिक उड्डयन स्थायी समिति के सदस्य हैं. इस समिति में बैठकर वह देश की नागरिक उड्डयन नीति बनाते हैं. ज़ाहिर है कि वह ऐसी ही नीतियां बनाएंगे, जिनसे किंगफिशर एयरलाइंस को भरपूर फायदा हो. क्या यह सीधे-सीधे संसद का दुरुपयोग नहीं है? राज्यसभा में तो ऐसे ढेरों सांसद हैं, जो अपना उद्योग बढ़ाने के लिए संसद का सीधे-सीधे दुरुपयोग कर रहे हैं. क्या संसद का इस तरह से दुरुपयोग संसद का अपमान नहीं है?
संसद में रिश्वत लेकर प्रश्न पूछने का मामला सामने आया. यह तो संसद का सबसे घोर अपमान था, लेकिन ऐसे सांसदों को महज़ उनकी सदस्यता से बर्खास्त करके छोड़ दिया गया. रिश्वत लेना या देना आपराधिक मामला बनता है. अपराध सिद्ध होने पर तो ऐसे लोगों को जेल जाना चाहिए था. इनकी सदस्यता बर्खास्त की गई, इसका मतलब इनके ख़िला़फ मामला साबित हो गया था. फिर इन्हें जेल क्यों नहीं भेजा गया? केवल सदस्यता बर्खास्त करके क्यों छोड़ दिया? संसद के इतने घोर अपमान के लिए अगर उस व़क्त उन्हें सख्त से सख्त सज़ा दी गई होती तो भविष्य में कोई सांसद इस तरह संसद का अपमान करने की कोशिश नहीं करता. चूंकि उस व़क्त उन सांसदों को हल्की सज़ा देकर छोड़ दिया गया, इसलिए कुछ वर्ष बाद ही जुलाई 2008 में खुलेआम सांसदों की ख़रीद फरोख्त का मामला सामने आया. जनतंत्र के इस पवित्र मंदिर में जनता ने सांसदों को खुलेआम बिकते हुए देखा. सारे देश की आत्मा रो पड़ी, जनतंत्र रो पड़ा, संसद रो पड़ी, लेकिन सरकार बच गई. एक भी सांसद को अभी तक सज़ा नहीं मिली. क्या यह किसी देशद्रोह से कम था? क्या सांसदों को ख़रीदना और सांसदों का बिकना देशद्रोह से कम है? कैसे करूं ऐसे सांसदों की इज़्ज़त?
ऐसा कितनी बार हुआ है कि संसद के अंदर माइक उखाड़ कर फेंक दिए जाते हैं. कुर्सियां उठाकर एक-दूसरे पर फेंकी जाती हैं. कैसे करूं ऐसे सांसदों का सम्मान? एक तरफ तो 8 बिल 17 मिनट में बिना चर्चा के पास हो जाते हैं, दूसरी तऱफ आएदिन सांसदों के हो-हल्ला और शोरशराबे के कारण संसद का कामकाज़ ठप रहता है.
देश महंगाई और भ्रष्टाचार से जूझ रहा है. आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है. किसान आत्महत्या कर रहे हैं. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आवाज़ उठाने वालों के कत्ल हो रहे हैं. जनता कराह रही है. इन सारे मामलों पर या तो संसद मौन रही या संसद में भाषणों की राजनीति हुई. कई वर्षों से बनी हुई इन समस्याओं से जनता को आज तक निजात नहीं मिली. अमूमन इनमें से किसी भी समस्या पर संसद की आम सहमति नहीं हो पाती. मामले स्थायी समिति में लटकते रहते हैं. जनता कराहती रहती है.
लेकिन जब इन सांसदों से संबंधित मामला होता है तो तुरंत सभी पार्टियों में आम सहमति हो जाती है. इन्हीं में से एक सांसद श्री शरद पवार जी को किसी ने थप्पड़ मारा, (थप्पड़ मारना ग़लत था, थप्पड़ नहीं मारना चाहिए) तो सारे सांसद कराह उठे. सारी पार्टियों में आम सहमति थी. दो घंटे तक सभी नेताओं ने इसकी जमकर आलोचना की. जब-जब सांसदों के भत्ते, उनकी सुविधाएं बढ़ाने की बात होती है तो सभी सांसदों में तुरंत आम सहमति हो जाती है. चोर की दाढ़ी में तिनका यह मुहावरा कह देने भर से सारी पार्टियां एकजुट हो गईं. इस छोटे से मुहावरे ने सांसदों को इतना आहत कर दिया कि कई घंटों तक संसद में इस पर चर्चा हुई. तो मन में एक विचार आता है-क्या कुछ सांसद जनता की बजाय अपने स्वार्थ की ज़्यादा चिंता नहीं करते?
संसद के साथ-साथ विधानसभाएं भी जनतंत्र का मंदिर हैं. ऐसे मंदिर में कुछ विधायक और उस राज्य के महिला एवं बाल विकास मंत्री अगर बैठकर खुलेआम अश्लील फिल्म देखते हैं, तो आप ही बताइए, कैसे सम्मान करूं ऐसे विधायकों का? ऐसा नहीं कि इस संसद में अच्छे सांसद नहीं हैं. कई अच्छे सांसद भी हैं और मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं. पर ऐसे अच्छे सांसदों की आवाज़ें संसद के शोरशराबे में खोती जा रही हैं.
जिस कथन पर मुझे यह नोटिस दिया गया है, उस कथन में मैंने कुछ अहम प्रश्न उठाए हैं. जिस संविधान ने सांसदों को क़ानून बनाने का अधिकार दिया है, उसी संविधान ने जनता को सांसदों से प्रश्न पूछने का भी अधिकार दिया है. प्रश्न उठते हैं कि जिस संसद में आपराधिक छवि के इतने लोग हैं, क्या वह संसद अपराध को ख़त्म करने के लिए कभी सख्त क़ानून बना पाएगी? जिस संसद में कई ऐसे लोग हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, क्या ऐसे में यह संसद भ्रष्टाचार के ख़िला़फ सख्त क़ानून बना पाएगी, जिसके लागू होने से कुछ सांसदों के लिए ही परेशानी खड़ी हो जाए? जन लोकपाल बिल आंदोलन के दौरान इस देश की जनता एक सशक्त क़ानून की मांग लेकर सड़क पर उतरी, लेकिन जब सरकार और संसद सशक्त क़ानून देने से कतराते नज़र आने लगे तो जनता ने ये प्रश्न पूछने चालू किए. जनता के मन में प्रश्न है कि क्या जन लोकपाल बिल आएगा?
इन बातों से साफ ज़ाहिर है कि संसद का अपमान मैंने नहीं, बल्कि संसद के भीतर बैठने वाले कुछ लोग लगातार कर रहे हैं, जिन पर विश्वास करके इस देश की जनता ने जिन्हें अपना भविष्य सौंपा था. मैंने जो कुछ भी कहा, वे सिर्फ तथ्य थे. मैंने कुछ भी ग़लत नहीं कहा. मैंने तो स़िर्फ जनता के प्रश्नों को उठाया है. यदि आपके क़ानून की नज़रों में मैं दोषी हूं तो मैं उस क़ानून के तहत सज़ा भुगतने के लिए तैयार हूं. यदि आप मुझे अपने क़ानून के तहत दोषी पाएं तो मेरा आपसे निवेदन है कि सज़ा सुनाने से पहले मुझे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपनी बात कहने का मौक़ा ज़रूर मिलना चाहिए.
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मेरा यह अनुरोध है की देश मे भ्रष्टाचार क्या है उसकी परिभाषा और व्याख्या सबसे पहले हो जानी चाहिए. अन्यथा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कदापि नहीं लड़ी जा सकती है. नौकरीशाही के खिलाफ किये गए भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए पहले से ही इप्क के साथ -साथ ब्र्हश्ताचार निवारण अधिनियम तथा सुचना अधिकार कानून में विस्तृत प्रावधान है, लेकिन इसक बावजूद भ्रष्टाचार खूब फैला है. जन लोक पल से भ्रष्टाचार और मजबूत होगा यदी इएसपर गंभीरता से विचार नहीं किया गया.