दिल्‍ली का बाबूः वित्त मंत्रालय के बाबू

वित्त मंत्रालय में कुछ नई चीज़ें हो रही हैं. अकसर देखा जाता है कि जो अधिकारी किसी मंत्री या सरकार के नज़दीकी होते हैं या फिर उनके व़फादार होते हैं, उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद कोई पद दे दिया जाता है. सामान्य तौर पर सचिव रैंक के अधिकारियों को सेवा विस्तार नहीं दिया जाता है, क्योंकि उनकी सेवानिवृत्ति के साथ कई लोग आस लगाए रहते हैं कि इस बार उनकी बारी आने वाली है. वित्त मंत्रालय में कुछ ऐसा ही हुआ. आर्थिक मामलों के सचिव आर गोपालन को तीन महीने का सेवा विस्तार दिया गया है. अप्रैल के अंत में वह सेवानिवृत होने वाले थे, लेकिन अब वह तीन महीने बाद सेवानिवृत होंगे. कुछ अधिकारी उनके उत्तराधिकारी बनने के लिए तैयार बैठे थे, जिन्हें अब तीन महीने इंतज़ार करना पड़ेगा. समझा जा रहा है कि गोपालन को मिले सेवा विस्तार के पीछे बजट है. इस बार का बजट थोड़ा निराशाजनक है, जिस पर चर्चा के लिए इसे बनाने में मदद करने वाले अधिकारियों की ज़रूरत होगी, जिसके कारण गोपालन को सेवा विस्तार दिया गया है.

हरिन्दर के बाद कौन

हरिन्दर हीरा को हिमाचल प्रदेश का मुख्य सचिव बनाया गया है, लेकिन वह जल्दी ही सेवानिवृत होने वाली हैं. इसके कारण अब उनके बाद मुख्य सचिव के पद पर नियुक्ति के लिए अधिकारी की तलाश जारी है. हरिन्दर हीरा की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर की गई थी. ग़ौरतलब है कि हीरा हिमाचल प्रदेश की मुख्य सचिव बनने वाली तीसरी महिला अधिकारी हैं. उनसे पहले आशा स्वरूप और राजवंत संधू को इस राज्य का मुख्य सचिव बनाया गया था. हिमाचल प्रदेश सरकार के लिए यह एक उपलब्धि है, जिस पर गर्व किया जा सकता है. अब कई बाबुओं की नज़र हरिन्दर की सेवानिवृत्ति के बाद खाली होने वाली मुख्य सचिव की कुर्सी पर है. सूत्रों के अनुसार, इस पद के लिए प्रतिस्पर्धा 1977 बैच के अधिकारी अशोक ठाकुर और सुद्रीप्तो रॉय के बीच है. अशोक ठाकुर अभी केंद्रीय डेपुटेशन पर हैं और सुद्रीप्तो रॉय प्रदेश के वन विभाग के अतिरिक्त सचिव हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि सुद्रीप्तो रॉय की नियुक्ति की उम्मीद ज़्यादा है, क्योंकि वह अभी प्रदेश में ही कार्यरत हैं. साथ ही उन्हें हाल में ओएसडी भी बनाया गया है, लेकिन अभी विश्वास के साथ तो कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. थोड़ा इंतज़ार कर लेते हैं.

बिहार के प्रशासन में जातिवाद

बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार के बारे में यह कहा जाता है कि वह अच्छा प्रशासन चला रहे हैं, लेकिन जातिवाद तो उनके प्रशासन में भी सा़फ तौर पर दिखाई पड़ता है. राज्य के प्रशासन में जातिवाद का अच्छा खासा असर है. हाल में राज्य के मुख्य सचिव नवीन कुमार ने प्रधान सचिव सहित कई आला अधिकारियों को संदेश भेजा है कि वे अपने विभाग के अधिकारियों को एक निर्देश जारी करें, जिसमें जन प्रतिनिधियों से अधिकारियों को कैसे मिलना चाहिए, इस बात का ज़िक्र हो. कई सांसदों और विधायकों ने मुख्यमंत्री से इस बात की शिकायत की है कि अधिकारियों का रवैया उनके प्रति अच्छा नहीं है. कुछ अनुसूचित जाति के विधायकों ने तो यहां तक कहा है कि उनके प्रति कुछ अधिकारियों का व्यवहार जाति से प्ररित होता है. यह मामला बिहार विधानसभा में भी रखा गया है. अब देखना यह है कि बाबुओं को समझाया जाता है या फिर नेताओं को.

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