इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

आदरणीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश की जनता को का़फी चिंतित किया है. लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या इतनी चिंताजनक घटनाएं हो जाने के बावजूद कुछ सुधार होगा? अभी तक की भारत सरकार की कार्रवाई से ऐसा लगता नहीं कि कुछ सुधरेगा. इसी चिंता ने हमें यह पत्र लिखने को मजबूर किया है.

जनरल वीके सिंह ने आपको पत्र लिखा. उन्होंने पत्र में सेना की ख़स्ता हालत पर चिंता ज़ाहिर की. जो चिंताएं जनरल वीके सिंह ने अपनी चिट्ठी में ज़ाहिर की, क्या वे सब सच हैं? उनका कहना है कि सेना के पास गोला- बारूद तक नहीं है. हमारे जवान कठिन से कठिन परिस्थितियों में अपनी जान दाव पर लगाकर देश की रक्षा करते हैं. अगर उन्हें लड़ने का पूरा सामान समय पर मुहैया नहीं कराया जाएगा, तो वे देश की रक्षा कैसे करेंगे? हमारी सेना की ऐसी हालत कैसे हुई, देश जानना चाहता है. इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है?

भारत अपनी सुरक्षा पर ख़ूब पैसा ख़र्च करता है. अपनी रक्षा पर सबसे ज़्यादा ख़र्च करने वाले देशों में भारत नौवें स्थान पर है. दुनिया समझती है कि भारत विश्व में सबसे ज़्यादा हथियार ख़रीदता है. हर साल इस बजट में भारी वृद्धि की जाती है. 1996-97 में हमारे देश का रक्षा बजट लगभग 30 करोड़ था, जो 2001-02 में बढ़कर 62,000 करोड़ हो गया. 2010-2011 में यह बढ़कर 1.5 लाख करोड़ हो गया. जब-जब देश की रक्षा के लिए पैसा मांगा गया, कभी किसी ने मना नहीं किया. लोगों को तो लगता है कि हमारा सैन्य बल अत्याधुनिक हथियारों से लैस है. तो जब हमारे सेना प्रमुख यह कहते हैं कि हमारी सेना की हालत ख़स्ता है और उसके पास गोला-बारूद तक नहीं है, तो मन में सवाल उठता है कि आख़िर ये सारा पैसा जा कहां रहा है? इसमें से कितना पैसा भ्रष्टाचार की बेदी पर चढ़ जाता है? एक अख़बार की ख़बर के मुताबिक़, 2003 से लेकर आज तक 5000 करोड़ रुपये के टेट्रा ट्रक ख़रीदे गए, जिसमें 750 करोड़ रुपये की रिश्वत दी जा चुकी है. ये सब ख़बरें चिंता पैदा करती हैं.

हथियारों के मामले में हमारा देश अभी तक आत्मनिर्भर क्यों नहीं हुआ? इस दिशा में सार्थक प्रयास क्यों नहीं किए गए? इज़रायल और चीन जैसे देश भी हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर हो चुके हैं. तो भारत क्यों नहीं हो सकता? कहीं ऐसा तो नहीं कि अगर भारत आत्मनिर्भर हो गया होता तो शायद दलालों, नेताओं और अ़फसरों के कमीशन बंद हो जाते? तो क्या यह सच नहीं कि भारत के आत्मनिर्भर होने में भ्रष्टाचार आड़े आ रहा है?

ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सेना के मनोबल को कमज़ोर करने और हमारी सेना प्रमुख की विश्वसनीयता को कम करने के लिए एक सुनियोजित साज़िश चल रही है. इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने एक ख़बर को प्रकाशित कर यह माहौल पैदा करने की कोशिश की, मानो जनरल वी के सिंह देश का तख्ता पलटने की कोशिश कर रहे हैं. हमें ख़ुशी है कि आपकी सरकार ने इसे सरासर निराधार बताया. लेकिन क्या केवल ख़बर का खंडन कर देना पर्याप्त है? आपने कहा कि यह ख़बर बकवास है. पर क्या इतनी बड़ी बकवास करने की इजाज़त होनी चाहिए? क्या इसकी तह तक हमें नहीं जाना चाहिए कि इंडियन एक्सप्रेस में यह ख़बर किसने छपवाई, इसके पीछे कौन था? किसने यह साज़िश रची?

कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्ता के अंदर का कोई आदमी इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के पीछे है, जिसकी वजह से आप कुछ नहीं कर पा रहे हैं?

संडे गर्डियन अख़बार के मुताबिक़, इंडियन एक्सप्रेस में छपी इस ख़बर के पीछे आपके एक वरिष्ठ मंत्री का हाथ है. हालांकि उस मंत्री का नाम नहीं लिखा गया, लेकिन अटकलें लगाई जा रही हैं कि इशारा देश के गृहमंत्री श्री पी चिदंबरम की तऱफ है. क्या यह सच है? अगर यह सच है तो आप स्थिति की गंभीरता को समझ सकते हैं. जिस देश का गृहमंत्री देश की सेना को कमज़ोर करने लगे, वह देश कितना सुरक्षित है? इसी अख़बार में आरोप लगा है कि गृहमंत्री के पुत्र के हथियारों के दलालों से घनिष्ठ संबंध हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के पीछ हथियारों के दलालों का हाथ है. सच्चाई क्या है? ये सभी ख़बरें विचलित करने वाली हैं. अगर ये ख़बरें सच हैं, तो तुरंत बहुत कुछ करने की ज़रूरत है और अगर इंडियन एक्सप्रेस या संडे गार्डियन की ख़बरें झूठी हैं, तो इन अख़बारों के ख़िला़फ सख्त कार्रवाई की जाए.

श्री एके एंटनी एक बहुत ही ईमानदार रक्षामंत्री माने जाते हैं. कुछ लोगों का कहना है कि दलाल और भ्रष्टाचारी तत्व श्री एंटनी को हटाने के लिए साज़िश कर रहे हैं. क्या यह सच है?

ये आपके और मेरे सवाल हैं. अगर आप सहमत हैं तो इस पर्चे को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पढ़ाएं.

आख़िर सच्चाई क्या है? यह सच्चाई कैसे पता चलेगी? कुछ अहम प्रश्न उठते हैं. देश इन प्रश्नों के जवाब चाहता है-इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के पीछे किसकी साज़िश थी? उनका मक़सद क्या था? क्या इसमें गृहमंत्री या किसी अन्य मंत्री का हाथ था? देश के सुरक्षा सौदों में किस हद तक भ्रष्टाचार व्याप्त है? सत्ता में बैठे कौन लोग या उनके रिश्तेदार उसमें शामिल हैं? इससे देश की सुरक्षा को किस तरह का ख़तरा है और इसे रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए? क्या पिछले कुछ महीनों की घटनाएं हमारे ईमानदार सेना प्रमुख और ईमानदार रक्षामंत्री के ख़िला़फ साज़िश तो नहीं हैं? क्या इसमें रक्षा सौदों के दलालों का हाथ तो नहीं है? इन रक्षा सौदों के दलालों के सत्ता में किन-किन लोगों के साथ संबंध हैं?

हमें नहीं लगता कि आपके पास भी इन प्रश्नों के जवाब हैं. इन प्रश्नों के जवाब ढूंढे बिना कोई भी सार्थक प्रयास असंभव है. जब तक कोई निष्पक्ष और भरोसेमंद एजेंसी मामले की तहक़ीक़ात करके सच्चाई और समस्या की गहराई का पता नहीं लगाती, तब तक ईमानदारी से सुधार के प्रयास भी संभव नहीं होंगे. फिर से देश की सुरक्षा राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों की बलि चढ़ जाएगी. यह हमारे लिए अत्यधिक चिंता का विषय है, जिसकी वजह से हमें आपको यह पत्र लिखने पर मजबूर होना पड़ा.

इन सब मामलों में अभी तक भारत सरकार ने क्या-क्या कार्रवाई की? अख़बारों के मुताबिक़, सरकार ने केवल आईबी और सीबीआई की जांच बैठाई है. पर इन जांचों से तो सच्चाई का पता नहीं चलेगा, क्योंकि ये दोनों ही निष्पक्ष एजेंसी नहीं हैं. इस मामले में गृहमंत्री या अन्य सत्ताधारी लोगों के शामिल होने की आशंका है. ऐसे आरोप हैं. भगवान करे ये आरोप झूठे हों. पर अगर इन आरोपों में ज़रा भी सच्चाई है तो क्या आपको नहीं लगता कि आईबी और सीबीआई ये जांच नहीं कर सकती? आईबी तो गृह मंत्रालय के सीधे नियंत्रण में है. आईबी सीधे गृहमंत्री से आदेश लेती है. वह गृहमंत्री के ख़िला़फ कैसे जांच कर सकती है? इसी वजह से उच्च पदों के भ्रष्टाचार को रोकने में सीबीआई आज तक नाकाम रही है.

पिछले कई दशकों में रक्षा सौदों के कई घोटाले सामने आए, लेकिन सीबीआई किसी भी मामले में दोषियों को सज़ा दिला पाने में असफल रही. ऐसा नहीं कि सीबीआई सक्षम नहीं है. पर जब उच्च स्तर पर बैठे लोग सीधे भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं तो वे सीबीआई को ईमानदारी से काम नहीं करने देते. चूंकि सीबीआई सीधे उन्हीं के नियंत्रण में होती है, सीबीआई पर दबाव डालकर मामला ऱफा-द़फा कर दिया जाता है. बोफोर्स मामले में राजनीतिक दबाव के तहत सीबीआई ने मुख्य अभियुक्त क्वात्रोची के बैंक अकाउंट ही छोड़ दिए. इसी तरह आज तक स्कोर्पिन डील और ताबूत घोटालों में भी कोई नहीं पकड़ा गया. सेना में घोटालों पर घोटाले हो रहे हैं, पर उनकी निष्पक्ष जांच नहीं होती. अगर पिछले घोटालों में दोषियों को कड़ी सज़ा दिलवाई गई होती, तो शायद घोटालों पर अंकुश लग सकता था. लेकिन ऐसा हो, इसकी हमारे देश में व्यवस्था ही नहीं है. हर कुछ वर्षों में रक्षा सौदों में घोटाले निकलते हैं, कुछ दिनों तक शोर-शराबा होता है, मामला सीबीआई को सौंप दिया जाता है, सीबीआई पर सीधे आरोपियों का नियंत्रण होता है, जिसकी वजह से निष्पक्ष जांच नहीं हो पाती और अंत में किसी को सज़ा नहीं मिलती. यह कहानी पिछले कुछ दशकों में कई बार दोहराई जा चुकी है और ऐसा लगता है कि यही कहानी फिर से दोहराई जाएगी. हमारे देश की सुरक्षा, हमारे देश की सेना, हमारे देश के रक्षामंत्री और हमारे देश के सेना प्रमुख इन सबके ख़िला़फ एक गहरी साज़िश रची गई. इस साज़िश की तहक़ीक़ात करने का काम फिर से सीबीआई को दे दिया गया है. फिर से सीबीआई नाकाम रहेगी. यह कहानी चलती रहेगी और देश की सुरक्षा पर ख़तरा मंडराता रहेगा.

अगर जांच एजेंसी पर या जांच पर आरोपियों का, दलालों का या भ्रष्ट लोगों का किसी तरह का भी प्रभाव होगा तो सच्चाई कभी बाहर नहीं आएगी और बिना सच्चाई जाने कभी समाधान नहीं हो पाएगा. इसलिए आपकी सरकार द्वारा अभी तक इस मामले में की गई कार्रवाई से देश असंतुष्ट है.

पिछले 44 साल से देश एक सशक्त और स्वतंत्र लोकपाल की मांग कर रहा है. वह आपकी सरकार बनाना नहीं चाहती. अगर आज ऐसा लोकपाल होता तो इस मामले की स्वतंत्र जांच हो सकती थी. लेकिन सशक्त लोकपाल बनाने की बजाय आपने एक अत्याधिक कमज़ोर लोकपाल बिल संसद में पेश किया. हद तो तब हो गई, जब 27 दिसंबर, 2011 को लोकसभा में संशोधन पारित करके सेना में हो रहे भ्रष्टाचार को लोकपाल के दायरे से हटा दिया गया. ऐसा क्यों किया गया?

आपका

कि.बा.हजारे

अब क्या समाधान है?

सीबीआई को अविलंब सरकारी शिकंजे से स्वतंत्र किया जाए, ताकि आरोपी, दलाल और भ्रष्ट लोग उसकी जांच को प्रभावित नहीं कर सकें. तभी सीबीआई इस साज़िश पर से पर्दा उठा सकेगी.

प्रधानमंत्री जी, हम भारत के लोग आपसे जानना चाहते हैं- क्या भारत और भारत के लोग आपके हाथों में सुरक्षित हैं?

One thought on “इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

  • May 6, 2012 at 1:51 PM
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    आदरनिये केजरीवाल जी, आपका जबाब जो अपने संसद को दिया बड़ा ही तार्किक और प्रभावी था. यह सम्भव है अध्यक्ष महोदय के पास इसका कोई प्रतिउत्तर नहीं हो. लेकिन पुरे संसद को चोर कहना वैसा ही है जैसे पुरे भारत को भ्रस्ट कहना जो की पूरी तरह से निन्दनिये है.
    सर, आज सिद्धान्तिक रूप से ही सही पर हम नवजवानों में भ्रस्टाचार के खिलाफ रोस है. इसलिए जो भी ब्यक्ति भ्रस्टाचार के खिलाफ बोलता है, हमे अच्छा लगता है तो जाहिर सी बात है आप भी अच्छे लगते है. लेकिन इतना अभद्र, आक्रामक और ब्याक्तिगत होना आप जैसे लोगो को शोभा नही देता है. मुझे लगता की आप भ्रस्टाचार के कम और कांग्रेस के खिलाफ ज्यादा लड़ रहे है. आपको कॉरपोरेट जगत का समर्थन मिलता रहा है जो संदेह पैदा करता है आखिर इस भ्रस्टाचार से यह जगत ज्यादा फायदेमंद है.
    आज केंद्र सरकार का स्तर गिर रहा है और आप इसे गिरने का पूरा मौका दीजिये आखिर उतावला होने क्या जरूरत है. क्योंकि सरकार लोकपाल को आखरी रास्ता मानकर ही स्वविकार करेगा और तब तक काफी धैर्य की जरूरत है.

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