अग्नि-5 ही नहीं, भारत ने जब-जब विभिन्न मिसाइलों का परीक्षण किया, तब-तब दुनिया, खासकर पड़ोसी देशों से नकारात्मक प्रतिक्रियाएं आईं, जिन्हें देखने-सुनने के बाद यही प्रतीत हुआ कि उनमें भारत को लेकर भय व्याप्त है. जबकि भारत कभी भी आक्रामक नहीं रहा. इसलिए नहीं कि वह किसी से डरकर आक्रामक नहीं होता, बल्कि यह आचरण उसकी प्रकृति एवं संस्कृति में है. भारत हमेशा यही चाहता है कि दुनिया में शांति रहे, सब लोग सुख-चैन से जीवन व्यतीत करें, पर विडंबना यह है कि भारत के प्रति नकारात्मक नज़रिया रखने वाले देशों को हर भारतीय क्रियाकलाप डराता है. शायद यही वजह है, अग्नि-5 की गर्मी में पाकिस्तान और चीन जैसे देश बेवजह झुलसने लगे हैं.
भारत ने बीते 19 अप्रैल को परमाणु क्षमता से लैस एवं स्वदेशी तकनीक से विकसित मिसाइल अग्नि-5 का परीक्षण किया. यह 17 मीटर लंबी और दो मीटर चौड़ी है. इसका भार क़रीब 50 टन है. यह उन्नत मिसाइल एक टन से ज़्यादा परमाणु सामग्री ढो सकती है. 5000 किलोमीटर तक मार करने वाली यह मिसाइल ओडिशा के व्हीलर द्वीप में प्रक्षेपित-परीक्षित हुई. अग्नि-5 का परीक्षण एकीकृत मिसाइल विकास कार्यक्रम में भारत की लंबी छलांग को प्रदर्शित करता है. इसे बनाने में क़रीब 2500 करोड़ रुपये की लागत आई. इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान (डीआरडीओ) ने विकसित किया. अभी स़िर्फ अमेरिका, रूस, फ्रांस एवं चीन के पास ही आईसीबीएम प्रक्षेपित करने की क्षमता है. 15 नवंबर, 2011 को इसी जगह 3500 किलोमीटर से ज़्यादा की मारक क्षमता वाली अग्नि-4 का परीक्षण हुआ था. उसके बाद ही अग्नि-5 की तैयारियों ने गति पकड़ी. इसके सफल परीक्षण में 800 से ज़्यादा वैज्ञानिकों एवं सहायकों का योगदान रहा. स्वदेश निर्मित अग्नि श्रेणी की अन्य मिसाइलों से अलग अग्नि-5 सबसे उन्नत है. इस परीक्षण के बाद भारत लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक रखने वाले चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है.
यह मिसाइल 1.5 टन का हथियार चीन के अंदर तक ले जाने में सक्षम है. 2014-15 तक पूरे तरीक़े से सेना में शामिल होने के बाद यह भारत की परमाणु निरोधक क्षमता कई गुना बढ़ा देगी. यदि डीआरडीओ के प्रमुख वी के सारस्वत की मानें तो दुनिया के कुछ ही विकसित देशों में इस तरह की अंतर महाद्वीपीय मिसाइलें हैं. अग्नि-5 में समग्र रॉकेट मोटर, माइक्रो नेवीगेशन सिस्टम (एमआईएनडीएस) शामिल हैं. 2010 में अग्नि-3, 2011 में अग्नि-4 के प्रक्षेपण के बाद अग्नि-5 को विकसित किया गया. अग्नि-5 भारत को चीन के खिला़फ वही रक्षा कवच देगी, जो अब तक उसके पास नहीं था. चीन के खिला़फ 1962 के युद्ध में भारत को काफी नुक़सान हुआ था, इसलिए भारत द्वारा मई 1998 में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए गए. इससे पड़ोसी देशों, खासकर चीन और पाकिस्तान में खलबली मच गई थी. भारत को सफाई तक देनी पड़ी कि ऐसा करने की वजह चीन की बढ़ती परमाणु क्षमता है. चीनी मिसाइलों की रेंज 1500 से लेकर 2250 किलोमीटर तक है, जिन्हें तिब्बत में तैनात किया गया है, जहां से दिल्ली समेत भारत के अन्य शहरों को निशाना बनाया जा सकता है. विदित है कि तिब्बत को लेकर भारत और चीन के बीच अक्सर टकराव जैसी स्थिति बनी रहती है. अग्नि-5 के परीक्षण पर चीन ने कहा कि दोनों विकासशील देश प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि पारस्परिक साझेदार हैं. जबकि पाकिस्तान का कहना है कि भारत ने अग्नि-5 का परीक्षण करने से पहले सूचित किया था और इसे लेकर उसने नियमों का पालन किया. अमेरिका ने इस परीक्षण से पहले सभी परमाणु शक्तियों से संयम बरतने की अपील की, किंतु इसकी आलोचना नहीं की. हालांकि उक्त देशों के चरित्र के मद्देनज़र उनकी प्रतिक्रियाएं डिप्लोमेटिक प्रतीत होती हैं. चीन के एक अख़बार ने ख़बर छापी कि हथियारों की होड़ में चीन के सामने भारत की औकात क्या है. इससे सिद्ध होता है कि चीन में भारत के प्रति नकारात्मक नज़रिया कूट-कूटकर भरा है. दबी ज़ुबान से अन्य पश्चिमी देश भी कह रहे हैं कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर की गईं परमाणु एवं मिसाइल नियंत्रण संधियों की बात को लगातार अनदेखा कर रहा है. वे मानते हैं कि भारत ने भले ही ऐसी मिसाइल बना ली हो, जो चीन के किसी भी हिस्से पर वार कर सकती है, पर चीन के साथ विवाद में अक्खड़पन अपनाने से भारत को कुछ नहीं मिलेगा. अग्नि-5 पर दुनिया में मची हलचल के मद्देनज़र यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि भारत की सभ्यता, संस्कृति एवं आचरण में खून बहाना और अशांति पैदा करना शामिल नहीं है.
|
|
|
भारत की सभ्यता -संस्कृति एवँ आचरण में अशांति पैदा करना नहीं है फिर भी –[ जग नहीं सुनता कभी दुर्बलजनों का शांति प्रवचन ]इस अमृत वाक्यको ध्यान में रखने का सद्प्रयास अपने देश के वैज्ञानिकों,तत्ववेताओं ,देशभक्तमंत्रियों द्वारा किया गया है जो साधूवाद के पात्र हैं ~~~कोटि-कोटि धन्यवादः|