पूर्वी चंपारणः महात्‍मा गांधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जनसंघर्ष और नेतागिरी

संघर्ष ज़मीन तैयार करता है और फिर उसी ज़मीन पर नेता अपनी राजनीतिक फसल उगाते हैं. कुछ ऐसा ही हो रहा है मोतिहारी में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए बने संघर्ष मोर्चा के साथ. चंपारण की जनता केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दिन-रात एक करके संघर्ष करती है और जब दिल्ली आती है अपनी बात केंद्र तक पहुंचाने, तो वहां मंच पर मिलते हैं बिहार के वे सारे सांसद, जो संसद में तो इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलते, लेकिन जनता के बीच भाषणबाज़ी का मौक़ा भी नहीं छोड़ते. इस मुद्दे पर जंतर-मंतर का आंखों देखा हाल बताती शशि शेखर की यह रिपोर्ट…

चालीस सांसदों का संख्या बल कम नहीं होता. इतने सांसद चाहें तो लोकसभा में किसी मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं, किसी मुद्दे पर चर्चा करा सकते हैं, संसद की कार्यवाही स्थगित करा सकते हैं. ऐसा होता भी है. कुल मिलाकर यह संख्या किसी मुद्दे पर फैसला लेने के लिए सरकार पर दबाव बना सकती है. बिहार से एनडीए के क़रीब तीस से भी ज़्यादा सांसद लोकसभा में हैं, लेकिन क्या वजह है कि हर बात पर हो-हल्ला मचाने वाले और संसद की कार्यवाही स्थगित कराने वाले माननीय सांसद मोतिहारी में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर हो रही देरी और दूसरी तऱफ मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के अड़ियल रवैये के खिला़फ चुप हैं. कुछेक सांसद कार्रवाई के नाम पर महज़ पत्रबाज़ी कर रहे हैं. सवाल है कि क्या बिहार के 40 सांसद इतने कमज़ोर हैं कि एक विश्वविद्यालय की तय जगह पर स्थापना तक नहीं करा सकते या फिर मामला कुछ और है?

राधा मोहन सिंह ने इस मुद्दे को कभी संसद में नहीं उठाया और एक अन्य सांसद से मुझे मिली जानकारी के मुताबिक़ राधा मोहन सिंह इस मुद्दे पर कुछ करना ही नहीं चाहते हैं, वह अगले चुनाव तक इस मुद्दे को लटकाए रखना चाहते हैं.

– सुंदर देव शर्मा, संघर्ष मोर्चा

दरअसल, गांधी की कर्मभूमि चंपारण में केंद्रीय विश्वविद्यालय खुले, इस मुद्दे पर पिछले दो सालों से चंपारण की जनता दिन-रात संघर्ष कर रही है. युवा, शिक्षक, सेवानिवृत्त कर्मचारी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्थानीय नेता सब मिलकर अपनी आवाज़ केंद्र सरकार तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. बाक़ायदा एक संघर्ष मोर्चा बनाकर ये लोग धरना-प्रदर्शन, रेल रोको अभियान चलाकर अपनी बात सरकार तक पहुंचा रहे हैं. इसी कड़ी में संघर्ष मोर्चा ने यह तय किया कि दिल्ली चलकर जंतर-मंतर पर एक दिन का धरना दिया जाए. 30 अप्रैल का दिन तय हुआ. हज़ार से ज़्यादा की संख्या में लोग चंपारण से दिल्ली पहुंचे. दिल्ली में रह रहे चंपारण के लोग भी जंतर-मंतर पर आए, लेकिन वहां मंच पर दर्जनों सांसदों एवं विधायकों के अलावा संघर्ष समिति के एक भी सदस्य को बैठने तक की जगह नहीं मिली. जो सांसद संसद में मुंह तक नहीं खोलते, यहां पानी पी-पीकर कपिल सिब्बल को कोस रहे थे. मानो अकेले कपिल सिब्बल इन दर्जनों सांसदों से भी ज़्यादा ताक़तवर हैं. चौथी दुनिया से बात करते हुए शिवहर से भाजपा सांसद रमा देवी यह पूछे जाने पर कि आप लोग संसद के भीतर इस मुद्दे पर लड़ाई क्यों नहीं करते? वह कहती हैं कि मैं एचआरडी मिनिस्ट्री की कमेटी में मेंबर हूं और मैंने मिनिस्टर को पत्र भी लिखा है. इससे काम नहीं बनेगा तो आगे और क़दम उठाए जाएंगे, दबाव बनाया जाएगा. लेकिन जब इस संवाददाता ने मोतिहारी से भाजपा सांसद राधा मोहन सिंह से उनकी राय जाननी चाही तो वह बजाय कुछ बोलने के इस संवाददाता के हाथ में अपना एक प्रेस वक्तव्य थमा देते हैं और कहते हैं कि इसमें सब कुछ लिखा हुआ है. मानो सांसद महोदय के पास व़क्त की बड़ी कमी हो. यह अलग बात है कि जहां कहीं भी वे टीवी कैमरा देखते थे, वहां बोलने से खुद को रोक नहीं पा रहे थे.

गांधी जी ने अपने जीवन का सबसे पहला स्कूल चंपारण के ही भितिहरवा और बड़हरवा में खोला था. इस क्षेत्र का विकास शिक्षा से ही हो सकता है, इसलिए ज़रूरी है कि मोतिहारी में केंद्रीय विश्वविद्यालय बने.

– बजरंगी नारायण ठाकुर, संघर्ष मोर्चा

बहरहाल, संघर्ष मोर्चा में शामिल वरिष्ठ नागरिकों एवं चंपारण के वरिष्ठ स्थानीय नेताओं ने दलीय सीमाओं को भुलाकर यह संघर्ष रूपी मंच तैयार किया है, जिस पर अब सांसद महोदय अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने की तैयारी कर रहे हैं. पूर्वी चंपारण के एक जाने-माने सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता एवं महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय संघर्ष मोर्चा से जुड़े बजरंगी नारायण ठाकुर कहते हैं कि मोतिहारी देश भर में सबसे पिछड़ा ज़िला है और बिहार के बंटवारे के बाद सारी अच्छी शैक्षणिक संस्थाएं झारखंड में चली गईं. अब तो उत्तरी बिहार में शिक्षा का और भी बुरा हाल है. ऐसे में इस इलाक़े का विकास शिक्षा से ही हो सकता है, इसलिए ज़रूरी है कि मोतिहारी में केंद्रीय विश्वविद्यालय बने. वह बताते हैं कि गांधी जी ने अपने जीवन का सबसे पहला स्कूल चंपारण के ही भितिहरवा और बड़हरवा में खोला था. दूसरी ओर, संघर्ष मोर्चा के ही सुंदर देव शर्मा इन सांसदों के रवैये से इतने ख़फा दिखे कि वह चौथी दुनिया से बातचीत करते हुए कहते हैं, राधा मोहन सिंह ने इस मुद्दे को कभी संसद में नहीं उठाया और एक अन्य सांसद से मुझे मिली जानकारी के मुताबिक़ राधा मोहन सिंह इस मुद्दे पर कुछ करना ही नहीं चाहते हैं, वह अगले चुनाव तक इस मुद्दे को लटकाए रखना चाहते हैं. शर्मा आगे कहते हैं कि जब हम अपने सांसद से मिले और यह बताया कि हम लोग (संघर्ष मोर्चा) दिल्ली में धरने का आयोजन करना चाहते हैं तो उन्होंने कहा कि आप लोग आइए, सारा इंतज़ाम हो जाएगा, लेकिन जब हम लोग दिल्ली पहुंचे तो देखा कि मंच पर संघर्ष मोर्चा का बैनर तक नहीं लगा है और एक के बाद एक दर्जनों नेता आकर मंच पर विराजमान हो चुके हैं. मानो हम उनका भाषण सुनने आए हैं.

ज़ाहिर है, संघर्ष का सम्मान जब अपने ही लोग नहीं करेंगे तो दूसरे भला क्यों इसकी परवाह करेंगे. चंपारण से आए संघर्ष मोर्चा की युवा इकाई के अमरेंद्र सिंह, शंभु शरण सिंह, बबन कुशवाहा, साजिद रज़ा, सेवानिवृत्त शिक्षक राम नरेश सिंह, इं. रमेश वर्मा, राम पुकार सिंह, पूर्वी चंपारण प्रेस क्लब के ज्ञानेश्वर गौतम, संजय कौशिक, आनंद प्रकाश, मनीष शेखर और वॉयस ऑफ मोतिहारी के साथ-साथ संघर्ष मोर्चा की छात्र इकाई से जुड़े सैकड़ों युवा इस धरने में शामिल होने आए थे. इनमें से ज़्यादातर लोगों का कहना था कि आखिर जब दोपहर 2 बजे तक का समय मिला था तो एक-डेढ़ बजे ही कार्यक्रम को क्यों समाप्त कर दिया गया, आखिर क्यों हमारे माननीय सांसद समय से पहले ही सभा से चले गए? वे यह भी सवाल उठाते हैं कि सभा के बाद प्रधानमंत्री को ज्ञापन क्यों नहीं सौंपा गया या संसद की तऱफ मार्च क्यों नहीं किया गया? ज़ाहिर है, इन सवालों के जवाब चंपारण के लोगों को मिलने ही चाहिए. बहरहाल, केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए चंपारण की जनता को एक लड़ाई केंद्र सरकार या कपिल सिब्बल से तो करनी ही है, साथ ही उन्हें अपने नुमांइदों पर भी दबाव डालना होगा, ताकि वे संसद के भीतर इस लड़ाई को लड़ें. न स़िर्फ आपकी आवाज़ उठाएं, बल्कि उसे मानने के लिए सरकार को मजबूर करें. अगर ऐसा नहीं होगा तो तय मानिए, स़िर्फ कपिल सिब्बल को कठघरे में खड़ा करने या कोसने से केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं बनने वाला है.

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