बंद मिलें और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी

समस्तीपुर बिहार का प्रमुख ज़िला है. यहां पूर्व मध्य रेलवे का मंडलीय कार्यालय है, उत्तर बिहार का इकलौता राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय है. फिर भी यह जिला औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ा है. प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद यहां उद्योग पनप नहीं पा रहे हैं. ज़िले के ग्रामीण क्षेत्रों में लघु उद्योगों की स्थापना की गई, लेकिन सरकार की उपेक्षा के कारण 90 प्रतिशत इकाइयां बंद होकर खंडहर में तब्दील हो गईं, शेष बंद होने की कगार पर हैं. समस्तीपुर चीनी मिल वर्षों से बंद है, ठाकुर पेपर मिल नीलाम हो चुकी है. वर्तमान उद्योग मंत्री रेणु कुमारी कुशवाहा इस ज़िले की प्रभारी मंत्री हैं, लेकिन उन्होंने भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया. आज़ादी के पूर्व तत्कालीन समस्तीपुर अनुमंडल में स्थित मुक्तापुर में दरभंगा राजघराने ने रामेश्वर जूट मिल की स्थापना की थी. दलसिंह सराय में सिगरेट फैक्ट्री, समस्तीपुर एवं हसनपुर में चीनी मिल और पूसा में कृषि अनुसंधान केंद्र की स्थापना इस क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों एवं मजदूरों की उपलब्धता को स्वत: प्रमाणित करती है.

उत्तर बिहार में गंगा के किनारे रेलमार्ग की स्थापना सर्वप्रथम समस्तीपुर ज़िले में मोहीउद्दीन नगर के सुल्तानपुर घाट से दलसिंह सराय होते हुए दरभंगा तक हुई. यह रेल लाइन 1874 में बिछाई गई. इसका उद्देश्य अकालग्रस्त इलाक़ों के लिए खाद्य सामग्रियों का परिवहन था. स्थाई तौर पर 1875 में दलसिंह सराय-समस्तीपुर-दरभंगा रेल लाइन का निर्माण किया गया. रेल डिब्बों एवं इंजनों के रखरखाव और मरम्मत के लिए 1881 में रेलवे यांत्रिक कारखाने की स्थापना हुई, लेकिन इसकी हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है. अब यहां बड़ी लाइन के डिब्बों एवं इंजनों की मरम्मत का काम भी नहीं कराया जाता, जबकि पहले एमजी के इंजनों एवं वैगनों की मरम्मत (पीओएच) होती थी. वर्तमान में बड़ी लाइन के बाक्सन-एचएल वैगन का निर्माण कार्य हो रहा है. वह भी स्पेयर पाट्‌र्स के अभाव में बाधित होता रहता है. ज़िला मुख्यालय से क़रीब तीन किलोमीटर स्थित जितवारपुर (हसनपुर) में एक बड़े औद्योगिक घराने द्वारा स्थापित ठाकुर पेपर मिल कबाड़ियों की भेंट चढ़ चुकी है. वर्ष 1957 में इस मिल की स्थापना हुई थी. कुछ वर्षों तक इसमें अच्छा उत्पादन हुआ. स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने में भी यह उद्योग मददगार साबित हुआ, लेकिन यूनियनबाज़ी से तंग आकर मिल प्रबंधन ने 29 वर्ष पूर्व 9 मई, 1982 को मिल में जो ताला लटकाया, उसे अब तक नहीं खोला जा सका. स्थिति यह आ गई कि प्रभावशाली लोगों ने मिल को नीलाम कराकर कलपुर्जे कबाड़ियों के हाथ बेच दिए और ज़मीन अपने चहेतों के नाम करा दी. अब कुछ क्वार्टर बचे हैं, उन पर भी नीलामी का खतरा मंडरा रहा है.

साठ के दशक में यहां 32 करोड़ रुपये की लागत से ग्रेफाइट फैक्ट्री और 8 करोड़ रुपये की लागत से ऑटो मोबाइल्स स्पेयर्स फैक्ट्री लगाने के लिए लगभग 50 एकड़ भूमि हरपुर एलौथ में अर्जित की गई. दोनों फैक्ट्री न लगने के कारण यह भूमि दरभंगा औद्योगिक विकास प्राधिकरण को सौंप दी गई. बाद में प्राधिकरण ने यह ज़मीन उद्यमियों को आवंटित कर दी. इसमें फोम प्रोडक्ट्‌स, सीमेंट ह्यूम पाइप फैक्ट्री, प्रिंटिंग प्रेस, एवं इलेक्ट्रिक स्पेयर्स कारखाना आदि खुले, लेकिन एक-एक कर सब बंद हो गए. इसी प्रांगण में पुन: मिथिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ, समस्तीपुर डेयरी सुधा उत्पादन, शिव शक्ति एग्रो (इंडिया), पशु आहार एवं मुर्गी दाना उद्योग, सम्राट केमिकल लेबोरेट्रीज, बाला जी इंडस्ट्रीज, मैदा फैक्ट्री एवं कोल्ड स्टोरेज सहित 13 उद्योग लगे, जो चल रहे हैं. समस्तीपुर चीनी मिल वर्षों से बंद है. हसनपुर चीनी मिल की हालत अच्छी नहीं है. जूट मिल में भी वर्ष में एक-दो बार तालाबंदी हो जाती है. ज़िले के दस विधानसभा क्षेत्रों में से आठ पर जद-यू और भाजपा का क़ब्ज़ा है, जबकि दो पर राजद का. ज़िले की दोनों लोकसभा सीटों पर जद-यू का क़ब्ज़ा है. बिहार विधान परिषद में भी इस ज़िले के दो प्रतिनिधि हैं. एक राजद से और दूसरे जद-यू से.

सरायरंजन विधानसभा क्षेत्र से जद-यू के टिकट पर चुनाव जीतने वाले वर्तमान जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया. भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर के पुत्र रामनाथ ठाकुर ने दस वर्षों तक समस्तीपुर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. इसके पूर्व वह बिहार विधान परिषद के सदस्य भी रहे. लालू प्रसाद यादव की सरकार में वह पहली बार उद्योग राज्य मंत्री बने और नीतीश कुमार की सरकार में वह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री और विधि, सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री की कुर्सी पर पांच वर्षों तक विराजमान रहे, लेकिन उन्होंने समस्तीपुर के औद्योगिक विकास एवं शहर की सड़कों पर कोई ध्यान नहीं दिया. उनके मंत्री रहते हुए न मोहनपुर में गे्रफाइट कारखाना खुला और न समस्तीपुर चीनी मिल एवं ठाकुर पेपर मिल चालू हो सकीं.

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