पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी भारत आए. यह उनकी निजी यात्रा थी. वह मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जियारत करने के लिए भारत आए थे, लेकिन उनकी इस निजी यात्रा को निजी नहीं रहने दिया गया. भारतीय प्रधानमंत्री का कहना था, हालांकि यह पाकिस्तानी राष्ट्रपति की निजी यात्रा है, लेकिन हमने इसका फायदा उठाया है. भारतीय प्रधानमंत्री ने ज़रदारी को लंच का निमंत्रण दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. ज़रदारी ने अपनी इस भारत यात्रा को भले ही निजी बताया है, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री के साथ चालीस मिनट की उनकी मुलाक़ात और दोनों के बीच विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के बाद इसे लंच डिप्लोमेसी या फिर जियारत डिप्लोमेसी कहा जाना ज़्यादा उचित प्रतीत होता है. भारतीय प्रधानमंत्री और पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने इस बातचीत को सकारात्मक बताया और यह भी कहा कि इससे दोनों देशों के आपसी संबंध सुधरेंगे. पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने मीडिया से कहा कि भारत और पाकिस्तान पड़ोसी मुल्क हैं और वह दोनों मुल्कों के बीच अच्छे संबंध चाहते हैं. ज़रदारी ने कहा कि मनमोहन सिंह के साथ उन सभी मुद्दों पर उनकी बातचीत हुई, जिन पर बातचीत की जा सकती है. भारतीय प्रधानमंत्री ने भी इस मुलाक़ात को संतोषजनक बताया और कहा कि उनके बीच कई द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत हुई. कुछ समय बाद विदेश सचिव ने दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत का ब्योरा मीडिया को दिया. उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय व्यापार, आतंकवाद की समस्या, सियाचिन, सरक्रीक और कश्मीर आदि मुद्दों पर चर्चा की. इस मुलाक़ात में मुंबई हमले से जुड़े हाफिज सईद का मुद्दा उठना लाज़िमी था. इस पर भी चर्चा की गई, लेकिन पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने इसे आगे के लिए टाल दिया. ज़रदारी का कहना था कि इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच और बातचीत किए जाने की आवश्यकता है. उन्होंने यह कहते हुए इस मुद्दे की गंभीरता खत्म कर दी कि आगे होने वाली गृह सचिव स्तरीय वार्ता के समय इस पर बातचीत की जाएगी. पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने भारतीय प्रधानमंत्री को पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया, जिसे उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया. हालांकि भारतीय प्रधानमंत्री के पाकिस्तान दौरे की तिथि अभी घोषित नहीं की गई है, लेकिन ज़रदारी की इस निजी यात्रा और उनके साथ छोटी सी मुलाक़ात के दौरान हुई बातचीत से भारतीय प्रधानमंत्री इतने ख़ुश हो गए कि उन्होंने पाकिस्तानी राष्ट्रपति का आमंत्रण स्वीकार कर लिया, जबकि इससे पहले कई मंचों पर पाकिस्तानी नेताओं से हुई बातचीत के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा था कि वह तब तक पाकिस्तान का दौरा नहीं करेंगे, जब तक मुंबई हमले के साजिशकर्ताओं को सज़ा नहीं दी जाती. आख़िर इस मुलाक़ात में ज़रदारी ने मनमोहन सिंह को ऐसा कौन सा आश्वासन दे दिया, जिससे वह पुरानी बातों को भूल गए या फिर जिसे सार्वजनिक करने की ज़रूरत उन्हें महसूस नहीं हुई. जहां तक हाफिज सईद का मामला है, वह तो वहीं का वहीं है. उस पर तो कोई विशेष बातचीत भी नहीं हुई. हो सकता है कि दोनों के बीच कोई ऐसी बातचीत हुई हो, जिसे सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन विदेश सचिव ने जो बताया, उसके आधार पर तो यही कहा जा सकता है कि ज़रदारी ने हाफिज सईद का मुद्दा टाल दिया.
अब प्रश्न यह उठता है कि दोनों नेताओं के बीच ऐसी कौन सी बातचीत हुई, जिसे भारतीय प्रधानमंत्री बहुत सकारात्मक कह रहे हैं और वह आसानी से संतुष्ट हो गए. क्या ज़रदारी ने कश्मीर के मुद्दे पर कोई ऐसा फॉर्मूला बता दिया, जिससे यह समस्या जल्दी ही ख़त्म होने वाली है. सरक्रीक और सियाचिन के विवादित मुद्दे पर दोनों के बीच कोई सहमति हुई हो, ऐसा भी विदेश सचिव की बातों से नहीं लगता. ज़रदारी ने कोई ऐसा आश्वासन तो दिया नहीं कि अब पाकिस्तान भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल चरमपंथी संगठनों को सहायता नहीं देगा या फिर पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकी शिविरों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करेगा. फिर इस ख़ुशी की वजह क्या है. क्या ख़ुशी की वजह भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए वार्ता जारी रखने का फैसला है या फिर भारतीय प्रधानमंत्री को पाकिस्तान आने का आमंत्रण. एक तऱफ तो मनमोहन सिंह यह कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ संबंध सुधरने के आसार नज़र आ रहे हैं, वहीं दूसरी तऱफ देश के रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट कुछ और बात कहती है. ज़रदारी की भारत यात्रा के महज़ एक दिन बाद आई रक्षा मंत्रालय की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को पाकिस्तान और चीन की सैन्य गतिविधियों पर नज़र रखनी होगी. पाकिस्तान और चीन द्वारा भारतीय सीमा पर जारी सैन्य गतिविधियां भारत के लिए चिंता का विषय हैं. ऐसे में भारत और पाकिस्तान के नेताओं के बीच हुई इस बातचीत को किस आधार पर सकारात्मक कहा जा सकता है. सकारात्मक तो तब कहा जाता, जबकि ज़रदारी ने हाफिद सईद की गिरफ्तारी की बात कही होती. जिस समय ज़रदारी भारत में थे, उस समय सईद पाकिस्तान में उनकी इस यात्रा की आलोचना कर रहा था. वह कह रहा था कि जो ताकत पाकिस्तान को तोड़ने की कोशिश कर रही है, वहां की यात्रा करना तो देश के लोगों को गुमराह करना है. दूसरी तऱफ पाकिस्तान के आला नेता कह रहे हैं कि हाफिज सईद पाकिस्तान में शांति का संदेश दे रहा है, न कि आतंकवाद को बढ़ावा. भारत के गृह मंत्रालय के पास इस बात के सुबूत हैं कि मुंबई हमले में सईद की अहम भूमिका रही है. ऐसे में ज़रदारी द्वारा हाफिज सईद के मुद्दे को यह कहते हुए कि इस पर गहन चर्चा की आवश्यकता है, ठंडे बस्ते में डाल देना कहां तक ख़ुशी का कारण हो सकता है, इसे समझने की ज़रूरत है.
इस यात्रा से एक सवाल और उठता है कि क्या भारत और पाकिस्तान के नेता सही मायनों में दोनों देश के बीच सुलह चाहते हैं? अगर ऐसा है तो फिर पिछले 65 सालों में दोनों के बीच संबंध सुधरने के बजाय बिगड़ क्यों गए? दोनों देशों के बीच युद्ध का माहौल क्यों बना रहता है? क्या दोनों देशों के नागरिक यह चाहते हैं कि उनके बीच तनातनी का माहौल रहे, जबकि इस स्थिति के कारण दोनों देशों को अरबों रुपये सैन्य या अन्य सुरक्षा संबंधी गतिविधियों पर ख़र्च करना पड़ते हैं, जिसके चलते दोनों देशों में महंगाई और ग़रीबी बढ़ती है. पाकिस्तान की स्थिति तो भारत से भी बदतर है. ऐसे में आम जनता को अपने जीवन स्तर में सुधार चाहिए या फिर दोनों देशों के बीच दुश्मनी. सामान्य सी बात है, अगर लोगों को ग़रीबी से निजात और दोनों देशों के बीच दुश्मनी में से किसी एक को चुनना पड़े तो वे ग़रीबी से निजात को ही चुनेंगे. फिर लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की बात का हवाला क्यों दिया जाता है. ऐसा लगता है, जैसे दोनों देशों के सामान्य लोग ही इस दुश्मनी के लिए ज़िम्मेदार हैं. भारत के लोग अगर पाकिस्तान का विरोध करते हैं तो उसका एकमात्र कारण पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से होने वाली परेशानियां हैं. उसी तरह पाकिस्तान के लोगों को कश्मीर का झांसा देकर बरगलाया जाता है, जिसके चलते वे भारत का विरोध करने के लिए तैयार हो जाते हैं. इससे फायदा न तो भारत के लोगों को होता है और न पाकिस्तान के लोगों को. लाभ होता है तो केवल दोनों देशों के राजनीतिक दलों और राजनेताओं को. विकास के मुद्दे से लोगों को भटकाने के लिए भारतीय राजनीतिक दल पाकिस्तान का मुद्दा उठाते हैं और पाकिस्तानी राजनीतिक दल या सैन्य तानाशाह भारत का मुद्दा उठाते हैं. दोनों देशों के बीच इस तनाव का फायदा कुछ विकसित देशों को होता है, जो ऐसा माहौल बनाए रखकर इन दोनों देशों में अपनी अहमियत बनाए रखना चाहते हैं. साथ ही वे इन दोनों देशों को एक-दूसरे का भय दिखाकर अरबों डॉलर के हथियार बेचते हैं. अमेरिका ने इसी तरह का भय रूस को लेकर यूरोप में भी फैलाया था. वह यूरोप को रूस का भय दिखाकर अपने साथ करने में कामयाब रहा और आज स्थिति यह है कि यूरोप के अधिकांश देशों की अपनी कोई विदेश नीति नहीं है, वे अमेरिका के पिछलग्गू बनकर रह गए हैं. वैसा ही भय का वातावरण भारत और पाकिस्तान के बीच बनाकर कुछ देश अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं.
पाकिस्तानी राष्ट्रपति की इस निजी यात्रा से एक सवाल यह भी उठता है कि क्या ज़रदारी को सचमुच ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के आशीर्वाद की ज़रूरत पड़ी या फिर यह भारत आने का एक बहाना था. ज़रदारी के साथ चालीस लोग थे, जिनमें कुछ मंत्री और नौकरशाह भी थे. भारत आने से पहले ज़रदारी ने प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी एवं सेना प्रमुख अशफाक परवेज कियानी से मुलाक़ात की, जिसमें उनकी भारत यात्रा पर चर्चा की गई. इस बैठक में पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार, गृह मंत्री रहमान मलिक एवं विदेश सचिव जलील अब्बास जिलानी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे. स्वाभाविक है कि इस बैठक में ज़रदारी की भारत यात्रा और भारतीय प्रधानमंत्री के साथ उनकी मुलाक़ात की चर्चा हुई होगी. यह भी तय हुआ होगा कि भारतीय प्रधानमंत्री के सवालों का जवाब किस तरह दिया जाए. ऐसे में यह यात्रा निजी कैसे कही जा सकती है, जिसमें दो देशों के सर्वोच्च नेताओं ने कई द्विपक्षीय मामलों पर चर्चा की. इसलिए यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आख़िर वह कौन सी ताक़त है, जो दोनों देशों के रिश्तों के बीच दीवार बनी हुई है. क्यों पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को भारतीय प्रधानमंत्री से मुलाक़ात करने के लिए कभी क्रिकेट तो कभी जियारत के सहारे की ज़रूरत पड़ती है. अगर दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने हैं तो साल में एक बार दोनों देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को एक-दूसरे से मिलना चाहिए और विवादित मुद्दों पर गहन विचार विमर्श करना चाहिए. बातचीत द्वारा ही विवाद ख़त्म हो सकता है, न कि एक-दूसरे पर कटाक्ष करके. परेशानी तो इस बात की है कि दोनों देशों के पास समस्या के समाधान के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव है. जिस दिन दृढ़ इच्छाशक्ति पैदा हो जाएगी, समस्याएं अपने आप ख़त्म हो जाएंगी.
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